बोलो विरोध करो। गलत को गलत और सही को सही कहो —

हमारे प्रतिष्ठा पर सवाल , हमारा देश विदेश में डांवा डोल स्थिति, हमारे अन्नदाता , हमारे जीवन का रक्षक , हमारे किसान भाई पर हमला ? यह ना महज संयोग है, ना ही महज  प्रयोग, बल्कि एक प्रोजेक्ट है। ऐसा लगता है की किसानों को ‘हम’ और ‘वे’ में बांट देने का प्रोजेक्ट है। जिसे बहुत तेजी से पूरा किया जा रहा है जिसके लिये कई दशकों से प्रयास किया जा रहा था।

दिमागों में पैदा किये गये विभाजनकारी हिंसा अब जमीन पर दिखाई पड़ने लगी है जिसके चलते हमारा देश बहुत तेजी से नफरत, खौफ, निराशा और खिलाफत की अंधी खाई में धंसता जा रहा है। आज भी हम जो सात दशक पहले विभाजन के दर्द को भूल कर सभी भारतीयों के बीच स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सपने अब लगातार खाक होते जा रहे हैं। पिछले कुछ सालों से अपना अन्नदाता, सत्यवादी और सर्वधर्म के इज्जत करने वाले लगातार निशाने पर है। पर क्यों ? बात बहुत छोटी सी है और बेहद साधारण भी. आप क्या कहते हैं ? याद रहे आज देश में यदि सबसे अस्थिर और बदतर जीवन-यापन कोई कर रहा है, तो वह है किसान। वह पूरी तरह प्रकृति और सरकार पर निर्भर है। आमतौर पर यह माना जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। किसानों पर हमले से मैं आहत हूँ पहली बार कह रहा हूँ उठो बोलो विरोध करो मौका मिला है उठने का , बोलने का ,विरोध करने का मतलब साफ है आप पिता , पति या भाई के रूप में किसानी पौरुष को निखारने का वैसे आपको अपनी मांगों को मनाने के लिए दिल्ली आना पर रहा है आईये हम नागरिक के तौर पर आपका स्वागत के लिए तैयार हैं आखिर आप अपने तो ही हैं आपके मन में सौ तरह के सवाल उठ रहे होंगे, मसलन सरकार के बेरुखी के कारन अपने विरोध की जिम्मेदारी कैसे निभा पाएंगे ? खेत खलिहान और विरोध इन तीनों के साथ कैसे सामंजस्य बना पाएंगे ? सनद रहे ये सब आज आपके साथ घट रहा है तो जाहिर है की कल किसि और के साथ भी होगा पर होता है, चलता है, वहां हुआ ना,यहाँ नहीं हुआ ना , वहां का किसान विरोध कर रहा है यहाँ का नहीं ना , उनके साथ समस्या है मेरे साथ नहीं ना कैसे एक सुरक्षित माहौल दिया जाये, ये चिन्तन मनन का एक लोकप्रिय राजनैतिक मुद्दा बन कर रह गया है या रह जायेगा पर याद रहे हर घटना हमें कुछ ना कुछ सिख देता है और आगे सिखने को प्रेरित भी करता है .विरोध की शुरुआत भी हमें ही करनी होगी , हमारे लिए कोई दूसरा व्यक्ति कदम पहले नहीं बढ़ाएगा और यकीन मानिये जब हम ऐसा कर पाते हैं तो हम अपनी ही नजरों में उठते हैं और आत्मविश्वास के साथ जी पते हैं मै तो यही कहूँगा चीखो , चिल्लाओ भी लेकिन ये याद रखते हुए की चीखने चिल्लाने भर से काम बनने वाला नहीं है क्योंकि ये लड़ाई देश दुनिया समाज और परिवार से पहले हमारी अपनी है और हाँ सरकार सुनेगा और सुधार करना ही होगा क्योंकि क्या हार में क्या जीत में किंचित नही भयभीत में, कर्तव्य पथ पर जो भी मिले जीत भी सही और हार भी सही !

इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि किसान अपनी रोजी-रोटी की लड़ाई के लिए जान लड़ा रहे हैं और मीडिया उन्हें खालिस्तानियों से जोड़ रहा है, उनके आंदोलन में कई तरह की साजिशें ढूँढ़ रहा है। जाहिर है कि ये नरेटिव एक  मुख्यालय, आईटी सेल या सीधे मंत्रालय से आया है और गोद लिए पत्रकार उसे विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हुए परोस रहे हैं। सोचिए कितना घृणित है ये सब। वीभत्स। न कोई सरोकार, न कोई सहानुभूति। सिर्फ वासना से सने स्वार्थ और उसमें उछल-कूद करते एंकर-एंकरानी। इजाजत है. जहां चाहो चले जाओ किसी को तंग मत करना। जुबां काबू में ही रखना वहां हुड़दंग मत करना बस अपनी बात रखना बस सरकार के लिए यही कहूँगा की आपके नजर में किसान हैं ही इस काबिल। उन्हें तो सीधे गोली मारो सरकार ! ये वाटर कैनन से डरने वाले नहीं हैं। जब तक ये खेतों पर काबिज हैं, तब तक आपके मालिक उन खेतों पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। ये नामुराद अब भी यकीन नहीं करते, कि आप इनको भूखा मारकर इन पर कितना बड़ा एहसान कर रहे हैं। ये कैसे तय कर सकते हैं कि उनकी भलाई किसमें है? सरकार इनका भला करना चाहती है और ये अपना बुरा करने पर आमादा हैं। इससे अच्छा तो इन्हें मार ही दो। ये जब तक जिएंगे, अपना बुरा करते ही रहेंगे। बस यह याद रखना जब कोई किसान या जवान मरता है,तो समझना पूरा हिन्दुस्तान मरता है. किसान की आह जो दिल से निकाली जाएगी क्या समझते हो कि खाली जाएगी. किसान की समस्या खत्म नही होती, नेताओ के पास पैकेज अस्सी हैं, अंत में समस्या खत्म करने के लिए, किसान चुनता रस्सी हैं. क्यों ना सजा दी पेड़ काटने वाले शैतान को खुदा तूने सजा दे दी सीधे-सादे किसान को…

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