मंदिरों की व्यवस्था को लेकर जिनको अपने नित्य कर्म या कहें अपने रोज के दिनचर्या का ज्ञान नहीं है! वह भी मंदिर व्यवस्था पर बोलने लगे है ।

मंदिर व्यवस्था साधना का वह पक्ष है,जहां पर बाजार दम तोड़ देता है!जहां पर आपकी सारी इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने की वह राक्षसी वृति दम तोड़ देती है! जहां आपका अहंकार शून्य हो जाता है! वहां से मंदिर का व्यवस्था प्रारंभ होता है!- अनंत श्री विभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अनन्तानन्द सरस्वती ,राजगुरु मठ पीठाधीश्वर -काशी

कुछ समझ में आया? जो ऊपर मैंने कहा है अगर नहीं समझ में आया तो!साधना के प्राथमिक क्रम से,किसी सही गुरु से कुछ सीख कर प्रारंभ करें।। मैं भी एक आश्रम बना रहा हूं और पता है जो अपने उदर पूर्ति में लगे हैं वह उस आश्रम के बारे में सोचते हैं जबकि वह इतना ही सोच सकते हैं जितना वह होटल को समझते हैं? उनकी समझ से बाहर है आश्रम?मठ? मंदिर? आध्यात्मिक स्थल? इसलिए मैंने कहा कि अगर आपको थोड़ा भी समझ है,तब तो वहां दिमाग लगाइए नहीं तो, अभी आप कागज के टुकड़े जिसको कहते हैं नोट कमाना!!आप उसके लिए बने हैं? आप उसमें लगे रहिए! जब थक जाएंगे तब समझ आएगा? तब जो कोई साधु,संत, ब्रह्मण,सन्यासी जो काम कर रहे हैं,वह आपको समझ में आएगा! अन्यथा वह आपको,आपके जैसा है?यही समझ आएगा कि जैसे आप वैसे ही उपरोक्त।। आज दुनिया किस तरफ जा रही है?किस तरफ भाग रही है?

कभी समय मिले तो सोचिएगा! कि जहां आप जन्मे,वहां सारा सुख है,इसके बाद भी आप अपनी जन्मभूमि,अपने माता,अपने पिता, अपने भाई, अपने संबंध,सब कुछ छोड़ करके, एक कागज के टुकड़े के लिए, पता नहीं कहां चले गए?कहां बस गए? और क्या-क्या कर्म करते हैं? और वह कागज का टुकड़ा जब कमा लेते हैं! आप फिर लौट करके अपनी प्रतिष्ठा बनाने के लिए,उनके बीच आते हैं! जिनको आप छोड़ कर गए हैं या प्रवास करते हैं।। वो आपको आदर दें वही जिन्हें आप छोड़ कर चले गए थे? जो आप चाहते हैं, जहां से आप चाहते हैं, उसकी समझ भूल चुके हैं! इसलिए संतों की वृत्ति समझ में ना आए? तो बोलने की जगह सहयोग कर सकते हैं, तो सहयोग करिए, नहीं कर सकते हैं, तो दूर रहकर के देखिए,कि वह क्या सृजन कर रहे हैं! जिससे कि सृष्टि चल सके! आज भगवती कामाख्या के दरबार में जब मैंने देखा,(यह मेरा पहली बार नहीं है 25 वर्षों से लगभग भगवती के कृपा का अनुभव कर रहा हु) पूरब से लेकर पश्चिम तक,उत्तर से लेकर दक्षिण तक, भारतवर्ष में ही नहीं अपितु,मुस्लिम राष्ट्रों में भी,इस्लाम को मानने वाले लोग भी, बुत परस्ती करते हैं।। माध्यम कुछ भी हो?यह जो मूर्ति पूजा है या ईश्वरीय आराधना का कर्म है।

यह सामान्य व्यक्ति के समझ कि बाहर की बात है।। इसको समझने के लिए आपको बस इतना समझना होगा,कि दुनिया का कोई कोना मूर्ति पूजा,मंदिर व्यवस्था से अछूता नहीं है!नाम कुछ भी उन्होंने रखा हो और यह मूर्ति पूजा और मंदिर व्यवस्था सनातन की देन है।। इसलिए इसका खंडन करने से पहले 1000 बार चिंतन करे!! एक बात और हर मंदिर पर नृत्य की मुद्रा,संगीत के वाद्य यंत्र,इस बात को संकेत देते हैं की नृत्य और संगीत मंदिर की तरह ही पवित्र है!लेकिन जिस तरह से नृत्य और संगीत को कई बार गाली जैसे शब्दों की तरह संबोधित करते हैं,लोग? की यह नाचने गाने वाले हैं?? यह फिर सोचिएगा की समाज मे बौद्धिक स्तर का किस तरह से हनन किया गया है।। आप उलझते चले गए और अपने श्रेष्ठ आयामों को तोड़ते जा रहे हैं? दुनिया में अगर मूर्ति पूजा और मंदिर व्यवस्था जैसी व्यवस्था है!सभी के पास चाहे,वह इसाई हो,मुसलमान हो, यहूदी हो, पारसी हो,कोई भी हो!! तो वह कहीं ना कहीं से सनातन से प्रभावित हुआ है और शोध करने की जरूरत है सनातन के मंदिर व्यवस्था को गाली देने की जगह अस्तु…..

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