डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

मिली है उम्र बहुत कम, संभाल कर रखो, दिलों में बुग़्ज़ ना यूँ पाल पाल कर रखो।
सफ़र ये एक पल का है, रास्ता भी कठिन, मोहब्बतों को ज़ाद-ए-सफ़र बना कर रखो।
अजीब लोग हैं जो यूं उम्र ज़ाया करते हैं, दूसरों के दामन पे न मिट्टी उछाल के रखो।
फ़ेंकोगे कीचड़ हाथ हो जाएंगे गंदे आपके, कभी तो ख़ुलूस की सूरत सँवार कर रखो।
किसी को गिराने से तुम बुलंद हो जाओगे बोलो, अपने क़दम भी तो सीधी राह पे चला कर रखो।
ये ज़िंदगी है अमानत, इसे नेकियों में ढालो तुम, यही चराग़-ए-वफ़ा अपने साथ जला कर रखो।
मुश्ताक़’ इन नफ़रतों से कुछ न होगा हासिल, दिलों में शम्मा मुहब्बत की अपने जला कर रखो।




