मैडम जी “आप अपनी तरह बनिए।” “जो हो, जैसे हो, वैसे ही रहिए”, “यदि दूसरों के लिए स्वयं को बदलना इतना ही आवश्यक होता तो कुदरत ने सबको एक-दूसरे से यूं भिन्न बनाया ही ना होता ।

अरे मैडम जी! क्या गजब की बहकी-बहकी बातें करती हैं आप। कह रही हैं—”आप अपनी तरह बनिए”, “जो हो, जैसे हो, वैसे ही रहिए”! तौबा-तौबा, इस ज़माने में ऐसी बातें? अगर आपकी यह ‘जैसी हो, वैसी रहो’ वाली दकियानूसी बात सबने मान ली, तो मोहल्ले के ब्यूटी पार्लर वाले भूखों मर जाएँगे और सोशल मीडिया के वो ‘पर्सनालिटी ग्रूमिंग’ वाले इन्फ्लुएंसर्स अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर हिमालय चले जाएँगे। आप कह रही हैं कि “यदि दूसरों के लिए स्वयं को बदलना इतना ही आवश्यक होता तो कुदरत ने सबको एक-दूसरे से यूं भिन्न बनाया ही ना होता”। अरे मैडम जी, कुदरत तो भोली है, उसे क्या पता कि आजकल कद्र ‘कुदरती’ की नहीं, ‘बनावटी’ की होती है! कुदरत ने तो सबको अलग बनाया था ताकि दुनिया में वैरायटी रहे, लेकिन हमारे समाज को वैरायटी से सख्त एलर्जी है। यहाँ तो सबको एक ही सांचे में ढलना है—वही नकली मुस्कान, वही नाप-तोल कर की गई बातें, और वही दूसरों को खुश करने वाला ‘परफेक्ट’ मुखौटा।

अगर आप जैसी हैं वैसी ही रहेंगी, तो लोग आपको ‘इगोइस्टिक’ या ‘अड़ियल’ घोषित कर देंगे। दूसरों के लिए खुद को मोमबत्ती की तरह पिघलाना और गिरगिट की तरह रंग बदलना ही तो आजकल का ‘स्मार्टनेस’ है। अगर शर्मा जी को कड़वी कॉफी पसंद है, तो आपको अपनी मीठी चाय छोड़कर कड़वा घूंट पीना ही पड़ेगा, वरना आप ‘आउटडेटेड’ कहलाएंगी। कुदरत ने हमें भिन्न बनाया, यह कुदरत की गलती थी। अब समाज उस गलती को सुधारने में लगा है। सबको एक जैसा ‘पॉलिश’ किया जा रहा है ताकि कोई अलग न दिखे। इसलिए मैडम जी, ये ‘खुद को स्वीकार करने’ का ज्ञान जरा संभाल कर रखिए। आज का दौर तो यही कहता है—”जैसे तुम हो, वैसे तो बिल्कुल मत रहो; क्योंकि दुनिया को तुम नहीं, तुम्हारी जगह कोई और चाहिए!”

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