यूजीसी आंदोलन और राजनीतिक दलों की रहस्यमयी चुप्पी: क्या सवर्ण सिर्फ वोट बैंक और बंधुआ मजदूर बनकर रह गए हैं?

यूजीसी आंदोलन और इसके प्रति राजनीतिक दलों की उदासीनता भारतीय लोकतंत्र के एक स्याह पहलू को उजागर करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि आज की राजनीति में नीतियां और न्याय इस आधार पर तय नहीं होते कि मांग कितनी सही है, बल्कि इस आधार पर तय होते हैं कि उस मांग के पीछे कितना बड़ा और आक्रामक वोट बैंक खड़ा है।


देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में फेलोशिप, भर्ती प्रक्रियाओं और प्रशासनिक विसंगतियों को लेकर समय-समय पर होने वाले यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) आंदोलनों ने एक बार फिर गंभीर शक्ल अख्तियार कर ली है। लेकिन इस बार का परिदृश्य पहले से जुदा और बेहद परेशान करने वाला है। दिल्ली की सड़कों से लेकर देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों के द्वारों पर अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्र और युवा शोधार्थी पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। लहूलुहान होते आंदोलनकारी, आंसुओं से भीगी आंखें और बिखरी हुई किताबें आज के इस युवा आंदोलन की पहचान बन चुकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम में जो बात सबसे ज्यादा हैरान और विचलित करने वाली है, वह है मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों की रहस्यमयी और मुकम्मल चुप्पी। सत्तापक्ष तो दूर, खुद को जनता का मसीहा बताने वाला विपक्ष भी इस मुद्दे पर पूरी तरह गायब नजर आ रहा है। लाठियों से पीटते हुए ये आंदोलनकारी आज खुद को नितांत अकेला, निरीह और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इस सन्नाटे ने एक नए और कड़वे विमर्श को जन्म दे दिया है। क्या देश का सवर्ण और मध्यमवर्गीय युवा राजनीतिक दलों के लिए सिर्फ एक सुरक्षित ‘वोट बैंक’ है? क्या एक विशेष विचारधारा या पार्टी ने इन्हें अपना ‘बंधुआ मजदूर’ मान लिया है, जिसे रीझने या जिसकी आवाज उठाने की अब कोई जरूरत ही महसूस नहीं की जाती?

यूजीसी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जारी यह आंदोलन कोई रातों-रात खड़ा हुआ संकट नहीं है। यह फेलोशिप की राशि में समय पर बढ़ोतरी न होने, शोधार्थियों को मिलने वाले फंड में कटौती, और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में संकाय सदस्यों (Faculty) की भर्ती में पारदर्शिता की कमी के खिलाफ उपजा एक संचित आक्रोश है। देश के सबसे मेधावी युवा, जो देश के विकास में अपनी बौद्धिक आहुति देने की तैयारी कर रहे थे, आज सड़कों पर घसीटे जा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जो राजनीतिक दल छोटे-छोटे क्षेत्रीय या जातिगत मुद्दों पर संसद से लेकर सड़क तक ठप कर देते हैं, वे इस छात्र आंदोलन से पूरी तरह किनारा किए हुए हैं। किसी भी बड़े राजनीतिक चेहरे ने इन छात्रों के बीच जाकर उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। न तो सोशल मीडिया पर इसके समर्थन में कोई बड़ा अभियान दिखा और न ही किसी दल के आधिकारिक घोषणापत्र या बयानों में इन युवाओं के दर्द को जगह मिली। राजनीतिक दलों का यह गायब होना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

इस आंदोलन की संरचना और इसमें शामिल युवाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें, तो एक कड़वी सच्चाई उभरकर सामने आती है। इस आंदोलन का नेतृत्व और इसमें भारी भागीदारी करने वाला तबका मुख्य रूप से सामान्य वर्ग (सवर्ण) और उच्च-मध्यम वर्ग से आता है। आज इन छात्रों के बीच यह धारणा घर कर गई है कि उन्हें सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय राजनीति अब पूरी तरह से पहचान (Identity) और जातिगत गणित (Caste Calculus) के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है। राजनीतिक दलों ने यह मान लिया है कि सवर्ण मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा किसी एक खास पार्टी या विचारधारा के प्रति वैचारिक रूप से इतना प्रतिबद्ध या ‘मजबूर’ हो चुका है कि वह चाहे जितना भी प्रताड़ित हो, चुनाव के समय जाएगा तो उसी पाले में। जब किसी वर्ग का वोट पहले से ही तय (Assured) मान लिया जाता है, तो पार्टियां उसकी समस्याओं पर ध्यान देना बंद कर देती हैं। यही वह स्थिति है जिसे आंदोलनकारी छात्र अपनी भाषा में ‘बंधुआ मजदूरी’ और ‘ठगा हुआ’ महसूस करना कह रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनकी वफादारी को दलों ने उनकी कमजोरी समझ लिया है।

राजनीतिक दलों द्वारा युवाओं और सवर्ण आंदोलनकारियों की इस तरह की जा रही अनदेखी के दूरगामी और विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। इसे केवल एक छात्र आंदोलन के दमन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके प्रभाव समाज के हर ढांचे पर पड़ेंगे। जब देश के शीर्ष शोधार्थियों और छात्रों को लगेगा कि योग्यता और शांतिपूर्ण संघर्ष की इस तंत्र में कोई कीमत नहीं है, तो वे विदेशों का रुख करेंगे। देश अपनी बेहतरीन प्रतिभाओं को खो देगा, जिसका सीधा असर भारत के वैश्विक अनुसंधान और विकास (R&D) रैंकिंग पर पड़ेगा। जब युवा देखेंगे कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बदले उन्हें सिर्फ लाठियां मिलती हैं और कोई भी राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा नहीं होता, तो उनका लोकतंत्र, चुनाव और न्याय प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा। यह अलगाव देश के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। यह सुलगता हुआ आक्रोश आने वाले समय में एक बड़े सामाजिक और राजनैतिक असंतोष का रूप ले सकता है। जब एक वर्ग लगातार खुद को उपेक्षित और शोषित महसूस करेगा, तो वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त करने के लिए नए रास्ते तलाशेगा। शोधार्थियों की अनदेखी और विश्वविद्यालयों का राजनीतिकरण अंततः उच्च शिक्षा के स्तर को गिरा देगा, जिससे देश के डिग्रीधारी युवा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएंगे।

यूजीसी आंदोलन और इसके प्रति राजनीतिक दलों की उदासीनता भारतीय लोकतंत्र के एक स्याह पहलू को उजागर करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि आज की राजनीति में नीतियां और न्याय इस आधार पर तय नहीं होते कि मांग कितनी सही है, बल्कि इस आधार पर तय होते हैं कि उस मांग के पीछे कितना बड़ा और आक्रामक वोट बैंक खड़ा है। निरीह और ठगे जा रहे इन आंदोलनकारियों की लाठियां और आंसू सत्ता और विपक्ष दोनों के चरित्र पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं। यदि राजनीतिक दलों ने समय रहते अपनी इस ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (कमतर आंकने की) मानसिकता को नहीं बदला और युवाओं को सिर्फ बंधुआ वोट बैंक समझना बंद नहीं किया, तो आने वाले समय में देश के जागरूक युवा इस खामोशी का जवाब राजनीतिक बदलाव और सामाजिक पुनर्गठन के जरिए देने को मजबूर होंगे। शिक्षा और योग्यता का सम्मान किए बिना कोई भी राष्ट्र ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा नहीं कर सकता।

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