महंगाई का हाहाकार: आम जनता का जीना मुहाल, कुर्सी के खेल में उलझी सरकार

आज देश का हर नागरिक एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां उसकी बुनियादी जरूरतें ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी हैं। रसोई गैस का सिलेंडर हो, पेट्रोल-डीजल की कीमतें हों, या फिर दाल, चावल और सब्जियों के दाम हर चीज आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। चारों तरफ महंगाई का हाहाकार है।

मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों के लिए सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक का सफर एक मानसिक तनाव बन चुका है। लेकिन इस भीषण आर्थिक संकट के बीच, सत्ता के गलियारों में केवल एक ही चिंता दिखाई देती है। कुर्सी को कैसे बचाया जाए और राजनीतिक समीकरणों को कैसे साधा जाए। मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों का बजट पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। कुछ समय पहले तक जो थाली संतुलित और पौष्टिक हुआ करती थी, आज वह महंगाई की मार के कारण सिकुड़ चुकी है। टमाटर, प्याज और आलू जैसी बुनियादी चीजें भी अब आम आदमी को डरा रही हैं। अरहर और उड़द जैसी दालों की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि वे अब थाली से गायब होने लगी हैं। हर दो-तीन महीने में दूध और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ा दी जाती हैं, जिससे बच्चों के पोषण पर सीधा असर पड़ रहा है। एक आम वेतनभोगी व्यक्ति या दिहाड़ी मजदूर की कमाई वहीं की वहीं है, लेकिन उसका खर्च दोगुना से ज्यादा हो चुका है।

बच्चों की स्कूल फीस, बुजुर्गों की दवाइयां और मकान का किराया देने के बाद महीने के आखिरी दिनों में जेब पूरी तरह खाली हो जाती है। जनता पूछ रही है कि आखिर इस कमरतोड़ महंगाई का अंत कब होगा? महंगाई की इस आग को सबसे ज्यादा हवा पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की आसमान छूती कीमतों से मिल रही है । डीजल महंगा होने के कारण ट्रकों का किराया बढ़ता है, जिससे गांवों से शहरों तक आने वाला हर अनाज और सब्जी महंगी हो जाती है। एलपीजी सिलेंडर की ऊंची कीमतों ने गरीब महिलाओं को दोबारा चूल्हा और लकड़ी जलाने पर मजबूर कर दिया है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं कागजी साबित हो रही हैं। सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों का हवाला देकर हर बार अपना पल्ला झाड़ लेती है। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होती हैं, तब उस अनुपात में आम जनता को कोई राहत नहीं दी जाती। टैक्स का भारी बोझ जनता की पीठ पर लाद दिया गया है।

जनता की इस बेबसी और चीख-पुकार के बीच देश का राजनीतिक परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। सत्ता में बैठे नीति-निर्माताओं को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें जनता की तकलीफों से कोई सरोकार ही नहीं है। उनका पूरा ध्यान केवल और केवल सत्ता की कुर्सी को सुरक्षित रखने पर है। एक तरफ जनता पाई-पाई को मोहताज है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों-अरबों रुपये राजनीतिक रैलियों, विज्ञापनों और चुनाव प्रचार में बहाए जा रहे हैं। विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त, गठबंधनों को तोड़ने और बनाने में जितनी ऊर्जा और समय लगाया जाता है, उसका आधा भी अगर महंगाई नियंत्रण की नीतियों पर लगाया जाता, तो आज देश की स्थिति अलग होती। जब भी जनता महंगाई, बेरोजगारी और गिरती अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाती है, तो सरकार और उसके तंत्र द्वारा कोई नया धार्मिक, भावुक या ध्रुवीकरण करने वाला मुद्दा सामने ला दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के लिए जनता सिर्फ चुनाव के दिन वोट देने वाली एक मशीन है। चुनाव खत्म होते ही जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है और सत्ताधीश अपनी ‘कुर्सी’ को मजबूत करने के लिए कॉरपोरेट मित्रों और राजनीतिक जोड़-तोड़ के यार बन जाते हैं। महंगाई का असर तब और जानलेवा हो जाता है जब देश में रोजगार के अवसर लगातार कम हो रहे हों।

युवाओं के पास डिग्रियां हैं, लेकिन नौकरियां नहीं हैं। निजी क्षेत्र में छंटनी का दौर जारी है और वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। जब आमदनी स्थिर या कम हो रही हो और खर्च लगातार बढ़ रहा हो, तो समाज में मानसिक तनाव, अवसाद और अपराध की घटनाएं बढ़ने लगती हैं। अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन और स्थानीय साहूकारों के चंगुल में फंस रहे हैं। इस संकट के लिए केवल वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि सरकार की गलत आर्थिक नीतियां और अदूरदर्शिता भी मुख्य कारण हैं। कॉरपोरेट टैक्स में भारी छूट दी जाती है, लेकिन आम जनता पर अप्रत्यक्ष करों (GST) का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है। आटा, दही और अस्पताल के कमरों जैसी आवश्यक सेवाओं पर भी टैक्स लगा दिया गया है। जब संसद या सार्वजनिक मंचों पर इस विषय पर चर्चा की मांग की जाती है, तो विपक्ष के सवालों को दबा दिया जाता है या फिर पुरानी सरकारों की कमियों का रोना रोकर वर्तमान की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे दुखद पहलू है, जहां शासक वर्ग अपनी जनता के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन हो चुका है।

“महंगाई का हाहाकार, जीना मुश्किल और सरकार कुर्सी का यार” यह केवल एक नारा या शीर्षक नहीं है, बल्कि आज के भारत की कड़वी सच्चाई है। इतिहास गवाह है कि जब-जब राजा जनता के दुखों से आंखें मूंदकर केवल अपनी गद्दी बचाने में मग्न हुआ है, तब-तब देश गहरे संकट में डूबा है।

सरकार को यह समझना होगा कि गद्दी हमेशा रहने वाली नहीं है। यदि समय रहते जमाखोरी पर लगाम नहीं लगाई गई, ईंधन पर टैक्स कम नहीं किया गया, और आम जनता को सीधी राहत देने वाली नीतियां नहीं बनाई गईं, तो जनता का यह खामोश गुस्सा किसी दिन बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है। लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है, और कुर्सी की यारी निभाने वाली सरकारों को वक्त आने पर जनता अपनी ताकत का अहसास जरूर कराती है।

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