डिजिटल इंडिया के इस दौर में देश की राजनीति और धर्म का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब चुनावी रैलियों की भीड़ या धार्मिक स्थलों की तपस्या से बड़े नेता या गुरु नहीं बन रहे, बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन, एल्गोरिदम की मेहरबानी और रील्स (Reels) के जरिए रातों-रात ‘मसीहा’ खड़े किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया के इको-चेंबर (Echo Chamber) से पैदा हुए ये रेंट-ए ओपिनियन नेताजी और ‘इंस्टा-बाबा’ (डिजिटल गुरु) आज करोड़ों की आबादी को प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि इनका जमीनी हकीकत, वास्तविक मुद्दों और जनता की मूलभूत समस्याओं से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।

आज मैं आंकड़ों और विश्लेषण के जरिए इसी ‘आभासी छलावे’ (Virtual Illusion) की परतें खोलूँगा, जो भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक ताने-बाने को एक खोखले विमर्श की ओर धकेल रहा है।भारत में सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रसार जिस तेजी से हुआ है, उसने इन ‘आभासी नायकों’ के लिए एक उपजाऊ जमीन तैयार की है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या 90 करोड़ (900 मिलियन) को पार कर चुकी है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट (Reuters Institute) की रिपोर्ट के अनुसार, 70% भारतीय अब ऑनलाइन समाचार देखना पसंद करते हैं, जिनमें से आधे (50%) सीधे तौर पर सोशल मीडिया से अपनी जानकारी लेते हैं। मार्च 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले इंस्टाग्राम के भारत में 51.7 करोड़ (517.6 मिलियन) से अधिक सक्रिय यूजर्स हैं, जो कुल सोशल मीडिया ट्रैफिक का लगभग 43.93% है। वहीं यूट्यूब के पास 49 करोड़ से अधिक यूजर्स का आधार है। फिक्की (FICCI) और अर्न्स्ट एंड यंग (EY) की रिपोर्ट बताती है कि भारत का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग उद्योग साल 2026 तक ₹3,375 करोड़ का हो चुका है। इस विशाल डेटा और व्यूज (Views) के खेल ने गंभीर राजनीतिज्ञों और सच्चे आध्यात्मिक गुरुओं की जगह ‘कंटेंट क्रिएटर्स’ को दे दी है। पारंपरिक रूप से भारत में नेता वही बनता था जो तपती धूप में पदयात्रा करता था, जनता के सुख-दुख में शामिल होता था और संगठन की जमीनी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आता था। लेकिन आज ‘कीबोर्ड वॉरियर्स’ और ‘पॉडकास्ट एक्टिविस्ट्स’ का नया दौर है। ये सोशल मीडिया से उपजे नेताजी एसी कमरों में बैठकर ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर हैशटैग चलाते हैं, यूट्यूब पर सरकार या विपक्ष के खिलाफ सनसनीखेज वीडियो बनाते हैं और खुद को जननायक घोषित कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को ‘ट्रेंड’ कराना और जमीन पर उसके लिए लोगों को जुटाना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। इसका सबसे सटीक उदाहरण हाल ही में देखने को मिला। जून 2026 में सोशल मीडिया पर 2 से 3 करोड़ की ऑनलाइन फैन-फॉलोइंग का दावा करने वाली एक नवगठित ‘डिजिटल पार्टी’ (कॉकरोच जनता पार्टी) ने जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना पहला जमीनी प्रदर्शन किया, तो वहां शुरू में बमुश्किल 1,000 से 2,000 लोग ही इकट्ठा हो सके पर जब कॉंग्रेस , सपा , कम्यूनिष्ट पार्टी और रावण का सहयोग मिला तो आन्दोलन सफल हुआ । यह घटना साबित करती है कि इंटरनेट पर मिलने वाले ‘मिलियंस ऑफ व्यूज’ कभी भी वास्तविक ‘वोट बैंक’ या ‘जनसमर्थन’ की गारंटी नहीं होते। इसे समाजशास्त्र की भाषा में ‘स्लैकटिविज़्म’ (Slacktivism) कहा जाता है यानी बिना किसी वास्तविक शारीरिक या आर्थिक प्रयास के केवल एक बटन दबाकर क्रांति का हिस्सा बनने का भ्रम पालना। ये नेता कभी भी कठिन नीतिगत सवालों (Policy Questions) या पत्रकारों के तीखे तीरों का सामना नहीं करते। ये बड़े-बड़े इन्फ्लुएंसर्स के पॉडकास्ट पर जाते हैं, जहां इनसे केवल ‘सॉफ्ट सवाल’ पूछे जाते हैं (जैसे- “आप आम चूसकर खाते हैं या काटकर?” या “आपकी फिटनेस का राज क्या है?”)। यूनेस्को-इप्सोस (UNESCO-Ipsos) के एक सर्वे के मुताबिक, 64% शहरी भारतीयों का मानना है कि सोशल मीडिया विमर्श को गंभीर बनाने के बजाय नफरत भरे भाषणों और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है। राजनीति से भी भयावह स्थिति धर्म के क्षेत्र में है। भारत संतों और ऋषियों की भूमि रहा है, जिन्होंने जंगलों और आश्रमों में रहकर ज्ञान की खोज की और समाज को सही राह दिखाई। लेकिन आज के ‘इंस्टा-बाबा’ और ‘यूट्यूब गुरुजी’ का अध्यात्म कैमरे के एंगल, बैकग्राउंड म्यूजिक, ड्रामेटिक लाइटिंग और एल्गोरिदम के हिसाब से तय होता है।
इन गुरुओं की यूएसपी (USP) कोई गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, बल्कि ‘क्लिकबेट हेडलाइंस’ और ‘चमत्कारिक दावे’ हैं। कोई बाबा रील्स पर सांप के काटने का मंत्र बता रहा है, तो कोई पर्चा निकालकर लोगों का भूतकाल बताने का दावा कर रहा है, तो कोई महिलाओं को अजीबोगरीब गुरु-मंत्र देकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जुलाई 2024 में एक सोशल मीडिया बाबा का वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने दावा किया कि एक विशेष मंत्र पढ़ने से सांप दूर भाग जाता है। जीवविज्ञानियों और डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि ऐसे दावों के कारण लोग अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक में समय गंवाते हैं, जिससे मौतें होती हैं। ‘अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद’ (ABAP) ने खुद समय-समय पर दर्जनों ऐसे ‘फर्जी बाबाओं’ की सूची जारी की है, जो किसी भी पारंपरिक अखाड़े या गुरु-परंपरा से नहीं आते, बल्कि विशुद्ध रूप से सोशल मीडिया के जरिए अपना साम्राज्य खड़ा कर चुके हैं। दिल्ली के एक प्रसिद्ध मैनेजमेंट संस्थान (श्री शारदा इंस्टीट्यूट) के डायरेक्टर और खुद को आध्यात्मिक गुरु बताने वाले एक बाबा पर जब 2025 के अंत में जांच बैठी, तो उनके फोन से 19 महिलाओं के यौन शोषण और अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी के व्हाट्सएप चैट्स बरामद हुए। यह इस बात का प्रमाण है कि सोशल मीडिया की चमचमाती आभा के पीछे कितना गहरा अंधकार छिपा है।
सोशल मीडिया के इस गठजोड़ का समाज पर बहुत असर हो रहा है?
| क्षेत्र | सोशल मीडिया का दावा | ज़मीनी हकीकत |
|---|---|---|
| रोजगार व अर्थव्यवस्था | रील और वीडियो में भारत को विश्वगुरु और हर युवा को डिजिटल उद्यमी दिखाना। | सीएमआईई (CMIE) और अन्य डेटा के अनुसार, युवाओं में बेरोजगारी और वास्तविक कौशल की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। |
| राजनीतिक जागरूकता | जनता को जागरूक और सीधे तौर पर सशक्त बनाना। | न्यूजचेकर (NewsChecker) के अनुसार, 38% फर्जी खबरें और डीपफेक ‘वेरिफाइड’ (ब्लू टिक) पेजों से फैलते हैं。 |
| मानसिक स्वास्थ्य | ‘डिजिटल कम्युनिटी’ और शांति का अहसास कराना। | भारत सरकार के इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में स्पष्ट रूप से माना गया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग से किशोरों में डिप्रेशन, तनाव और ध्यान भटकने की गंभीर बीमारियां बढ़ी हैं। |
जब देश की राजनीति और धर्म दोनों ही ‘इंप्रेशन’ (Impressions) और ‘क्लिक’ (Clicks) से संचालित होने लगें, तो देश के वास्तविक और बुनियादी मुद्दे पूरी तरह से पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। सोशल मीडिया के ये नेताजी और गुरुजी कभी भी किसानों की बदहाली, सरकारी स्कूलों की जर्जर व्यवस्था, अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, प्रदूषण या इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों पर बात नहीं करते, क्योंकि इन गंभीर विषयों पर रील्स नहीं बनतीं और न ही इनसे ‘इंस्टेंट व्यूज’ मिलते है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया ने पारंपरिक ‘पार्टी कार्यकर्ताओं’ (Ground Workers) की भूमिका को खत्म कर दिया है।
अब पार्टी आलाकमान सीधे सोशल मीडिया टीम के जरिए नैरेटिव सेट करता है, जिससे जमीनी स्तर से उठने वाली जनता की आवाजें ऊपर तक पहुंच ही नहीं पातीं। पहले नेताओं को जनता के बीच जाना पड़ता था, जहां उनसे कड़े सवाल पूछे जाते थे। आज नेताजी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ‘कमेंट सेक्शन’ बंद करके या केवल अपनी तारीफ वाले कमेंट्स को प्रमोट करके एक सुरक्षित झूठी दुनिया (Echo Chamber) में जीते हैं। सोशल मीडिया एक बेहतरीन उपकरण हो सकता है, लेकिन यह कभी भी वास्तविक नेतृत्व या सच्ची आध्यात्मिकता का विकल्प नहीं बन सकता। भारत सरकार द्वारा 2026 में लाए जा रहे नए आईटी नियमों (IT Second Amendment Rules) के तहत अब इन डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स और ओपिनियन मेकर्स को भी ‘पब्लिशर्स’ की तरह कानूनी रूप से जवाबदेह बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन अंतिम जिम्मेदारी देश की जनता की है। जब तक भारतीय नागरिक रील्स के 15 सेकंड के ज्ञान को अपनी राजनीति और धर्म का आधार मानते रहेंगे, तब तक जमीन से कटे हुए ये आभासी नेता और पाखंडी बाबा देश को गुमराह करते रहेंगे। देश व्हाट्सएप फॉरवर्ड या इंस्टाग्राम रील्स से नहीं, बल्कि ज़मीन पर पसीना बहाने और लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने से बदलता है।




