“यूजीसी वापस लो” के नारे से इस समय पूरा देश गूँज रहा है और उच्च जातियों (सवर्ण समाज) की बढ़ती नाराजगी केंद्र की मोदी सरकार पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी इक्विटी रेगुलेशंस 2026 और आरक्षण व्यवस्था में सुधारों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के कई राज्यों में सवर्णों का एक बड़ा जनसैलाब सड़कों पर उतर आया है। सोशल मीडिया से शुरू हुआ ‘यूजीसी रोलबैक’ और ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ अब एक राष्ट्रव्यापी राजनीतिक संकट में तब्दील हो चुका है, जिसने सरकार को बैकफुट पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।

इस देशव्यापी आक्रोश की शुरुआत 13 जनवरी 2026 को हुई, जब यूजीसी ने UGC Equity Regulations, 2026 को अधिसूचित किया। इस नए कानून का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के लिए विशेष ‘इक्विटी समितियां’ और ‘इक्विटी स्क्वाड’ बनाना है।सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और विभिन्न सवर्ण संगठनों (जैसे करणी सेना और सवर्ण आर्मी) का आरोप है कि यह कानून पूरी तरह से एकतरफा है। उनका तर्क है कि इसमें सामान्य वर्ग के छात्रों को सुरक्षा देने का कोई प्रावधान नहीं है और इसके लागू होने से परिसरों में जातिवाद बढ़ेगा। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, उचित सुरक्षा उपायों के अभाव में इस कानून का दुरुपयोग SC/ST एक्ट की तरह निजी रंजिश निकालने और सामान्य वर्ग के मेधावी छात्रों के करियर को तबाह करने के लिए किया जा सकता है।

इस आंदोलन की भयावहता और सवर्ण समाज की नाराजगी को यह प्रमुख घटनाक्रमों के माध्यम से समझा जा सकता है। दिल्ली पुलिस द्वारा राष्ट्रीय राजधानी में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (तत्कालीन धारा 144 CrPC) लागू किए जाने और विरोध प्रदर्शन की अनुमति न देने के बावजूद, हजारों की संख्या में युवा और प्रदर्शनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस के बाहरी सर्कल में एकत्र हुए। ‘Reservation Hatao Andolan’ (RHA) जैसे डिजिटल मंच, जिनके इंस्टाग्राम पर 5.6 मिलियन (56 लाख) से अधिक फॉलोअर्स हैं, इस आंदोलन के मुख्य रणनीतिकार बनकर उभरे हैं। इस मंच ने पूर्व में हुए नीट (NEET) पेपर लीक विरोधी छात्र आंदोलनों की तर्ज पर युवाओं को जमीनी स्तर पर लामबंद किया है। राजस्थान के जयपुर नोएडा सहित कई शहरों में आयोजित ‘सवर्ण महापंचायतों’ ने सरकार की नींद उड़ा दी है। करणी सेना के राष्ट्रीय नेताओं ने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यूजीसी नियमों को स्थायी रूप से निरस्त नहीं किया, तो देश भर में ट्रेनों और वाहनों को रोककर चक्का जाम किया जाएगा। इस कानून के खिलाफ भाजपा के भीतर भी असंतोष की लहर है। कई अग्रिम पंक्ति के सवर्ण भाजपा नेताओं ने अपनी ही सरकार के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करते हुए इस्तीफे दिए हैं, जिससे सरकार के भीतर एक गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है।
विवाद गहराने के बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इन नियमों को “अस्पष्ट (vague)” और “दुरुपयोग के योग्य” पाया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि इन प्रावधानों के व्यापक और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं जो समाज को विभाजित कर सकते हैं। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी कर UGC 2026 Equity Regulations के कार्यान्वयन पर पूरी तरह से रोक (Abeyance) लगा दी और अंतरिम व्यवस्था के तौर पर 2012 के पुराने नियमों को ही प्रभावी रखने का आदेश दिया।
प्रदर्शनकारी केवल अदालत की रोक से संतुष्ट नहीं हैं, वे इस कानून को पूरी तरह से समाप्त करने और आरक्षण व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की मांग कर रहे हैं। नियमों को केवल स्थगित रखने के बजाय सरकार इन्हें हमेशा के लिए वापस ले। सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative action) और छात्रवृत्तियों का आधार जाति न होकर पूरी तरह से उम्मीदवार की आर्थिक स्थिति (Economic Status) होनी चाहिए। कोटा प्रणाली का लाभ एक परिवार में केवल एक बार या एक ही पीढ़ी को मिले ताकि इसका दोहरा लाभ रोका जा सके। यदि कोई एंटी-डिस्क्रीमिनेशन कमेटी बनती है, तो उसमें सामान्य वर्ग (General Category) का भी एक प्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल हो और झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान हो।
सवर्ण समाज पारंपरिक रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एक मजबूत और वफादार वोट बैंक माना जाता रहा है। आगामी राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार इस बड़े सामाजिक वर्ग की नाराजगी मोल लेने का जोखिम नहीं उठा सकती। इसी राजनीतिक दबाव का नतीजा है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह यूजीसी इक्विटी विनियम 2026 पर पुनर्विचार (Reconsideration) कर रही है। सरकार के इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक एक बड़े ‘यू-टर्न’ और सवर्णों के भारी आक्रोश के सामने सरकार के झुकने के रूप में देख रहे हैं।
“यूजीसी वापस लो” आंदोलन ने भारत में योग्यता बनाम आरक्षण (Merit vs Politics) की पुरानी और संवेदनशील बहस को एक बार फिर हवा दे दी है। जहां समाज का एक बड़ा हिस्सा इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ मानता है, वहीं सवर्ण युवाओं का मानना है कि समानता के नाम पर उनके साथ संस्थागत भेदभाव किया जा रहा है। सरकार के लिए चुनौती अब बेहद कठिन है: उसे एक तरफ जहां हाशिए पर मौजूद वर्गों के अधिकारों और सुरक्षा को सुनिश्चित करना है, वहीं दूसरी तरफ देश के सवर्ण समाज के आक्रोश को शांत करना है जो अब आर-पार की लड़ाई के मूड में सड़कों पर उतर चुका है।




