डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’,हरदा, मध्य प्रदेश

भारतीय लोकतंत्र का आधार विविधता, सहअस्तित्व और विचार-विमर्श की समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में राजनीतिक विमर्श का स्तर जिस तेज़ी से गिरा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। चुनाव जीतने और सत्ता बचाने की होड़ में जिस प्रकार बेलगाम बयानबाज़ी हो रही है तथा समाज को धार्मिक ध्रुवीकरण की आग में झोंका जा रहा है, उसने देश के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आवेश में दिए गए बयान और गिरता राजनीतिक स्तर आज राजनीति जनसेवा तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार व अर्थव्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों से हटकर जनभावनाओं को भड़काने का ज़रिया बनती दिख रही है। नेता मंच संभालते ही आवेश में आकर ऐसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं जो सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती है। मुद्दों से भटकाव, जब काम और विकास के नाम पर वोट मांगना कठिन प्रतीत होने लगता है, तब धार्मिक ध्रुवीकरण को सबसे आसान रास्ता मान लिया जाता है। संवेदनहीनता,आवेश में दिए गए बयान भले ही तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए हों, लेकिन इनका ख़ामियाज़ा आम जनता को सांप्रदायिक तनाव, अविश्वास और भय के माहौल के रूप में भुगतना पड़ता है।

देश किस दिशा में जा रहा है? नफ़रत और ध्रुवीकरण की यह राजनीति देश को एक अत्यंत ख़तरनाक मोड़ पर ले जा रही है,
सामाजिक ताने-बाने का बिख़राव,भारत की मूल ताक़त उसकी “विविधता में एकता” रही है। जब आमजन के बीच धर्म के आधार पर अविश्वास का बीज बो दिया जाता है, तो समाज भीतर से कमज़ोर होने लगता है। आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव,कोई भी देश नफ़रत और अशांति के वातावरण में प्रगति नहीं कर सकता। निवेशक और उद्योग ऐसे माहौल से दूर रहते हैं जहाँ सामाजिक स्थिरता का अभाव हो। युवाओं का दिशाभ्रम,देश की जिस युवा ऊर्जा का उपयोग शिक्षा, नवाचार और निर्माण में होना चाहिए था, वह अक्सर इस प्रायोजित वैमनस्य की भेंट चढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय साख़ को धक्का,विश्व पटल पर भारत की पहचान एक सहिष्णु और तेज़ी से उभरते लोकतंत्र की रही है। ज़हरीली बयानबाज़ी और सांप्रदायिक वैमनस्य से देश की वैश्विक छवि प्रभावित होती है।
क्या इस पर लगाम नहीं लगनी चाहिए? बिल्कुल लगनी चाहिए, और यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि अब भी कठोर क़दम नहीं उठाए गए, तो लोकतंत्र की बुनियाद ही कमज़ोर पड़ जाएगी। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है,
चुनाव आयोग और न्यायपालिका की सख्त भूमिका, सिर्फ़ ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करने से सुधार संभव नहीं है। नफ़रत फैलाऊ भाषण देने वाले नेताओं के चुनाव लड़ने पर निश्चित अवधि के लिए कड़ा प्रतिबंध लगना चाहिए। राजनीतिक दलों की नैतिक जवाबदेही,राजनीतिक दलों को स्वयं आगे आकर नफ़रत फैलाने वाले नेताओं पर कठोर संगठनात्मक कार्रवाई करनी होगी,चाहे वे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हों। मीडिया की ज़िम्मेदारी,टीआरपी के चक्कर में उत्तेजक बयानों और धार्मिक बहसों को सनसनीखेज़ बनाकर प्रस्तुत करने वाले मंचों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

जनता की जागरूकता (सबसे महत्वपूर्ण),लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास है। जब तक नागरिक ‘फूट डालो और राज करो’ की इस नीति को पहचानकर विकास, शिक्षा और रोज़गार के मुद्दों पर वोट नहीं देंगे, तब तक राजनीति का यह ढर्रा नहीं बदलेगा।
सत्ता और सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश हमेशा रहता है। यदि सत्ता के लिए देश की एकता और शांति को दांव पर लगाया जाता रहेगा, तो इसका ख़ामियाज़ा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। अब समय आ गया है कि देश का नागरिक जाति और धर्म के चश्मे को उतारकर जनप्रतिनिधियों से उनके काम का हिसाब मांगे और नफ़रत फैलाने वाली हर ज़ुबान को अपने वोट की ताक़त से निरुत्तर करे।




