राममंदिर में चोरी , वोट चोरी और यूजीसी कानून ने आरएसएस और बीजेपी में दरार डाला ?

इन तीनों घटनाओं ने निश्चित रूप से भाजपा और आरएसएस के बीच के समन्वय तंत्र को परीक्षा में डाल दिया है। राम मंदिर जैसी पवित्र संस्था में भ्रष्टाचार, चुनावी शुचिता पर ‘वोट चोरी’ के आरोप, और यूजीसी जैसे नीतिगत मोर्चों पर असंतोष ने यह साफ कर दिया है कि आरएसएस अब सरकार के हर फैसले या प्रशासनिक चूक पर मूकदर्शक बने रहने के मूड में नहीं है।

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी, विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोप और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विवादित नियमों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वैचारिक और राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी असहजता पैदा कर दी है। इन तीनों समसामयिक मुद्दों ने न केवल विपक्ष को सरकार पर आक्रामक होने का मौका दिया है, बल्कि संघ परिवार के भीतर भी आंतरिक मंथन और असंतोष को हवा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों और संघ के आंतरिक सूत्रों के अनुसार, इन विवादों के कारण भाजपा की चुनावी छवि और आरएसएस की वैचारिक बुनियाद के बीच एक अदृश्य दरार साफ दिखाई देने लगी है। अयोध्या के भव्य श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए करोड़ों रुपये के दान और सोने-चांदी की कथित चोरी का मामला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) की अंतरिम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि सीसीटीवी फुटेज के अनुसार मंदिर की तिजोरी से 105 बार पैसे और चढ़ावे की चोरी की गई। इस मामले में पुलिस ने ट्रस्ट के आठ गणना कर्मियों को गिरफ्तार किया, जिसके बाद जनता और विपक्ष के भारी आक्रोश के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे बड़े पदाधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा।

अब बात करते हैं आरएसएस और भाजपा में दरार की ,यह विवाद सीधे तौर पर हिंदुत्व के उस वैचारिक कोर पर चोट करता है, जिसे भाजपा और आरएसएस ने पिछले चार दशकों से अपनी राजनीति का आधार बनाया है। कर्नाटक के बेलगावी में आयोजित आरएसएस अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक में इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने पारदर्शी प्रबंधन और दोषियों को सख्त सजा देने की मांग की। संघ का मानना है कि इस घटना से देश-विदेश के करोड़ों रामभक्तों की आस्था को ठेस पहुँची है, जिससे संघ परिवार की छवि धूमिल हुई है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा इस मुद्दे पर रक्षात्मक है। जहाँ एक तरफ विश्व हिंदू परिषद (VHP) इसे चुनावी मुद्दा न बनाने की अपील कर रही है, वहीं विपक्षी दल जैसे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इसे “राम नाम बदनाम न करो” के नारों के साथ भाजपा की ‘नैतिक विफलता’ के रूप में पेश कर रहे हैं। विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा पर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और परिसीमन के माध्यम से ‘वोट चोरी’ करने का गंभीर आरोप लगाया है। विपक्ष का दावा है कि सत्तारूढ़ दल सत्ता में बने रहने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है।

जानिए आरएसएस का दृष्टिकोण और भाजपा की रणनीति को , आरएसएस हमेशा से जमीनी स्तर पर सामाजिक समरसता और निष्पक्ष राष्ट्रवाद की वकालत करता रहा है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की साख पर उठने वाले सवाल संघ के कैडर को असहज करते हैं, क्योंकि वे जनता के बीच सीधे जवाबदेह होते हैं। जब भाजपा पर चुनावी प्रबंधन और ‘वोट बैंक’ की राजनीति को प्रभावित करने के आरोप लगते हैं, तो संघ के भीतर एक वर्ग का मानना होता है कि पार्टी वैचारिक मार्ग से भटककर केवल सत्ता केंद्रित होती जा रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए कुछ नए दिशानिर्देशों और नियमों को लेकर भी हाल के दिनों में तीखी बहस छिड़ी है। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियों और आरक्षण की नीतियों में बदलाव के प्रस्तावों ने सवर्ण समाज और आरक्षित वर्गों के बीच संतुलन को प्रभावित किया है। संघ का सामाजिक विंग (जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद – ABVP) हमेशा से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भारतीयता और सामाजिक न्याय के संतुलन का पक्षधर रहा है। संघ चाहता है कि कोई भी कानून समाज के किसी भी वर्ग चाहे वह उच्च जाति हो या वंचित वर्ग को असुरक्षित महसूस न कराए।सरकार द्वारा लागू किए जाने वाले प्रशासनिक नियमों (जैसे यूजीसी गाइडलाइंस) के कारण जब जमीन पर असंतोष बढ़ता है, तो उसका सीधा नुकसान भाजपा को भुगतना पड़ता है। हालिया सर्वे ‘मूड ऑफ द नेशन’ के अनुसार, यूजीसी विवाद और राम मंदिर मुद्दे के बाद उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में भाजपा के वोट शेयर में 2 से 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे दिल्ली से लेकर लखनऊ तक तनाव बढ़ा है। निश्चित रूप से भाजपा और आरएसएस के बीच के समन्वय तंत्र को परीक्षा में डाल दिया है। राम मंदिर जैसी पवित्र संस्था में भ्रष्टाचार, चुनावी शुचिता पर ‘वोट चोरी’ के आरोप, और यूजीसी जैसे नीतिगत मोर्चों पर असंतोष ने यह साफ कर दिया है कि आरएसएस अब सरकार के हर फैसले या प्रशासनिक चूक पर मूकदर्शक बने रहने के मूड में नहीं है। हालांकि, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इसे ‘स्थायी दरार’ कहना जल्दबाजी होगी। आरएसएस और भाजपा का वैचारिक अंतर्संबंध अत्यंत गहरा है। संघ द्वारा मंदिर ट्रस्ट में किए गए प्रशासनिक फेरबदल (जैसे पूर्व सैन्य अधिकारी जितेंद्र मिश्रा को सीईओ बनाना) यह दर्शाता है कि संघ डैमेज कंट्रोल और व्यवस्था सुधार के लिए सरकार पर दबाव बनाने में सक्षम है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इन आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटकर अपने मुख्य मतदाता आधार का विश्वास कैसे बहाल करती है।

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