राम मंदिर से चन्दा की चोरी और नेताओं का गाय खाने की सियासत, सियासत होती ही ऐसी है।

राम मंदिर के चन्दा चोर और गाय के मांस को खाने की पैरवी करने वाले नेताओं को गरियाइए, बाल पकड़कर घसीटकर उनको हम पब्लिक के बीच लाइए , कोर्ट से तुरंत दंडित करवाईए , कौन रोकेगा आपको देश के प्रधानमंत्री जी? ऐसे लोगों ने हम हिंदुओं को आपके बारे में सोंचने को मजबूर कर दिया है – सोशल मीडिया पर गुस्सा

सियासत होती ही ऐसी है। और यह तो राम मंदिर से चन्दा की चोरी और नेताओं का गाय खाने की सियासत है बाबू जी , सियासत होती ही ऐसी है।। जिसकी जैसी जाति होती है, उसकी उतनी ऐंठन होती है। इसी देश में एक समय यह भी हुआ देश की जनता खासकर हिंदुओं का दिल राम मंदिर में बसता था। शंका उसी समय से गंदगी की शुरुआत हो गई थी जब राम मंदिर के ट्रस्ट से पुराने संतों को दरकिनार कर आईएएस अधिकारी , कार चालक पर गोली चलाने के आदेश देने वाले आईएएस अधिकारियों को जगह दिया गया था ।

गांव गांव से पूजित होकर सवा करोड़ राम शिलाएं अयोध्या लाई गई थी। इन शिलाओं में मिट्टी से पकाई ईंटें अलग थी और सोना चांदी, हीरे, माणिक्य से बनी 1250 शिलाएं अलग से लाई गई थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि परमहंस रामचंद्र दास, डॉक्टर रामविलास वेदांती, विश्वनाथ दास शास्त्री और संघ के स्थानीय प्रचारक रामदयाल जी के साथ बैठकर हम इसकी गणना करते थे। मुझे याद है कि एक शिला मुंबई से लाई गई थी जो हीरे से बनाई गई थी। इस पर श्री राम लिखा हुआ था। एक जौहरी सरदार करतार सिंह ने बताया था कि ये अकेली शिला ही खरबों रुपए मूल्य की थी।

2002 तक ऐसी शिलाएं रखी हुई थी। उसी साल के अंत में ये बहुमूल्य राम शिलाएं गायब हो गई। इसके प्रभारी चंपत राय जी थे। इनकी देखरेख और सुरक्षा का जिम्मा चंपत राय का था। जब राम शिलाएं गायब होने की ख़बर मिली तो परमहंस रामचंद्र दास ने भयंकर विरोध किया था। उन्होंने हल्ला मचाना शुरु किया कि कैसे बिना ताला तोड़े ये रामशिलाएं गायब हो गई, जबकि पुलिस के पहरे में थी। परमहंस जी ने चिल्ला चिल्लाकर आरोप लगाया कि शिलाएं चंपत राय जी ने चोरी कराई है। इसके बाद वे लालकृष्ण आडवाणी से भी मिले थे। वे अटल बिहारी वाजपेयी से भी मिले थे। 2004 तक परमहंस जी लगातार राम शिलाओं के लिए लड़ते रहे, संघर्ष करते रहे और बीमार होकर दुनिया से चले गए। यह भी एक सियासत भी थी बबुआ । मोदी समर्थकों का इस मामले पर विरोध न जताना बताता है कि एक राजनेता के लिए उन्होंने राम जी के प्रति अपनी निष्ठा बेच डाली है।

इन दिनों राम मंदिर के चन्दा चोरी के मामले पर विपक्ष हमलावर है। जायज वजह भी है।आज राम मंदिर ट्रस्ट का मतलब भाजपा और आरएसएस का राज मतलब सवर्णों का राज। सवर्ण अब राम मंदिर ट्रस्ट पर पूरी तरह से काबिज हैं। इसलिए सूक्ष्म राजनीति के तहत भाजपा ने चंपत राय को अपना सिपाहसलार चुना। चंपत राय का राम मंदिर ट्रस्ट का बॉस बनने के बावजूद उनके मूल चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है। परिणाम आज चोरी और गवन की कहानी राम मंदिर का मतलब बना दिया है ।

यह मोहन भागवत की सियासत है। इसे ऐसे समझिए कि 2004 में जब अटलबिहारी वाजपेयी जैसा ब्राह्मण नेता के रहते भाजपा चुनाव जीत नहीं पाई तब उसने 2009 में लालकृष्ण आडवाणी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाया। लेकिन भाजपा कांग्रेसनीत यूपीए को सत्ता में आने से नहीं रोक सकी। तब मोहन भागवत ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाकर ओबीसी कार्ड खेला और उसे जीत मिली। यह कार्ड आरएसएस और भाजपा के लिए इतना लाभकारी साबित हुआ है कि 2014 से वह सत्तासीन है।

असल में सत्ता के शीर्ष पर कौन काबिज है, यह महत्वपूर्ण हाेता है। मोदी जी अपने देश वासियों में आपको पुनः हिंदुओं में अपना विश्वास पैदा करना होगा , उसका एक ही उपाय है राम मंदिर के चन्दा चोरों को ऐसा दंड दीजिए जो इतिहास बना दे ।

Change Language