राहुल गांधी को देशभर से मिल रहा वोट चोरी अभियान पर समर्थन ..

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा शुरू किए गए ‘वोट चोरी’ (Vote Chori) अभियान को देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापक जनसमर्थन और प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। हाल ही में मीडिया रिपोर्ट्स और आंतरिक चुनाव आयोग के घटनाक्रमों के बाद इस अभियान ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ द्वारा संचालित इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य चुनावी प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं को उजागर करना और देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा करना है।
राहुल गांधी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि देश में ‘वोट चोरी, कानून चोरी और संस्था चोरी’ का एक संगठित ढांचा काम कर रहा है। सितंबर 2026 में एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कुछ चुनिंदा मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग (ECI) और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने बेंगलुरु सेंट्रल के महादेवेपुरा विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहाँ 1 लाख से अधिक फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े गए या अनियमितताएं पाई गईं,
जिससे चुनाव के नतीजों पर सीधा असर पड़ा। विपक्ष का आरोप है कि एक ही व्यक्ति के कई राज्यों में नाम होना, समान EPIC नंबर होना और संदिग्ध पतों पर बड़ी संख्या में मतदाताओं का पंजीकृत होना जैसे गंभीर चुनावी लूपहोल्स मौजूद हैं। राहुल गांधी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के नीतिगत फैसले पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रह गए हैं, जिसके चलते उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की भी मांग की है। कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की डिजिटल टीम द्वारा संचालित अधिकारिक वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के अनुसार, इस मुहिम को जनता का भारी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस के दावों के अनुसार, लाखों की संख्या में लोगों ने ‘वोट चोरी’ के खिलाफ ऑनलाइन डिजिटल समर्थन पत्र डाउनलोड किए हैं और दिए गए हेल्पलाइन नंबरों पर मिस्ड कॉल के जरिए अपनी सहमति दर्ज कराई है। राहुल गांधी इस मुद्दे को लेकर लगातार रैलियों (जैसे कर्नाटक में आयोजित ‘वोट अधिकार रैली’ और बिहार की ‘वोटर अधिकार यात्रा’) के जरिए युवाओं और आम जनता से सीधे जुड़ रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि युवाओं के वोट देने के अधिकार को ही सुरक्षित नहीं रखा गया, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। कांग्रेस के साथ-साथ विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के अन्य घटक दल भी इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं। विपक्ष का मानना है कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, विशेष रूप से चुनाव आयोग, की साख को बचाए रखना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए बेहद जरूरी है। राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि वे अपनी लोकप्रियता के चरम पर भी चुनाव हार गई थीं, क्योंकि तब संस्थाएं निष्पक्ष थीं, लेकिन आज ‘सत्ता विरोधी लहर’ (Anti-Incumbency) को कृत्रिम रूप से गायब किया जा रहा है। दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। भाजपा प्रवक्ताओं और नेताओं ने राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें “भ्रम फैलाने का उस्ताद” (Master of Deception) करार दिया है। भाजपा का कहना है कि राहुल गांधी के आरोपों के पीछे कोई ठोस या विश्वसनीय कानूनी सबूत नहीं है। वे केवल अपनी चुनावी हार और कमजोरियों को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछाल रहे हैं। सत्तारूढ़ दल का मानना है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और देश की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है। विपक्ष द्वारा चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना सीधे तौर पर देश के मतदाताओं के जनादेश का अपमान है। राहुल गांधी का ‘वोट चोरी विरोधी अभियान’ इस समय देश की राजनीति के केंद्र में है। जहाँ एक ओर विपक्ष इसे देश के लोकतंत्र और संविधान को बचाने की एक निर्णायक लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्तापक्ष इसे बिना तथ्यों के सनसनी फैलाने की कोशिश मान रहा है। यह बहस आने वाले समय में भारतीय चुनावी सुधारों और राजनीतिक विमर्श को किस दिशा में ले जाती है, यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा।


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