रेप,विक्टिम, विरोध, केंडल मार्च, भाषणवाजी, कोर्ट कचहरी, सब में मानवता के साथ मजाक : इन्सानियत शक के दायरे में.

याद रखिए, सेक्सुअल असॉल्ट के मामलों में अगर हम विक्टिम के साथ नहीं खड़े हैं तो हमारी इनसानियत शक के दायरे में है. औरतों के साथ हो रही हिंसा पर बोलने के लिए औरत होना जरूरी नहीं. आप मर्द होकर भी यह बोल सकते हैं. तभी माना जाएगा कि इस मरे हुए समाज में आप अब भी जिंदा हैं. वरना, हम सब मरे हुए हैं

कठुआ और उन्नाव रेप के विरोध में पूरे देश में लोगों का गुस्सा उबाल पर था . न्याय के लिए देश में लोग जगह जगह विरोध प्रदर्शन कर रहे थे . कठुआ और उन्नाव की दर्दनाक घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार अपनी बहुत ही मूल जिम्मेदारियों को पूरा करने में भी नाकाम रही है. ये हमारा सबसे काला दौर है और इससे निपटने में सरकार और राजनीतिक पार्टियों की कोशिश बहुत ही कम और कमजोर है.उन्नाव, कठुआ और सूरत में सामने आई बलात्कार की घटनाओं के विरुद्ध देश भर में फूटा रोष सच्चा है, इसमें संदेह नहीं. इन सभी मामलों में पीड़ित के साथ जो जघन्य क्रूरता हुई, वह किसी भी सभ्य इंसान और व्यवस्था को सिहरा देने शर्मिंदा कर देने के लिए काफी है. लेकिन जब धीरे धीरे यह गुस्सा बैठ जाएगा, उसके बाद क्या होगा? क्या हम फिर किसी निर्भया या किसी 11 साल की बच्ची के साथ बलात्कार का इंतजार करेंगे ताकि फिर प्रदर्शन करके अपनी शर्मिंदा अंतरात्मा के लिए थोड़ी राहत खोजें? क्योंकि 2012 से 2018 के बीच के करीब साढ़े पांच साल में बलात्कार की कम से कम 1.5 लाख घटनाएं इस देश में रिपोर्ट की जा चुकी हैं. अगर हिसाब लगाएं तो हर 18 मिनट पर एक बलात्कार इस देश में हो रहा होता है. इंसान को बहुत सारी चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है। बलात्कार के एक मामले ने पूरे देश की चेतना को कगार पर ला खड़ा किया है। यही समय है कि हम जीवन के मूल तथ्यों पर ध्यान दें। बलात्कार के पिछे एक बुनियादी चीज यह है कि एक इंसान दूसरे इंसान पर अधिकार करना चाहता है, उसे अपमानित करना चाहता है और उसे अधीन बनाना चाहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके अंदर एक तरह की कमी, एक ऐसा अधूरापन है, कि किसी पर अधिकार जमाने के बाद ही वह थोड़ा बेहतर महसूस करते हैं। अधिकार की इस भावना को संतुष्ट करने के लिए चाहे आप शॉपिंग करें या बलात्कार करें, बात एक ही है। आपके अंदर कोई कमी है, उसे आप किसी चीज को हासिल करते हुए पूरा करना चाहते हैं। यह बहुत से भद्दे रूपों में व्यक्त हो सकता है। यह एक ही चीज पर नहीं रुकेगा। महिलाओं के खिलाफ अपराध अब कुछ समय से हमारे देश में सुर्खियां बना रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के बारे में सांख्यिकीय डेटा देखने और खुद को इस बात से संवेदनशील बनाने के लिए समझदारी होगी कि हम इन मुद्दों से कैसे निपट सकते हैं।क्या निर्भया की घटना और राष्ट्रीय उत्पीड़न का पालन अगले वर्ष में संस्थागत प्रतिक्रिया पर कोई असर पड़ा? गुजरात के सूरत में एक 9 साल की बच्ची का शव बरामद हुआ. उसके शरीर पर 100 के करीब चोट के निशान थे.

इसे देखते हुए लोगों का गुस्सा चरम पर है. देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर न्याय की मांग कर रहे हैं. हिसार में देर रात अपनी मां के साथ सो रही एक पांच साल की बच्ची का पहले आरोपियों ने अपहरण किया और फिर उसके साथ बारी बारी से रेप किया. घटना को अंजाम देने के बाद आरोपियों ने उसके प्राइवेट पार्ट में लकड़ी डाल दी जिससे उसकी मौत हो गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार बच्ची की मौत उसकी बड़ी आंत में जख्म होने की वजह से हुआ है. शिमला में दसवी की छात्रा के साथ कुछ लोगों ने रेप किया और बाद में उसकी हत्या कर दी. मामले की जांच कर रही पुलिस के अनुसार आरोपियों ने छात्रा को स्कूल से लौटते समय पकड़ा और बाद में उसे सुनसान इलाके में लेकर उसके साथ ऐसी घटना की. आरोपियों ने बाद में पीड़िता की हत्या कर दी थी. इस घटना के सामने आने के बाद आरोपियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई थी. बाद में पुलिस ने तीन लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार किया था. दिल्ली के गांधीनगर इलाके में 21 महीने की बच्ची के साथ उसके ही परिजन ने रेप किया . पुलिस के अनुसार पीड़ित बच्ची के पिता ने अपने दोस्त के पास अपनी बेटी को खेलने के लिए छोड़ा था. इसी दौरान आरोपी ने बच्ची के साथ यह घटना की. बाद में जब बच्ची को पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया तब पता चला कि आरोपी ने बच्ची के साथ काफी समय तक रेप किया था. बाद में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. बनारस में 5 वर्षीय बच्ची के साथ रेप होने की घटना सामने आई. पुलिस के अनुसार आरोपियों ने घटना को अंजाम देने के लिए मूक बधिर बच्ची को चुना था. बच्ची अपनी मां के साथ सो रही थी जब आरोपियों ने उसका पहले अपहरण किया और बाद में उसके साथ हैवानियत की. बोल न पाने की वजह से बच्ची मदद के लिए आवाज नहीं लगा पाई और आरोपियों ने उसके साथ रेप करने के बाद उसे सुनसान इलाके में फेंक दिया. निर्भया गैंगरेप मामले में साल 2013 में साकेत की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चारों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी. इस फैसले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने 13 मार्च 2014 को मुहर लगा दी थी. दोषियों ने वकील एमएल शर्मा और एमएम कश्यप के जरिये सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की. हाई कोर्ट ने दोषियों की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उनका अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में आता है.दोषियों ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में 18 फरवरी 2015 को एक अर्जी को खारिज करते हुए मेरिटल रेप को निजी बताया है और साथ ही इसके बाद सरकार ने भी संसद में इसे निजी मामला बताते हुए कह दिया कि मेरिटल रेप को अपराध के दायरे में रखा जाना उचित नहीं है  जो भी हो लेकिन भारत में कभी किसी कानून को लेकर स्पष्ट नीति नहीं रह सकती क्योंकि लोग जब तक जिम्मेदार नहीं होंगे तब तक किसी भी तरह के कानून के दुरूपयोग होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता 2015 में भारत में कुल 34,651 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे।

इनमें से 33,098 मामलों में अपराधी पीड़िता को ज्ञातक थे, मध्यप्रदेश में 4,391 बलात्कार के मामले सामने आए हैं, जो राज्यों में सबसे ज्यादा है। जबकि, राष्ट्रीय राजधानी में 2,199 मामले दर्ज किए गए हैं केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे ज्यादा। देश भर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के लगभग 3.27 लाख मामले दर्ज किए गए थे। इनमें 1.3 लाख से अधिक यौन उत्पीड़न थे 1.2 लाख राज्यों और 9,445 केंद्र शासित प्रदेशों में। यौन अपराध मामलों में बलात्कार, बलात्कार करने का प्रयास, महिलाओं की शर्मिंदगी और महिलाओं के विनम्रता का अपमान करने के इरादे से महिलाओं पर हमला करने का प्रयास किया गया आता है।बलात्कार के मामलों में महाराष्ट्र ने 4,144 आंकड़ों के अनुसार राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कुल 3,644 और 3,025 बलात्कार दर्ज किए गए थे।ओडिशा, असम (1,733) छत्तीसगढ़ (1,560) केरल में 1256, पश्चिम बंगाल में 1,12 9, हरियाणा में 1,070 और बिहार में 1,041 पंजीकृत 2,251 बलात्कार के मामले सामने आए हैं।केंद्र शासित प्रदेशों में चंडीगढ़ में 72, अंडमान निकोबार द्वीप में 36, दादर और नगर हवेली में आठ, दमन और दीव में पांच और पुदुचेरी में तीन है। लक्षद्वीप में ऐसा कोई अपराध नहीं बताया गया था महिलाओं के खिलाफ कुल यौन अपराधों में से महाराष्ट्र में 16,989 मामले, मध्य प्रदेश में 12,887 और उत्तर प्रदेश में 11,343 मामले दर्ज किए गए हैं। ओडिशा में 9,359 ऐसे अपराध, राजस्थान में 8,873, पश्चिम बंगाल में 8,274, आंध्र प्रदेश में 8,049 और तेलंगाना में 6,044 मामले दर्ज किए गए थे। छत्तीसगढ़ में 3,500 ऐसे मामलों, गुजरात में 1,743, बिहार में 1,738 और गोवा में 270 मिली। उत्तर पूर्वी राज्यों में असम में महिलाओं के खिलाफ 63636 यौन अपराध हुए, इसके बाद त्रिपुरा में 609, मेघालय में 231, अरुणाचल प्रदेश में 186, मिजोरम में 141, मणिपुर में 133, नागालैंड में 53 पंजाब में 2,164 मामले, तमिलनाडु में 1,633, हिमाचल प्रदेश में 737 और उत्तराखंड में 623 मामले दर्ज किए गए हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 9,104, यौन उत्पीड़न, चंडीगढ़ में 164, अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 98, पुडुचेरी में 47, दादर और नगर हवेली में 13, दमन और दीव में 12 और लक्षद्वीप में सात है।राज्यों की श्रेणी में 35,527 उत्तर प्रदेश में, पश्चिम बंगाल में 33,218, महाराष्ट्र में 31,126, राजस्थान में 28,165, 24,135 मध्य प्रदेश में, 23,258 असम में और आंध्र प्रदेश में 15,931 है।केंद्र शासित प्रदेशों में महिलाओं के खिलाफ कुल 17,845 अपराध दर्ज किए गए थे। इनमें से 17,104 अकेले दिल्ली में, 463 चंडीगढ़ में, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में 136, पुडुचेरी में 80, दमन और दीव में 28, दादर और नगर हवेली में 25 और लक्षद्दीप में 9। 2014 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,37,922 मामले दर्ज किए गए थे। भारत में हर दिन औसतन दो महिलाओं से बलात्कार किया गया था और राष्ट्रीय राजधानी में 1,636 मामलों के साथ पिछले साल सभी शहरों में इस तरह के अपराधों की संख्या दर्ज की गई थी।नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में भारत में बलात्कार के मामलों की कुल संख्या 2013 में 24,923 से बढ़कर 33,707 हो गई है।15,556 मामले में, 2013 में बलात्कार पीड़ितों की उम्र 18 से 30 साल के बीच थी। पिछले साल की तुलना में 2013 में दिल्ली में बलात्कार के मामलों की संख्या दोगुना हो गई है। पिछले साल शहर में कुल 1,636 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे, जबकि वर्ष 2012 में 706 ऐसे मामलों की सूचना मिली थी। औसतन, 2013 में हर रोज दिल्ली में चार बलात्कार के मामले सामने आए थे। दिल्ली में बलात्कार के मामलों की संख्या मुंबई में 391 मामले, जयपुर में 192 मामले और 2013 में पुणे में 171 मामले थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में कुल रिकॉर्ड 11 बलात्कार होता है, जिसमें कुल 4,335 ऐसे मामले होते हैं, जो 2013 में अन्य सभी राज्यों में सबसे अधिक है। मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में 3,285 मामले, महाराष्ट्र 3,063 और उत्तर प्रदेश के साथ 3,050 बलात्कार के मामले हैं। आंकड़ों से पता चला है कि 2013 में 13,304 मामले सामने आए थे जहां पीड़ित एक नाबालिग था, जो पिछले वर्ष 9,082 था। आंकड़ों ने एक परेशान तथ्य का अनावरण किया कि ज्यादातर मामलों में, अपराधियों को पीड़ितों के लिए जाना जाता था। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि 9 4 प्रतिशत मामलों में अपराधी आरोपी से परिचित थे।इन अपराधियों में 539 मामलों में माता पिता, 10,782 मामलों में पड़ोसी, 2,315 मामलों में रिश्तेदार और 18,171 मामलों में अन्य ज्ञात व्यक्तियों ने वर्ष में रिपोर्ट की। तो क्या यह बलात्कार नहीं, बलात्कार की जघन्यता है जो हमें द्रवित करती है? अमूमन रोज और चंद मिनटों में होने वाले बलात्कार से हम क्यों आहत नहीं होते? हमारा विवेक जागे, इसके लिए हमें किसी निर्भया या आसिफा की ही जरूरत क्यों पड़ती है? क्या हमारा समाज वाकई बलात्कार के विरोध में है? क्या वह हर बलात्कार का उसी तीव्रता से प्रतिरोध करता है जिस तीव्रता से कुछ मामलों का करता है? यह सवाल बलात्कार के विरुद्ध चल रहे मौजूदा आंदोलनों को कहीं कमतर साबित करने के लिए नहीं उठाए जा रहे हैं? निर्भया आंदोलन ने निश्चय ही भारतीय स्त्री को एक नया साहस दिया और पहली बार वह खुलकर अपने विरुद्ध होने वाले अत्याचारों पर बात करने की हिम्मत जुटा सकी. संभव है, आसिफा का मामला लैंगिक बराबरी और सम्मान की उसकी लड़ाई को कुछ और आगे ले जाए. लेकिन यह सवाल फिर भी बचा रहता है कि आखिर सामाजिक लैंगिक न्याय और बराबरी की लड़ाई हम कितने तर्कसंगत ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं? क्या हम स्त्रियों के साथ हो रहे अपराध की समाजशास्त्रीय समझ विकसित करने या अपनी न्याय प्रणाली की उन विसंगतियों का सामना करने को तैयार हैं जिनकी वजह से ऐसे मामले बढ़ते जाते हैं और इंसाफ दूर छिटकता जाता है? यह समझना जरूरी है कि हालांकि बलात्कार में यौन जरूरतों की भूमिका हो सकती है, मगर यह सिर्फ सेक्सुअलिटी या यौनिकता से ही संबंधित नहीं है। इसका संबंध अधिकार या काबू करने की ताकत से है। नियंत्रित करने की यह चाह बहुत सी चीजों से उपजती है। समाजों में एक बुनियादी गलती यह की जाती है कि हमने युवाओं के दिमाग में कहीं न कहीं यह बात डाल दी है कि स्त्री एक वस्तु है, एक चीज है, जिस पर आप कब्जा कर सकते हैं। या तो किसी का पिता उसे दान कर दे, या वह इनकार कर दे, तो आप उस पर अधिकार कर सकते हैं। यह भावना अब भी है, है न? कहीं न कहीं हमारे मन में यह विचार गहराई में बसा हुआ है कि स्त्री एक वस्तु है।

वस्तु का अपना मन या दिमाग नहीं होता। इसलिए यह बात लोगों के दिमाग में कई जगहों पर जानबूझकर डाली जाती है, और कई जगहों पर अनजाने में। मगर लोगों के दिमाग में यह बहुत गहराई से जमा हुआ है। हमारे पास आंकड़ों का अंबार लगाने के अलावा क्या है, कोई बुरी घटना हुई नहीं कि गूगल करना शुरू कर दिया. तलाशना शुरू कर दिया ताकि अपनी बात को पुष्टि कर सकें. बता सकें कि आधी दुनिया की हालत समाज में क्या है. डेटा की कोई कमी नहीं है. लेकिन मानवता का खून पीते लंबे दांतों और टपकते पंजों वाली प्रवृत्ति को नंगधड़ंग अट्टहास करते आसानी से देखा जा सकता है। इसलिए इसका समाधान बस उस पर काबू पाना नहीं है, इसका समाधान हर इंसान का रूपांतरण है। अगर दुनिया को बदलना है, तो सबसे पहले आपको अपने रूपांतरण के लिए तैयार रहना होगा। यह सबसे अहम चीज है। अगर हम एक एक इंसान को रूपांतरित नहीं करेंगे, तो आपको अपराधियों से भरी दुनिया के साथ काम चलाना होगा। बंद कमरे के बलात्कारी या सड़क के बलात्कारी में बहुत फर्क नहीं है, है न?इसलिए एक आध्यात्मिक संभावना, जिसका मतलब है  अपनी भौतिकता से परे की एक संभावना के लिए कोशिश करना  ही इसका एकमात्र असली जवाब है। अगर आप लंबे समय तक चलने वाले फायदे चाहते हैं, तो इस समस्या का हल यही है।सब को शामिल करने का मतलब सिर्फ यह है कि आप अपने आप को अपनी भौतिकता में सीमित न करें। अगर आप अपने आप को भौतिकता से परे अनुभव करेंगे, तो आपके चलने, सांस लेने और इस धरती पर आपके अस्तित्व का तरीका ही अलग होगा। इसकी वजह सिर्फ इतनी है, कि आपका होना आपकी भौतिकता की सीमाओं से परे है। अगर यह एक चीज इंसान के साथ होती है, तो वह अचानक हर संभव तरीके से रूपांतरित हो जाता है।अगर हमें इस हालात को बदलना है, तो हमें समझना चाहिए कि व्यक्ति का रूपांतरण सबसे अहम चीज है। अगर हम इसमें अपनी ताकत या क्षमता लगाना नहीं चाहते, तो हमें इन्हीं परिस्थितियों से काम चलाना होगा। आने वाले समय में हालात और बदतर हो सकते हैं। रूपांतरण का मतलब है कि आप क्या हैं, यह दूसरे लोगों की राय या दूसरे लोगों की मौजूदगी से तय नहीं होता। हर माता-पिता को इस दिशा में अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए। ताकि उन्हें अधिक संपूर्ण और सब को शामिल करने वाले इंसान में बदला जा सके।जब समाज में औरतें कहेंगी कि वे सुरक्षित अनुभव कर रही हैं तब ही माना जाएगा कि वे सुरक्षित हैं. अगर मर्द कहेंगे कि देश में बच्चियां, औरतें सुरक्षित हैं जिनका काम ही रहा है सदियों से औरतों का उत्पीड़न करना, उन पर हमला करना, असुरक्षा का माहौल बनाना तो उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इस बात को इस तरह से देखने की जरूरत है कि भारत के सभ्य समाज को अब अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए और ये कहना चाहिए कि ये असभ्यता, अशालीन आचरण अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. याद रखिए, सेक्सुअल असॉल्ट के मामलों में अगर हम विक्टिम के साथ नहीं खड़े हैं तो हमारी इनसानियत शक के दायरे में है. औरतों के साथ हो रही हिंसा पर बोलने के लिए औरत होना जरूरी नहीं. आप मर्द होकर भी यह बोल सकते हैं. तभी माना जाएगा कि इस मरे हुए समाज में आप अब भी जिंदा हैं. वरना, हम सब मरे हुए हैं

पत्थरों से मार  मार कर दर्दनाक मौत देना 

सउदी अरब एक मुस्लिम देश है, इस वजह से यहां के कानून भी इस्लामी नियमानुसार बने हुए हैं। यहां किसी महिला को बेआबरू करने पर मौत की सजा दी जाती है लेकिन यह सजा बड़ी दर्दनाक है। यहां पर रेप के गुनहगार को तब तक पत्थर मारे जाते हैं, जब तक की वो मर ना जाए और यह जुर्म की मौत आसान नहीं क्योंकि गुनहगार को मरने से पहले काफी पीड़ा और यातना से गुजरना पड़ता है।

ग्रीस में रेप की सजा उम्रकैद 

ग्रीस में रेप की सजा रेप करने वाले को बेड़ियों में जानवरों की तरह बांध कर उम्रकैद के रुप में जाती है । यह सजा सिर्फ रेप के लिये ही नहीं बल्कि महिला के खिलाफ छोटे से छोटे जुर्म के लिये भी दी जाती है।

चीन में ‘कैपिटल पनिशमेंट’

चीन में रेप की सजा काफी तेजी से दी जाती है। यहां रेप के मामलों में जरा सी भी देरी नहीं की जाती है और अपराधी को जल्द से जल्द मौत के घाट उतार दिया जाता है।

ईरान में सौ कोड़े मारने का प्रावधान और उर्मकैद

ईरान में भी रेप के लिए बहुत ही कड़े कानून हैं। महिला की पूरी तरह से सुनवाई होती है और उसे पूरा न्याय मिलता है। इससे पहले महिला को मुआवजा देकर राजी किया जा सकता है। पर यदि वह ना माने तो अपराधी को सौ कोड़े मारे जाते हैं । जरुरत पड़ने पर उसे ताउम्र जेल भी हो सकती है।

मिश्र में मुजरिम को फांसी की सजा

मिश्र में भी रेप के लिए मौत की सजा दी जाती है। यहां बलात्कारी को फांसी दी जाती है। उन्हें तड़पा तड़पा कर मारा जाता है।

अफगानिस्तान में सिर में गोली मारने की सजा 

अफगानिस्तान में भी इसके खिलाफ बेहद कड़े कानून हैं इसकी सजा सीधे और साफ तरीके से दी जाती है। यहां बलात्कारी को मृत्यु की सजा दी जाती है। गुनहगार को गुनाह करने के तीन या चार दिनों के भीतर ढूंढ कर सिर में गोली मार के मौत दी जाती है।

उत्तर कोरिया में एक के बाद एक गोली मारने की सजा 

उत्तर कोरिया इस मामले में बेहद सख्त है वैसे भी कभी भी अपराधियों के प्रति कोई दया या सहानुभूति नहीं दिखानी चाहिये । यहाँ रेप के लिए मुजरिम के सिर में एक के बाद एक गोलियां दागी जाती हैं। इससे सबको यह भूल कर भी ना करने का सबक मिलता है।

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