शिक्षा का व्यवसायीकरण, चुनौती या सुनिश्चित साजिश तो नहीं?

वैचारिक तौर पर इन्सान के कत्ल को हम कई बार संस्कार कहते हैं। ज्ञान के अंकुर फूटने से पहले उसे मसल डालने वाली शैतानी किताबों को कई बार हम ज्ञान का भंडार कहते हैं। मनुष्य को पशु से बदतर बनाने वाली व्यवस्था को कई बार हम धर्म कहते हैं। यह भी सच है, कि हमें धर्म की सही जानकारी बखूबी उपलब्ध है।

देश और प्रदेश की प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय तक की शिक्षा चैपट हो चुकी है। जो सामर्थवान हैं वह अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजकर शिक्षा दे पा रहे हैं और गरीब तबका जो निजी विद्यालय में बच्चों को पढ़ा पाने में असमर्थ है। उनके बच्चे सरकार के भरोसे बर्बाद हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमारी सरकार में शामिल लोग किसी अन्य ग्रह से आए हैं। वो भी इसी समाज के हैं। इसी व्यवस्था के हैं। इसी परिवेश के हैं। वो सारा कुछ जानते हैं। उन्हें पता है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर क्या खेल हो रहा है। परंतु अफसोस कि कोई भी इसके सुधार के लिए आगे नहीं बढ़ रहा। ऐसा लगता है कि सरकार जानबूझकर बच्चों का भविष्य खराब कर रही है। किसी भी देश या समाज के निर्माण में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है। कहा जाए तो शिक्षक समाज का आइना होता है और शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व भी होता है। यह दर्जा एक शिक्षक को उसके द्वारा समाज में दिए गए योगदानों के बदले स्वरुप दिया जाता है। शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है। ठीक इसी तरह से हमारे निज़ाम हमारे देश और समाज के बेहतर विकास का करता धर्ता होता है,  सही मायनो में कहा जाए तो हमारे निज़ाम ही हमारे देश के भविष्य को गढ़ता है। जिस तरह से शिक्षक ही समाज की आधारशिला है उसी तरह से हमारे निज़ाम  देश की जनता का भाग्य विधाता होता है । एक अच्छा निज़ाम देश के भविष्य के मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है और समाज को सही राह दिखाता रहता है, तभी हम देश वासियों ने अपने निजामों को समाज में उच्च दर्जा दिया जाता है।

माता पिता बच्चे को जन्म देते हैं। उनका स्थान कोई नहीं ले सकता, उनका कर्ज हम किसी भी रूप में नहीं उतार सकते। लेकिन एक निज़ाम ही होता है जिसे हमारी भारतीय संस्कृति में माता पिता के बराबर दर्जा दिया जाता है। क्योंकि हमारे निज़ाम ही हमारे समाज को रहने योग्य बनाता है। इसलिए ही निज़ाम को समाज का शिल्पकार कहा जाता है। नागरिक  और निज़ाम का संबंध केवल वोट देने से ही नहीं होता बल्कि वह अपने देशवासियों को हर मोड़ पर उसको राह दिखाता है और उसका हाथ थामने के लिए हमेशा तैयार रहता है। देशवासियों के मन में उमडे हर सवाल का जबाब देता है और देशवासियों को सही सुझाव देता है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए सदा प्रेरित करता है। किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की व्यवस्था और निज़ाम  पर निर्भर करता है। अगर राष्ट्र के निज़ाम अच्छे  है तो उस देश को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता अगर राष्ट्र के निज़ाम  अच्छे  नहीं होगे  तो वहां की प्रतिभा दब कर रह जायेगी, बेशक किसी भी राष्ट्र की नीति बेकार हो, लेकिन एक अच्छा निज़ाम बेकार नीति को भी अच्छी नीति में तब्दील कर देता है। देश के निज़ाम  हमें ज्ञान, विनम्रता, व्यवहारकुशलता और योग्यता की पौरुश्ता प्रदान करते  है। इसीलिए तो हम और आप अपने निज़ाम को ईश्वर तुल्य माना करते  है। आज और आज से पहले भी बहुत से निज़ाम अपने निज़मिये आदर्शों पर चलकर एक आदर्श मानव समाज की स्थापना में अपनी महती भूमिका का निर्वहन किया और कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसे भी निज़ाम आये हैं जो अपने निज़मियेत के  नाम को कलंकित कर रहे हैं। और देश और राज्य के हर व्यवस्था को बिना सोंचे समझे बिकवाली और व्यवसायी बना दिया है। आज के समय में देश और प्रदेश की निज़मियेत का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण् हो गया है।

यह व्यवसायीकरण और बाजारीकरण देश के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती हैं। पुराने समय हमारे देश हो या प्रदेश यहाँ की निज़ामियत में निज़मिय्त कभी व्यवसाय या धंधा नहीं थी। इससे देश और प्रदेश को बडी कठिनाई का सामना करना पड रहा है और आगे भी करना पड़ेगा अगर यही चलता रहा तो । अभी हाल ही की तो बात है विश्व मापदंड के सर्वे में हमारे देश को आधा गुलाम बताया है क्या ये सच है – हाँ या ना ? जाहिर है राष्ट्रीय पप्पू, अंतरराष्ट्रीय स्टुपिड से बहुत बेहतर हैं। भेड़ियों की बस्ती में पामेरेनियन कुत्ते की तरह। पर ये भी सच है, कि भेड़ियों की सत्ता में पामेरेनियन हंसी के पात्र होते हैं। भेड़िए ही तय करते हैंए कि भेड़िए के सामने ये पिल्लू कुछ भी नहीं है। इनसे भिन्न जीव.जंतु भी हमारे भाग्य विधाता बनने को लाइन में हैं, लेकिन सब आपस में गुत्थमगुत्था हैं। एक साथ हाथ में हाथ थामे मंच के महारथी साल भर में हाथों में कटार लिए एक.दूसरे को ललकारते पाए जाते हैं। बहुमत के अल्पमत पर कब्जा करके भेड़िए इसलिए शासक बन बैठे हैं। क्यों बहुमत का बहुमत छिन्न.भिन्न है। हजार भलेमानुसों की बस्ती में दस गुंडे किसी की भी इज्जत उतार कर चले जाते हैं। देखिए कितनी निडरता से सेक्स वीडियो की चर्चित नेत्री देश के अन्नदाता को धमका लेती है। कैसे अपने प्रधान भेड़िए को विधानसभा के पटल पर नंगा करने वाला शावक उसी बदचलन भेड़िए का पुंसत्व चाटने लगता है। यह सब थमने वाला नहीं है। भेड़िए को सत्ता से हटाने का सपना पामेरेनियन पालने से नहीं पूरा होगा। इसके लिए शेर या शेरनी को नेतृत्व देना होगा। और ये हो रहा है। उम्मीद रखिए यह होकर रहेगा।

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