“लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को”: जब शिक्षा बनी हक की लड़ाई और बदलाव का सबसे बड़ा हथियार

“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पियेगा वह दहाड़ेगा।” इतिहास गवाह है कि दुनिया के जितने भी बड़े सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में शिक्षा और वैचारिक चेतना ही रही है। पिछले जुलाई महीने से हम दिल्ली के जंतर मंतर पूरे भारत में पढ़ाई के लिए लड़ते देखा और समाज को बदलते देखा मतलब साफ है कि हमने इतिहास को बदलते देखा है ।

आज के आधुनिक दौर में जब हम डिजिटल इंडिया और 5G क्रांति की बात कर रहे हैं, देश के कई हिस्सों से ऐसी तस्वीरें भी सामने आती हैं जहाँ एक अदद स्कूल और किताबों के लिए बच्चों को मीलों पैदल चलना पड़ता है। ऐसे समय में प्रसिद्ध नारा “लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को” मात्र एक पंक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक आंदोलन बन चुका है। यह नारा दो बेहद महत्वपूर्ण संदेशों को अपने भीतर समेटे हुए है—पहला, शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ना और दूसरा, उस शिक्षा का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर पूरे समाज की कुप्रथाओं, रूढ़ियों और असमानता को मिटाने के लिए करना। भारत जैसे विविधता और आर्थिक विषमता वाले देश में आज भी शिक्षा हर किसी के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं है। विशेषकर ग्रामीण, आदिवासी और मलिन बस्तियों (स्लम) में रहने वाले बच्चों के लिए पढ़ाई करना किसी जंग से कम नहीं है। कहीं गरीबी आड़े आती है, तो कहीं रूढ़िवादी सोच लड़कियों को स्कूल जाने से रोकती है।

लेकिन बदलाव की बयार अब चल पड़ी है। देश के कोने-कोने से युवाओं और स्वयंसेवकों की ऐसी कहानियाँ आ रही हैं जो शिक्षा के अधिकार के लिए व्यवस्था और समाज से लड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक सेवानिवृत्त शिक्षक द्वारा पुल के नीचे गरीब बच्चों को मुफ़्त पढ़ाने की पहल हो, या तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक सरकारी स्कूल के क्लासरूम को ‘रेल कोच’ का रूप देकर बच्चों को आकर्षित करने का अनूठा प्रयास—ये सभी उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि जब पढ़ाई के लिए लड़ने का जज्बा पैदा होता है, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर बुनियादी ढाँचे, शिक्षकों की कमी और जागरूकता के अभाव जैसी बाधाओं से आज भी लड़ना पड़ रहा है। ‘लड़ो पढ़ाई करने को’ का सीधा अर्थ है कि जब तक हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल जाती, तब तक समाज के हर सचेत नागरिक को इस हक की आवाज़ बुलंद रखनी होगी। अक्सर देखा जाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल एक अच्छी नौकरी, मोटी सैलरी और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित होकर रह गया है। लेकिन यह नारा इस संकीर्ण मानसिकता पर करारा प्रहार करता है।

शिक्षा का असली मकसद केवल साक्षर होना या डिग्रियां बटोरना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और तार्किक समाज का निर्माण करना है। जब एक व्यक्ति पढ़-लिखकर जागरूक होता है, तो उसमें समाज में व्याप्त जातिवाद, लिंगभेद, अंधविश्वास और आर्थिक असमानता जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ सवाल उठाने का साहस आता है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी कहा था—”शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पियेगा वह दहाड़ेगा।” इतिहास गवाह है कि दुनिया के जितने भी बड़े सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में शिक्षा और वैचारिक चेतना ही रही है। आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर छात्रों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (अटेंशन स्पैन) और पढ़ने की आदतों में गिरावट देखी जा रही है (जैसा कि हालिया पीसा रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया है), तब गंभीर और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं को समझने और उनका वैज्ञानिक समाधान खोजने के लिए होना चाहिए।

देश के विश्वविद्यालय और कॉलेज आज इस नारे के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। युवा वर्ग अब केवल अपने करियर को लेकर ही सजग नहीं है, बल्कि वह जलवायु परिवर्तन, सामाजिक न्याय, और मानवाधिकारों जैसे गंभीर मुद्दों पर भी अपनी आवाज़ मुखर कर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में पढ़े-लिखे युवा भ्रामक खबरों और नफरत के खिलाफ डिजिटल साक्षरता का हथियार अपनाकर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं। चाहे वह झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर बच्चों को पढ़ाना हो, पर्यावरण संरक्षण के लिए अभियान चलाना हो, या महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना हो—पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी हर मोर्चे पर ‘समाज बदलने’ के संकल्प को सच कर रही है। यूनेस्को (UNESCO) की हालिया रिपोर्ट भी शिक्षा के उद्देश्य और सीखने की व्यवस्था पर पुनर्विचार करने के लिए एक नए सामाजिक अनुबंध (Social Contract) की वकालत करती है।

शिक्षा को केवल एक व्यावसायिक साधन मानने के बजाय इसे सामाजिक एकजुटता और सामूहिक प्रगति का माध्यम बनाना होगा। “लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को” का यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि शिक्षा एक अनमोल रत्न है जिसे संघर्ष करके हासिल करना है, और हासिल करने के बाद इसे पूरे समाज को रोशन करने में लगा देना है। जिस दिन देश का हर नागरिक इस सिद्धांत को आत्मसात कर लेगा, उस दिन भारत को एक समतामूलक, प्रगतिशील और सशक्त राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।

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