लोक आस्था, कला और लोकगीतों की पावन धारा, सांझा पर्व

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

भारतीय संस्कृति उत्सवों और लोक-अनुष्ठानों की एक ऐसी जीवंत धारा है, जहाँ जीवन का हर रंग, हर ऋतु और हर भावना कला तथा भक्ति के रूप में सजती है। उत्तर भारत,विशेषकर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान, मध्य प्रदेश के ग्रामीण अंचल में आश्विन मास के पितृपक्ष (श्राद्ध) के दौरान मनाया जाने वाला ‘सांझा पर्व’ (या सांझी पूजा) लोक कला, सामुदायिक सौहार्द और पवित्र आस्था का एक ऐसा अनूठा संगम है, जिसकी आत्मा इसके मीठे सांझा गीतों में बसती है। पितृपक्ष के पूरे 16 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव मुख्य रूप से कुँवारी कन्याओं द्वारा मनाया जाता है। मान्यता है कि सांझी देवी (सांझा माई) माँ दुर्गा का ही एक सौम्य लोक-रूप हैं, जो बेटियों को सुख, सौभाग्य और मनभावन वर का आशीर्वाद देती हैं। रूप-सज्जा और कला-विधान भित्ति चित्र श्राद्ध पक्ष के प्रथम दिन लड़कियाँ घर की मुख्य दीवार को मिट्टी और गाय के गोबर से लीपकर उस पर सांझा माई की सुंदर आकृति बनाती हैं। सृजनात्मक श्रृंगार,मिट्टी के छोटे-छोटे सितारे, फूल, कौड़ियाँ, रंगीन कांच के टुकड़े और चमकीली पन्नियों से देवी के हाथ, पैर, गहने और वस्त्र उकेरे जाते हैं। विवाह और विसर्जन,16 दिनों तक रोज़ सुबह-शाम पूजा होती है। अंतिम दिन (सर्वपितृ अमावस्या) सांझा माई का प्रतीकात्मक विवाह रचाया जाता है और अगले दिन गाजे-बाजे के साथ उन्हें जल-स्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है।


सांझा पर्व का सबसे सुंदर और आत्मीय पहलू हैं इसके लोकगीत। ढलती शाम (सांझ) के समय गाँव-मुहल्ले की कुँवारी कन्याएँ एक जगह एकत्र होकर सांझा माई के सम्मुख दीपक जलाती हैं और एक सुर में गीत गाती हैं। ये गीत न केवल धार्मिक वंदना हैं, बल्कि इनमें बेटी के मन की अभिलाषाएँ, भाई का स्नेह, माँ का लाड और ग्रामीण जीवन की सादगी रची-बसी होती है। जब शाम को कन्याएँ पूजा के लिए एकत्रित होती हैं, तो सबसे पहले देवी का द्वार खटखटाकर उन्हें जागृत करने और दर्शन देने की प्रार्थना करती हैं: “सांझा माई खोल किवाड़ी, बाहर खड़ी थारी पूजनहारी। पूजनहारी सब आईयाँ, थारे खातर भली-भाँत सजाईयाँ। खोल माई खोल, थारे मंदिर के द्वार, हम पूजें सांझा माई बारंबार…” हे सांझा माता! अपने मंदिर का दरवाजा खोलिए, बाहर आपकी पूजा करने वाली बेटियाँ खड़ी हैं। वे आपके स्वागत के लिए सज-धजकर आई हैं और आपके दर्शनों की अभिलाषा रखती हैं। सांझा माई को प्रतिदिन देसी घी, बासमती चावल, गुड़ या बाटा (भूने हुए चने) का भोग लगाया जाता है। भोग लगाते समय यह सुरीला गीत गाया जाता है:
गीत के बोल, “सांझा माई लेओ री कलेवा, जीमो री सांझा माई। गुड़ की डली और खीर बनाई, दूध-जलेबी संग ल्याई। खाओ सांझा माई, करो कल्याण, म्हारे घर-आँगन दो वरदान…” कन्याएँ अत्यंत भावुक होकर सांझी माता से विनती करती हैं कि वे उनके द्वारा श्रद्धा से बनाए गए गुड़, खीर और मिष्ठान का भोग स्वीकार करें तथा उनके घर-आँगन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दें। सांझा गीतों में केवल देवी की स्तुति ही नहीं होती, बल्कि बेटियों का अपने मायके, पिता और भाई के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है। भाई जब बहन के लिए पूजा की सामग्री लाता है, तो बहन खुशी से गा उठती है,


गीत के बोल, “म्हारा बीरा ल्याया कौड़िया, म्हारा बीरा ल्याया रंग। सांझा माई सजाऊँगी, अपने बीरा के संग। बीरा म्हारा जुग-जुग जीवे, सुखी रहे परिवार, सांझा माई कर दे म्हारे बीरा का बेड़ा पार…” बहन अपने भाई की दीर्घायु और खुशहाली की कामना करते हुए कहती है कि मेरा भाई मेरे लिए सांझा माई को सजाने का सामान (रंग और कौड़ियाँ) लाया है। हे माता! मेरे भाई को सदैव सुखी और सफल रखना। 16वें दिन जब सांझा माई का विसर्जन होता है, तो माहौल अत्यंत भावुक हो जाता है। जैसे बेटी अपने मायके से विदा होकर ससुराल जाती है, ठीक उसी तरह सांझा माई को अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई दी जाती है, “जीयो सांझा माई जीयो, काल फिर आइयो। आसोज के महीने में, म्हारे घर आइयो। रोवै थारी पूजनहारी, रोवै सब संसार, भूल न जाना माई, अगले बरस का त्योहार…” कन्याएँ रोते हुए सांझा माई को विदा करती हैं और उनसे वादा लेती हैं कि वे अगले वर्ष आश्विन (आसोज) मास में पुनः उनके घर-आँगन को धन्य करने ज़रूर आएँगी। सांझा पर्व केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा का वैज्ञानिक और सामाजिक दर्शन है, इसमें प्रयुक्त सभी सामग्रियां (मिट्टी, गोबर, फूल, प्राकृतिक रंग) पूरी तरह से प्राकृतिक होती हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना मिट्टी में ही विलीन हो जाती हैं।लोक कला का हस्त-कौशल यह पर्व बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के ग्रामीण लड़कियों में चित्रकला, मूर्तिकला और मिट्टी के काम का कौशल विकसित करता है।सामुदायिक एकजुटता शाम के समय हर घर से आने वाले गीतों के स्वर गाँव और मोहल्ले को एक सूत्र में पिरोते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव बढ़ता है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ सीमेंट की दीवारें और स्क्रीन का दायरा बढ़ रहा है, सांझा पर्व की यह मिट्टी की महक और गीतों की मिठास कहीं खोती जा रही है। पहले जो आकृतियाँ घर-घर की दीवारों की शोभा बढ़ाती थीं, वे अब केवल कुछ ही ग्रामीण अंचलों तक सिमट गई हैं।
हमारी लोक संस्कृति, आस्था और लोकगीतों के इस अनमोल खजाने को सहेजना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। जब तक हमारी भाषा में ये सांझा गीत गूँजते रहेंगे, तब तक भारतीय संस्कृति की यह सोंधी महक हमारे दिलों में जीवंत रहेगी।

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