विश्व रेबीज दिवस के अवसर पर गया शहर के नई गोडाउन और बागेश्वरी इलाके में एक विशेष रेबीज उन्मूलन और जागरूकता अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत जिलास्तरीय पशु कल्याण समिति के सदस्य सह पशु मैत्री रंजन कुमार और विश्वजीत कुमार के नेतृत्व में करीब 31 आवारा कुत्तों को मुफ्त एंटी-रेबीज वैक्सीन लगाई गई।

यह अभियान न केवल मूक पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए बल्कि गया शहर के नागरिकों को रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी से सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अभियान के दौरान स्थानीय निवासियों को रेबीज के खतरों और उससे बचाव के तरीकों के बारे में विस्तार से जागरूक किया गया। इस मौके पर जिलास्तरीय पशु कल्याण समिति के सदस्य रंजन कुमार ने आवारा पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और समाज की सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा, “रेबीज एक जानलेवा बीमारी है, लेकिन सही समय पर टीकाकरण के जरिए इसे 100% रोका जा सकता है।” उन्होंने बताया कि आवारा कुत्ते हमारे समाज का एक अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि इंसान और जानवर दोनों इस समाज में शांति और सुरक्षा के साथ रह सकें। अभियान के सह-नेतृत्वकर्ता विश्वजीत कुमार ने बताया कि अक्सर लोग आवारा कुत्तों से डरते हैं या उनके प्रति हिंसक हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण रेबीज का डर होता है। अगर हम अपने आस-पास के कुत्तों का समय पर टीकाकरण सुनिश्चित कर दें, तो रेबीज का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। इससे समाज में इंसानों और पशुओं के बीच का समन्वय और बेहतर होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में रेबीज के कारण होने वाली कुल मौतों में से एक बड़ा हिस्सा भारत से आता है। भारत में रेबीज के लगभग 99% मामले संक्रमित कुत्तों के काटने से होते हैं। गया जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में कचरा प्रबंधन और आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है। चिकित्सकों के अनुसार, रेबीज एक न्यूरोट्रोपिक वायरस है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। एक बार जब इस बीमारी के लक्षण (जैसे पानी से डरना यानी हाइड्रोफोबिया, अत्यधिक लार आना और स्वभाव में आक्रामकता) इंसानों या जानवरों में दिखने लगते हैं, तो यह लगभग 100% घातक हो जाती है। इसलिए, ‘रोकथाम ही एकमात्र इलाज है’ के सिद्धांत पर काम करना अनिवार्य है। अभियान के दौरान नई गोडाउन और बागेश्वरी के स्थानीय युवाओं और नागरिकों ने भी पशु कल्याण समिति की टीम का पूरा सहयोग किया। कुत्तों को पकड़ने और उन्हें सुरक्षित रूप से टीका लगाने में स्थानीय लोगों ने मदद की। टीम ने न केवल टीकों की खुराक दी, बल्कि जिन कुत्तों को टीका लगाया गया, उन पर एक विशेष पहचान चिह्न भी लगाया गया ताकि भविष्य में उनकी पहचान की जा सके। मौके पर मौजूद स्थानीय निवासियों ने इस पहल की सराहना की। उनका कहना था कि इस तरह के अभियानों से मोहल्ले में बच्चों और बुजुर्गों के मन से आवारा कुत्तों का डर कम होगा।

जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार: क्या करें और क्या न करें?
पशु कल्याण समिति की टीम ने अभियान के दौरान स्थानीय लोगों को कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी दिए:
- कुत्ता काटने पर तुरंत कदम उठाएं: यदि कोई कुत्ता या बिल्ली काट ले या खरोंच मार दे, तो घाव को तुरंत बहते पानी और साबुन से कम से कम 10 से 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं। यह वायरस के असर को काफी हद तक कम कर देता है।
- घरेलू नुस्खों से बचें: घाव पर मिर्च, तेल, चूना या मिट्टी लगाने जैसी गलतियों से बचें। इससे संक्रमण और बढ़ सकता है।
- डॉक्टर से संपर्क और वैक्सीन: बिना समय गंवाए नजदीकी सरकारी या निजी अस्पताल जाएं और एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) का पूरा कोर्स लें।
- पशुओं का व्यवहार समझें: यदि कोई कुत्ता अचानक आक्रामक हो जाए, उसके मुंह से झाग निकले, या वह बिना उकसावे के काटने दौड़े, तो तुरंत स्थानीय प्रशासन या पशु कल्याण टीम को सूचित करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि रेबीज उन्मूलन के लिए ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अपनाना बेहद जरूरी है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। जब तक समाज का हर नागरिक पशुओं के प्रति दयाभाव नहीं रखेगा और उनके टीकाकरण के प्रति सचेत नहीं होगा, तब तक रेबीज मुक्त भारत का सपना पूरा नहीं किया जा सकता। गया में चलाया गया यह अभियान इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे छोटे-छोटे प्रयासों और सामुदायिक सहयोग से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। रंजन कुमार और विश्वजीत कुमार ने अंत में गया के अन्य मोहल्लों के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संस्थाओं से भी अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में आगे आएं और इस पुण्य कार्य में अपना योगदान दें, ताकि गया शहर को पूरी तरह से रेबीज मुक्त बनाया जा सके।




