डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’, हरदा, मध्य प्रदेश

श्रीनगर के एक कॉलेज में पढ़ने वाले ज़ुबैर और नूरीन एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे। पम्पोर के केसर के खेतों और डल झील के शिकारे उनकी मुलाक़ातों के साक्षी थे। कॉलेज की तरफ़ से गुलमर्ग और पहलगाम के लिए एक टूर का आयोजन किया गया। पहाड़ की हसीन वादियों में घूमते हुए अचानक मौसम ने करवट ली। शाम ढलते-ढलते बर्फ़ का एक ख़तरनाक तूफ़ान आ गया और तापमान ज़ीरो से कई डिग्री नीचे गिर गया। तूफ़ान के शोर में ज़ुबैर और नूरीन अपने साथियों से बिछड़ गए। बचते-बचाते दोनों ने जंगल के बीचों-बीच स्थित लकड़ी के एक पुराने और वीरान कॉटेज में पनाह ली। बाहर भयानक ठंड और मौत का सन्नाटा था। अंदर पुरानी सूखी लकड़ियों से आग जलाई गई। उस आग की धीमी आँच, बाहर गरजती हवाएँ और मौत के ख़ौफ़ के बीच दोनों के दिल एक-दूसरे के बेहद क़रीब आ गए। उस रात जज़्बात पिघले और दोनों ने बिना कुछ कहे एक-दूसरे को अपनी रूह सौंप दी,यह एक ऐसा पाकीज़ा अहद (वचन) था जो उस तूफ़ानी रात में पूरा हुआ। अगली सुबह जब रेस्क्यू टीम पहुँची, तो पता चला कि कॉटेज के ऊपरी हिस्से में एक भयानक भूस्खलन हुआ था। ज़ुबैर बर्फ़ के मलबे में बह गया था। हफ़्तों की खोजबीन के बाद भी ज़ुबैर का कोई सुराग़ नहीं मिला और अफ़सरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। नूरीन इस सदमे से उबर भी नहीं पाई थी कि उस पर एक और पहाड़ टूट पड़ा,उसे मालूम हुआ कि वह गर्भवती है। एक पारंपरिक कश्मीरी समाज में बिन ब्याही माँ बनना न केवल उसकी अपनी ज़िंदगी की तबाही थी, बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए ज़िल्लत और रुसवाई का कारण था। इसी नाज़ुक मोड़ पर नूरीन के पिता के बेहद अज़ीज़ और बावक़ार दोस्त आफ़ताब अहमद आगे आए। आफ़ताब एक अमीर, नेक और बेहद रहमदिल इंसान थे। जब उन्हें नूरीन की बेबसी का पता चला, तो उन्होंने समाज की परवाह किए बिना नूरीन का हाथ थामने का फ़ैसला किया। उन्होंने नूरीन से निकाह कर लिया ताकि उसकी और उसके आने वाले बच्चे की इज़्ज़त पर कोई आँच न आए। समय बीतता गया। नूरीन ने एक ख़ूबसूरत बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम आर्यन रखा गया। आफ़ताब ने आर्यन को अपने सगे बेटे से भी ज़्यादा प्यार और अपना नाम दिया। आर्यन के लिए आफ़ताब ही दुनिया के सबसे अच्छे पापा थे। सात लंबे साल गुज़र गए…

आफ़ताब के नए बिजनेस पार्टनर और आर्किटेक्ट के तौर पर एक शख़्स की एंट्री हुई,वह कोई और नहीं, बल्कि ज़ुबैर था! तूफ़ान वाली रात ज़ुबैर मरा नहीं था। उसे एक विदेशी मेडिकल टीम ने बचा लिया था, लेकिन वह सालों तक कोमा में रहा। याददाश्त वापस आने पर वह भागता हुआ अपनी नूरीन की तलाश में आया। लेकिन यहाँ आकर जब उसने देखा कि नूरीन शादीशुदा है और उसका एक बेटा है, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। ज़ुबैर ने जब आर्यन की उम्र और उसकी शक्ल-सूरत देखी, तो उसके मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ। थोड़ी तहक़ीक़ात के बाद उसे यक़ीन हो गया कि आर्यन उसी का बेटा है। ज़ुबैर ने नूरीन से अकेले में मुलाक़ात की और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “नूरीन! आर्यन हमारी उस बर्फ़ीली रात के प्यार की निशानी है। वह मेरा बेटा है, उसे मुझे लौटा दो!” नूरीन ने अपनी आँखें पोंछते हुए बेहद सख़्ती से जवाब दिया, “ज़ुबैर! तुम मेरे लिए एक ऐसा अतीत हो जो बर्फ़ में जम कर दफ़न हो चुका है। मेरे बच्चे का बाप सिर्फ़ और सिर्फ़ आफ़ताब है, जिन्होंने हमें तब पनाह दी जब पूरी दुनिया हमें पत्थर मारने के लिए तैयार थी!” ज़ुबैर आर्यन को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था, लेकिन आफ़ताब एक बेहद दूरअंदेश और ग़ैरतमंद इंसान थे। उन्होंने इस बात को कभी अदालत या समाज के सामने नहीं आने दिया, क्योंकि वे जानते थे कि ज़रा सी भी भनक लगने पर नूरीन की इज़्ज़त और मासूम आर्यन के भविष्य पर दाग़ लग जाएगा। आफ़ताब के घर के बंद कमरे में तीनों का आमना-सामना हुआ। ज़ुबैर के पास न तो कोई क़ानूनी सबूत था और न ही कोई ऐसा रास्ता जिससे वह नूरीन की आबरू को नुक़सान पहुँचाए बिना आर्यन पर अपना हक़ जता सके। नूरीन ने ज़ुबैर की आँखों में आँखें डालकर साफ़ कह दिया कि एक बाप जन्म देने से नहीं, बल्कि पालने और साया बनने से बनता है। आर्यन अपने पापा आफ़ताब की उँगली पकड़े खड़ा था और उसकी मासूम आँखों में ज़ुबैर के लिए सिर्फ़ एक अजनबी का भाव था। ज़ुबैर टूट गया। वह समझ गया कि जैविक सच चाहे जो भी हो, लेकिन मोहब्बत, परवरिश और वफ़ादारी का सच उससे कहीं बड़ा होता है।

आर्यन किसका ख़ून है? यह राज़ सिर्फ़ तीन दिलों में दफ़न रहा,आफ़ताब, नूरीन और ज़ुबैर। दुनिया के लिए और ख़ुद आर्यन के लिए, वह हमेशा आफ़ताब अहमद का ही बेटा रहा। अपनी ही औलाद के सामने अजनबी बनकर खड़ा रहना ज़ुबैर के लिए असहनीय हो गया। वह नम आँखों, पराजित मन और गहरे पछतावे के साथ आफ़ताब की हवेली से बाहर निकल आया। शाम के साए गहरे हो रहे थे और वादी पर बर्फ़ीली धुंध छा रही थी। ज़ुबैर अपने ही ख़यालों के बोझ तले दबा हुआ, पहाड़ी के किनारे बनी एक बेहद पथरीली और ख़तरनाक रस्ते पर चुपचाप चला जा रहा था। उसका दिमाग़ अतीत की यादों और अपनी तक़दीर के फ़ैसलों में उलझा हुआ था। कुछ दूरी पर आफ़ताब और नूरीन, आर्यन का हाथ थामे दूर से ज़ुबैर को जाते हुए देख रहे थे। आफ़ताब के दिल में उस इंसान के लिए एक हमदर्दी भी थी जो अपनी ही निशानी से महरूम होकर लौट रहा था। तभी अचानक… पहाड़ी के अंधे मोड़ से एक तेज़ रफ़्तार काली वैन बेहद लापरवाही से निकलकर आई। तेज़ हॉर्न की आवाज़ हवा में गूँजी, लेकिन ज़ुबैर ख़यालों की इतनी गहरी वादी में खोया था कि उसे आने वाले ख़तरे का अहसास ही नहीं हुआ। एक ज़ोरदार टक्कर हुई! वैन का ज़बरदस्त धक्का ज़ुबैर को लगा और वह हवा में उछलता हुआ पगडंडी के किनारे से सीधे सैकड़ों फ़ीट गहरी, पथरीली खाई में जा गिरा।
नूरीन की चीख़ वादी की ख़ामोशी को चीरती हुई निकल गई। आफ़ताब और नूरीन बदहवास होकर खाई के किनारे की तरफ़ भागे। आफ़ताब ने तुरंत रेस्क्यू टीम को फ़ोन किया और ख़ुद नीचे उतरने की कोशिश की, लेकिन नीचे का मंज़र भयानक था,सफ़ेद बर्फ़ पर सुर्ख़ ख़ून के निशान थे और ज़ुबैर का शरीर पूरी तरह शांत हो चुका था। जब तक मदद पहुँची, ज़ुबैर इस फ़ानी दुनिया को छोड़कर जा चुका था। उसकी खुली हुई नम आँखें आसमान की तरफ़ देख रही थीं, जैसे इस निर्दयी तक़दीर से अपने सवालों का जवाब माँग रही हों। नूरीन ने आफ़ताब के काँधे पर सर रखकर अपने आँसू बहाए। आफ़ताब ने नूरीन के सिर पर शफ़क़त से हाथ रखा और मासूम आर्यन को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। ज़ुबैर की मौत के साथ ही वह राज़ हमेशा-हमेशा के लिए उस गहरी खाई और वादी-ए-क़श्मीर की बर्फ़बारी में दफ़न हो गया। नूरीन की इज़्ज़त पर कोई आँच नहीं आई, आर्यन अपने असली रक्षक (आफ़ताब) और अपनी माँ की छाँव में सुरक्षित रहा, और यह दास्तान एक अजीब, रहस्यमयी और जज़्बाती ख़ामोशी पर मुकम्मल हुई।



