डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

पंद्रह अगस्त का पावन अवसर प्रत्येक भारतीय के हृदय में देशभक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की नई ऊर्जा का संचार करता है। वर्ष 2026 में जब हम स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तब ‘हर घर तिरंगा’ और ‘घर-घर तिरंगा’ अभियान अब केवल एक आयोजन नहीं बल्कि जन-जन के जीवन का एक अटूट सांस्कृतिक पर्व बन चुका है। तेरह से पंद्रह अगस्त के मध्य देश के हर कोने में फहराता हुआ तिरंगा भारत की अखंडता एकता और निरंतर प्रगति का उद्घोष करता है। यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि यह आजाद भारत केवल एक भूभाग नहीं अपितु हमारी भारत माता है जिसकी रक्षा और संवर्धन के लिए प्रत्येक नागरिक प्रतिबद्ध है। जब हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को अपने घरों पर फहराते हैं तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम इसके गौरवशाली इतिहास और इसके पीछे के महान संघर्ष को भी गहराई से समझें।

हमारे राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना आंध्र प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया जी ने की थी। ध्वज निर्माण के अध्ययन में उनकी गहरी रुचि थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने विभिन्न देशों के ध्वजों का गहन अध्ययन करने के पश्चात एक प्रारूप तैयार किया। वर्ष 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने गांधी जी को लाल और हरे रंग से बना ध्वज दिखाया जो तत्कालीन समय में दो प्रमुख समुदायों और क्रांति का प्रतीक था। इसके बाद जालंधर के लाला हंसराज के सुझाव पर ध्वज में प्रगति के प्रतीक चरखे को स्थान दिया गया। महात्मा गांधी की प्रेरणा से शांति और सत्य के प्रतीक सफेद रंग को भी इसमें शामिल किया गया। वर्ष 1931 में कांग्रेस ने केसरिया सफेद और हरे रंग से सुसज्जित ध्वज को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया। अंततः भारत की स्वतंत्रता से ठीक 24 दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने चरखे के स्थान पर धर्मचक्र को समाहित करते हुए इसे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया।

स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ध्वज के रंगों और चक्र के दार्शनिक महत्व की सुंदर व्याख्या की थी। उन्होंने बताया था कि शीर्ष पर स्थित केसरिया रंग देश के त्याग ताक़त और साहस का प्रतीक है। मध्य की श्वेत पट्टी सत्य शांति और पवित्रता का संदेश देती है। नीचे स्थित गहरा हरा रंग भारत की उर्वरता समृद्धि और शुभता को दर्शाता है। सफेद पट्टी के मध्य स्थित नीले रंग का अशोक चक्र सारनाथ के अशोक स्तंभ से लिया गया है। यह चक्र धर्म और गतिशीलता का प्रतीक है जो यह संदेश देता है कि जीवन गति में है और ठहराव मृत्यु है। चक्र में बनी 24 तीलियां देश को चौबीसों घंटे निरंतर उन्नति और विकास के पथ पर अग्रसर रहने की प्रेरणा देती हैं। 3:2 के अनुपात में निर्मित हमारा तिरंगा ध्वज भारत की महान परंपरा और आधुनिक आकांक्षाओं का सुंदर समन्वय है।
राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ-साथ भारतीय ध्वज संहिता अर्थात फ्लैग कोड ऑफ़ इंडिया के नियमों का पालन करना भी प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के अंतर्गत ध्वज फहराते समय यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि तिरंगा स्वच्छ सम्मानजनक स्थिति में हो तथा उसे कभी भी उल्टा या झुकाकर न फहराया जाए। राष्ट्रीय ध्वज का स्पर्श भूमि अथवा जल से नहीं होना चाहिए। तिरंगे का उपयोग किसी पोशाक रुमाल या सजावटी वस्त्र के रूप में करना ध्वज संहिता के विरुद्ध है। जब हम नियमों का पूर्ण निष्ठा से पालन करते हुए अपने घरों और संस्थानों पर तिरंगा फ़हराते हैं तभी ध्वज का वास्तविक सम्मान होता है।
आइए स्वतंत्रता के इस पावन पर्व पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम जाति पंथ और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देंगे। अपने घर पर तिरंगा फ़हराकर हम संपूर्ण विश्व को भारत की अटूट एकता शांति और समृद्धि का संदेश दें और देश के स्वाभिमान के लिए सदैव समर्पित रहने की क़सम खाएं।
जय हिंद जय भारत,,,,सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा,,,




