शिक्षा पद्धति में बड़े बदलाव की आवश्यकता।

1951 में हुई जनगणना के अनुसार बिहार की साक्षरता दर 13.5 फ़ीसदी थी जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में करीब 62 फ़ीसदी लोग साक्षर हैं।

हर युवा की पहली ख्वाहिश होती है आत्मनिर्भर होनाऔर आत्मनिर्भर होना कहीं न कहीं रोजगार की उपलब्धि पर निर्भर करती है।रोजगार की उपलब्धि दो बातों पर निर्भर करती है। पहली हमारी सरकार द्वारा नागरिकों को प्रदान कराए गए अवसर और दूसरा जिसका सीधा प्रभाव हमारे कैरियर पर पड़ता है वह है शिक्षा की गुणवत्ता। हमें अंग्रेजों से आजाद हुए सात दशक से अधिक हो चुके हैं। शिक्षा आमजन का मूलभूत अधिकार है और इसे उपलब्ध करवाना हमारी सरकार का मूल कर्तव्य। परंतु अफसोस कि आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए हमारी सरकार कुछ नहीं कर सकी और न ही उसके लिए प्रयत्नशील दिखती है। 1951 में हुई जनगणना के अनुसार बिहार की साक्षरता दर 13.5 फ़ीसदी थी जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में करीब 62 फ़ीसदी लोग साक्षर हैं। आने वाले वर्षों में साक्षरता दर और बढ़ने की पूरी संभावना है। परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि ये आंकड़े सिर्फ यह बताते हैं कि प्रदेश में कितने डिग्री धारी मौजूद हैं।यह बता पाना काफी कठिन है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने वालों की प्रतिशतता क्या है। बिहार की गिनती अभी भी पिछड़े राज्यों में की जाती है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का घोर अभाव होना है और उसकी वजह से लोगों का बेरोजगार होना है। पूरा की पूरा शिक्षा तंत्र ही दोषपूर्ण नजर आता है। सुबह.सुबह ढेर सारी किताबें , कांपियाँ, टिफिन, पानी की बोतल से भरी भारी भरकम बैग को पीठ पर लादकर स्कूल जाते बच्चे हर जगह नजर आते हैं। स्कूलों में किताबों में लिखी बातों को बच्चों को पढ़ाना, लिखाना, उन्हें रटा देना। शिक्षक ने नोटबुक में जो लिखाया है, वही हूबहू परीक्षा में लिखना और तभी परीक्षा में अच्छे अंक पाना, ऐसी व्यवस्था बन चुकी है। बच्चों और उनके अभिभावकों का पूरा का पूरा लक्ष्य अच्छे से अच्छे अंक हासिल करना रह गया है। प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में ज्यादातर बच्चे सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने जाते हैं। ऊंघते और गप्पे लड़ाते गुरुजी, गणित के शिक्षक भूगोल तो अंग्रेजी के शिक्षक संस्कृत या फिर कोई और विषय पढ़ाते हुए आमतौर पर नजर आ जाते हैं। कागजी कार्यों का अंबार और कक्षा छोड़ कर कागजी कार्य और प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाते शिक्षक कमोबेश पूरे प्रदेश में नजर आते हैं। महाविद्यालयों में कहीं बच्चों का इंतजार करते प्रोफेसर, तो कहीं प्रोफ़ेसर का इंतजार करते बच्चे। परीक्षा नजदीक आते ही प्रोफ़ेसर से नोट्स लेने के लिएएतो बाजारों में गेस पेपर खरीदने के लिए बच्चों की भीड़ नजर आती है। परीक्षाओं में करीब.करीब पूरे प्रदेश में गेस पेपर खोलकर नकल करते बच्चे आसानी से नजर आ जाते हैं। यही है हमारी शिक्षा व्यवस्था। प्राथमिक शिक्षा से लेकर महाविद्यालय तक की शिक्षा की हालत शर्मनाक है। सरकार द्वारा संचालित कई विद्यालय भवनहीन हैं तो कई जर्जर भवनों में चल रहे हैं और किसी अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं। हजारों ऐसे शिक्षक हैं जिन्हें न तो अपने विषय की जानकारी है और न ही सामान्य ज्ञान की जानकारी। कोई जनवरी फरवरी की स्पेलिंग गलत पढ़ा रहा है तो कोई बच्चों का निजनतम Future खराब कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बड़े.बड़े निजी विद्यालय बच्चों को हर चीज दे रहे हैं सिवाय शिक्षा के। बड़े.बड़े निजी विद्यालय शिक्षा के नाम पर व्यवसाय कर रहे हैं। सरकार ने ष्राइट टू एडुकेशन निजी विद्यालयों पर भी थोप दिया है। ताज्जुब की बात है कि हमारी सरकार अपनी जनता को शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधा दे पाने में विफल रही है। परीक्षा में नकल कर बच्चे पास हो रहे हैं और रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। प्रदेश में तकनीकी शिक्षण संस्थानों का घोर अभाव है और बच्चों को स्वरोजगार की समझ नहीं है। रोजगार पूर्ण शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है। बच्चे सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाने के लिए शिक्षा पाना चाहते हैं और नौकर बनकर खुश हैं। शिक्षा का उद्देश्य ही बदल गया है। शिक्षा का उद्देश्य शिक्षित और समाज का जिम्मेदार नागरिक बनना नहीं बल्कि नौकरी पाना रह गया है। शोध और खोज के प्रवृति बच्चों में खत्म होती नजर आ रही है जो वर्तमान शिक्षा पद्धति का सबसे नकारात्मक पहलू है। वर्तमान शिक्षा बच्चों को किताबी ज्ञान तो उपलब्ध करवा पा रही है परंतु सामाजिक और बौद्धिक ज्ञान दे पाने में नाकाम साबित हो रही है। अफसोस कि आज के बच्चों को चना, धान और गेहूं के पौधों की पहचान नहीं है। वर्तमान शिक्षा बच्चों को सामान्य ज्ञान की समझ दे पाने में नाकाम नजर आ रही है। वर्तमान शिक्षा पद्धति बच्चों को मजबूत नहीं मजबूर बना रही है। बच्चे मानसिक रूप से इतने कमजोर होते जा रहे हैं कि मामूली सा तनाव भी नहीं झेल पाते और ये बच्चे बड़े.बड़े पदों पर जाकर भी छोटी छोटी बातों के लिए आत्महत्या कर रहे हैं। देश के शिक्षाविदों को हमारी सरकारों को इस पर सोंचना होगा इस पर विचार करना होगा। बेहतर कल के लिए हमें एक बेहतरीन शिक्षा पद्धति अपनानी होगी जो हमारे बच्चों को जो देश के भविष्य हैं हमारे नौनिहालों को न सिर्फ किताबी ज्ञान दे बल्कि उन्हें बौद्धिक ज्ञान भी दे। सिर्फ एक अधिकारी नहीं बनाए बल्कि उन्हें एक बेहतरीन इन्सान बना सकें।

                

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