हम बदल गए ना ? चारों ओर फैला महिलाओं के प्रति आतंक , यूजीसी के दायरे में छात्रों का एक दूसरे के प्रति भ्रम , चरित्र की दुहाई देती सरकार, सवाल करने वालों के साथ प्रताड़ना , गाय के नाम पर हत्या और दीपक का मोहम्मद के साथको नहीं पचा पाने की आज के कुछ लोगों की सोंच,— फिर भी हम चुप ???? आज की स्थिति इस कहानी से समझें -मनीषा कुमारी

बेटा आप अकेली दिल्ली जा रही हो संभल कर जाना। सुना है दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। अपना फोन सदा ओन रखना। अगर कोई दिक्कत हो तो तुरंत पत्रकार भैया से बात करना। मीडिया के द्वारा परोसे खबरों से प्रभावित होने के कारण पापा का डरना लाजमी था। मैं भी डर रही थी पर परिवार की जिम्मेदारियां मजबूर कर रखा था आखिर पत्रकारिता जो करनी थी और पापा का ईलाज भी तो करवाना है जो बिहार में रह कर संभव नहीं है क्योकि यहा पर काम हे ही नहीं है।
सपनों का बुलेट
मोदी जी की सपनों का बुलेट ट्रेन ना सही पर तूफान एक्सप्रेस जो कभी तूफानी हुआ करती थी जो आज हम बिहारियों की मजबूरी की गाडी बन चूकी है।जब आपको किसी गाडी में स्थान ना मिले आप को तूफान एक्सप्रेस अपना सेवा देगा।लालकिला,इंडिया गेट,जंतर मंतर के सपनों के बीच अच्छे भविष्य के सपनों को समाहित कर एक अकेली लडकी दिलवालों की दिल्ली के लिए तूफान एक्सप्रेस में सवार हो अंजाना सफर पर निकल पडी है। तूफान एक्सप्रेस अपने अंदाज में थी।
बाहर का नजारा भी ट्रेन की ही रफ्तार से ट्रेन की उल्टी दिशा में भाग रहा था। खेत, पेड़, नदी, पहाड़ और आदमी सब को पहिये लग गये थे। मैं उन भागते हुए
दृश्यों को अपनी ठहरी हुई आंखों से देखते हुए न जाने कब सो गयी, मुझे पता ही नहीं चला। 21 घंटे बाद दिल्ली आने वाली थी, घड़ी ने यही कोई साढ़े सात या आठ बजाये होंगे कि ठंढी हवाओं ने हमें जगा दिया था। तूफान एक्सप्रेस लाल किले के पीछे से गुजर रही थी और रेल की पटरियों के किनारे बसी बस्तियों के घरों के भीतर तक हमारी निगाहें घुस चुकी थी। कहने के लिए तो उन झोपड़ियों में दीवारें थीं, पर सब कुछ दिख रहा था। उनका सोना, रोना, लड़ना, नहाना, धोना सब कुछ बेपर्दा था। जिंदगी का बेपर्दा होना कैसा होता है, मैंने पहली बार वहीं महसूस किया था। निजता जैसा कोई शब्द उन झोपड़ी में रह रहे लोगों ने शायद ही कभी सुना हो। जिंदगी वहां शर्म के बंधनों से आजाद थी, या यूं कहें उनकी और हमारी शर्म की परिभाषा में बहुत बड़ा अंतर था। जो हमारे लिए शर्म है उनके लिए क्या है मैं नहीं जानती, पर शर्म बिलकुल नहीं है। जिंदगी जीने के जज्बे, जरूरत, या मजबूरी (आप जो भी कहना चाहें) के आगे शर्म बहुत छोटी चीज होती है। मेरे लिए ये बात भी बिलकुल साफ हो गयी थी।
रेल कुछ आगे बढ़ चुकी थी और अब जिस इलाके से गुजर रही थी, वहां कूड़े-कचरे का अंबार लगा था। आंखों में समायी लाल किले की सूरत कचरे में बचपन गुजारते और रोटी तलाशते बच्चों की तस्वीर के आगे फीकी पड़ गयी थी। लाल किले के प्राचीर से चढ़ कर भाषण देते प्रधानमंत्री को शायद ये बच्चे कभी नहीं दिखे होंगे। नहीं तो उन्हें भी उतनी ही निराशा होती, जितनी मुझे हर बार ये महसूस करके होती है कि सन सैंतालिस (1947) में जो आजादी मिली, वो झूठी थी। मैं जब भी ये सोचती हूं, मुझे देश के वजीर-ए-आला की हर दलील झूठी और विकास का हर आंकड़ा बेमानी जान पड़ता है। मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि जब वो लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित कर रहे होते होंगे, डाइस के पीछे उनके पैर, ये सारे झूठे और बेमानी शब्द बोलते हुए कांपते होंगे, पर राजधर्म में फंसा हुआ आदमी अधर्म करने को अभिशप्त होता है। यही उसकी नियति होती है।
खैर देश के प्रधानमंत्री के बारे में सोचते-सोचते मैं रेल में सवार आगे बढ़ ही रही थी कि तभी मेरी नजर कचरे के ढेर के बीच करीब 14-15 साल के लड़के-लड़कियों पर पड़ी। वो प्रयोगशाला में विज्ञान के प्रयोग करने की उम्र में कचरे के ढेर में शरीर के प्रयोग कर रहे थे। जब देश में उनकी उम्र के कई बच्चे हाथ में किताबें थाम कर तेज आवाज में वर्ड मीनिंग, पहाड़ा और गणित के सूत्र रट रहें होंगे, वो जिंदगी की बेजान और बेरंग तस्वीर में एक फीका सा रंग भरने में लगे थे। वो रंग जो अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, कुंठा और नशे में रंगीन लगता है, पर है बिल्कुल भी नहीं। वहां पहली बार लगा कि इनके लिए जीवन महज भूख भर बचा है, पर ऐसा कैसे हुआ और किसने किया? सवाल गहराता गया और मैं डूबती गयी। जब थोड़ा निकला तो पाया कि पुरानी दिल्ली स्टेशन आ चुका था।औरों के जैसा मैं भी दिल्ली जंक्शन से बाहर निकल पड़ी। अभी सीढ़ीयों से बाहर की ओर निकल ही रही थी कि देखा पुलिस वाले ने दो अधेड़ों के साथ एक 14-15 साल के बच्चे को किनारे कर रखा था और उनकी मां बहनों को इज्जत दे रहा था।
मैं कुछ साफ समझ पाती कि उसने उस बच्चे की मुट्ठी में बंद पसीने में डूबी, तुड़ी-मुड़ी 500 रुपये के नोट छीन लिये और डांट कर भगा दिया। मैंने बढ़ कर बच्चे से पूछी तो उसने बताया कि वो अपने पिता के मरने के बाद घर का खर्च चलाने के लिए, गांव के कुछ लोगों के साथ दिल्ली मजदूरी करने बिहार बेगूसराय से आया है। ये रुपये उसकी मां ने बचा रखे थे और उसे काम न मिलने तक अपना पेट भरने के लिए दिये थे, जिसे पुलिस वाले ने छीन लिया। ये कहते हुए वो बच्चा (जिसे परिस्थियों ने जवान या यूं कहें की बूढ़ा बना दिया था) बच्चों की तरह रोने लगा। तभी पीछे से वो पुलिस वाला आ गया और उसने उस बच्चे को एक लाठी जमायी और कहा कि “अबे! जाता है कि हवालात ले चलूं” वो लड़का सकपका के आंसू पोंछते हुए चला गया।

मैं अभी कुछ समझ नहीं पायी थी कि पुलिस वाले ने मुझसे कहा कि चलो हवालात, मैंने पूछा किस जुर्म में? उसने कहा कि गांजा अफीम बेचते और बेचबाते हो और रंगबाजी दिखाते हो और हवा में लाठी तान ली। मुझे डरना नहीं चाहिए था, पर मैं डर गयी। शायद दिल्ली में महिलाओं से इसी तरह पुलिस वाला पेश आता है। मेरे दिमाग में संविधान की प्रस्तावना से लेकर लोकतंत्र के परिभाषा तक सब कुछ अचानक नाच गया। मैं, हम भारत के लोग, या जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार जैसा कुछ बोलना चाहती थी। पर मैंने सकपकाते हुए कहा कि महोदय मैं पत्रकार हूं । आप मुझे गलत समझ रहे हैं। उस हवलदार को जैसे मेरे पत्रकार होने ने भीतर से रोक दिया हो, पर उसके मुंह से गाली नहीं रोक सका। उसने मेरी मां और बहन की तारीफ की और भाग जाने को कहा। मैं वहां से नहीं जाना चाहती थी और वहीं पर अब्राहम लिंकन, नेल्सन मंडेला, गांधी या अन्ना हो जाना चाहती थी। मैं संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देना चाहती थी और खुद के आजाद होने पर दलील देना चाहती थी। मैं वहां आजादी जीना चाहती थी पर मैं वहां से चुपचाप चली आयी।
आम आदमी की सीमाएं वहां मुझसे जीत गयीं और मैं हार गयी। मेरी आंखों में मेरा घर परिवार नाचने लगा था, मेरी जिम्मेदारियां कोई मेरे कानों में आवाज मार-मार कर मुझे याद दिलाने लगा। मैंने पाया मैं कैद हूं और मैं डर गयी। मैंने महसूस किया कि संविधान से ले कर लोकतंत्र तक की सारी समझ किताबी है और जमीन पर जिंदगी घर-परिवार और जिम्मेदारियों का दूसरा का नाम है। मैंने वहां जाना कि एक आम आदमी के लिए हवालात भी एक ऐसा शब्द हो सकता है, जिसे सुन कर आत्मा तक कांप उठे।
उस वक्त मैंने पाया, मेरा कुछ हिस्सा वहीं हवलदार मुंह से निकले हवालात शब्द में कैद हो गयी है। मेरा वो हिस्सा मुझे आज भी आवाज दे रहा है और कह रहा है कि मेरे भीतर एक कायर रहता है। मुझे उसे मार देना चाहिए। जब-जब वो आवाजें आती हैं, मेरे वजूद का हर एक हिस्सा परेशान हो उठता है। उस वक्त मुझे ये आजादी झूठी लगती है और मैं एक कैदी सा महसूस करने लगती हूं।
