हंगामे में डूबी संसद, सुधार पर बहस से भागा विपक्ष

बैंकर बुक्स एविडेंस विधेयक से डिजिटल न्याय व्यवस्था को नई ताकत-रितेश सिन्हा

लोकसभा ने बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच बैंकर बुक्स एविडेंस (संशोधन) विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया। विडंबना यह है कि जिस कानून का सीधा संबंध देश की बैंकिंग व्यवस्था, आर्थिक अपराधों पर अंकुश और न्यायिक प्रक्रिया को आधुनिक बनाने से है, उस पर गंभीर बहस करने के बजाय विपक्ष ने एक बार फिर सदन को शोर-शराबे का अखाड़ा बना दिया। लोकतंत्र में सरकार को कठघरे में खड़ा करने का सबसे प्रभावी माध्यम तथ्य, तर्क और संसदीय विमर्श होता है, लेकिन जब विपक्ष बहस छोड़कर केवल हंगामे की राजनीति करता है, तब सबसे बड़ा नुकसान संसद की गरिमा और देश के हितों का होता है।

यह पहली बार नहीं है जब महत्वपूर्ण विधेयक हंगामे की भेंट चढ़े हों। यदि विपक्ष को इस विधेयक के किसी प्रावधान पर आपत्ति थी, तो उसके पास संशोधन लाने, विस्तृत चर्चा करने और सरकार से जवाब मांगने का पूरा अवसर था। लेकिन बहस से दूरी और राजनीतिक प्रदर्शन से निकटता ने यह संदेश दिया कि विपक्ष का उद्देश्य कानून को बेहतर बनाना कम और सदन की कार्यवाही को बाधित करना अधिक था। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असहमति का सबसे प्रभावी हथियार तर्क होता है, न कि निरंतर व्यवधान। भारत की बैंकिंग व्यवस्था पिछले एक दशक में पूरी तरह बदल चुकी है। यूपीआई, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, आधार आधारित प्रमाणीकरण और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) ने वित्तीय प्रणाली को अभूतपूर्व गति दी है। करोड़ों लेन-देन प्रतिदिन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो रहे हैं। ऐसे में 1891 के औपनिवेशिक दौर के बैंकर बुक्स एविडेंस कानून को बदलना समय की आवश्यकता बन गया था। डिजिटल बैंकिंग के युग में यदि न्यायालय अब भी केवल कागजी अभिलेखों पर निर्भर रहें, तो न्यायिक प्रक्रिया समय से पीछे रह जाएगी।

यह विधेयक इलेक्ट्रॉनिक बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल प्रमाणित प्रतियों और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को न्यायालयों में अधिक प्रभावी कानूनी मान्यता देता है। इससे बैंक धोखाधड़ी, साइबर अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी कंपनियों के माध्यम से धन के हस्तांतरण, कर चोरी और अन्य आर्थिक अपराधों की जांच अधिक तेज और प्रभावी होने की संभावना है। जांच एजेंसियों को बार-बार मूल बैंक रिकॉर्ड मंगाने की आवश्यकता कम होगी और न्यायालयों में मुकदमों के निस्तारण की गति बढ़ेगी। आज वित्तीय अनियमितताओं का स्वरूप भी बदल चुका है। पहले फर्जी चेक और कागजी दस्तावेजों के जरिए धोखाधड़ी होती थी, अब शेल कंपनियों के नेटवर्क, फर्जी डिजिटल केवाईसी, साइबर हमलों, संदिग्ध ऑनलाइन लेन-देन, लेयरिंग और बेनामी खातों के जरिए अरबों रुपये की हेराफेरी की जाती है। ऐसे मामलों में बैंकिंग सर्वर, ट्रांजैक्शन लॉग, ऑडिट ट्रेल, आईपी एड्रेस, टाइम स्टैम्प और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड ही सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते हैं। यदि इन साक्ष्यों को कानूनी रूप से शीघ्र स्वीकार करने की व्यवस्था नहीं होगी, तो आर्थिक अपराधों की जांच वर्षों तक उलझी रह सकती है।

बैंकों को भी इस सुधार से बड़ी राहत मिलेगी। अब उन्हें हर मामले में मूल रजिस्टर या भारी-भरकम दस्तावेज न्यायालयों में भेजने की बाध्यता कम होगी। इससे प्रशासनिक बोझ घटेगा और बैंक ग्राहक सेवाओं तथा जोखिम प्रबंधन पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। साथ ही, तेज न्यायिक प्रक्रिया से निवेशकों का विश्वास भी मजबूत होगा, जो विकसित भारत की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। किसी भी तकनीकी सुधार की तरह यह विधेयक भी चुनौतियों से मुक्त नहीं है। यदि किसी बैंक के सर्वर पर साइबर हमला हो जाए, रिकॉर्ड से छेड़छाड़ कर दी जाए या किसी अंदरूनी कर्मचारी की मिलीभगत से डिजिटल डेटा बदल दिया जाए, तो केवल इलेक्ट्रॉनिक प्रति को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। इसलिए प्रत्येक डिजिटल रिकॉर्ड के साथ सुरक्षित ऑडिट ट्रेल, डिजिटल हस्ताक्षर, एन्क्रिप्शन, स्वतंत्र डिजिटल फॉरेंसिक जांच और ‘चेन ऑफ कस्टडी’ की मजबूत व्यवस्था अनिवार्य होगी। अन्यथा तकनीक अपराध रोकने के साथ-साथ अपराध छिपाने का माध्यम भी बन सकती है।

ग्राहकों की बैंकिंग गोपनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बैंक खातों में नागरिकों की आय, निवेश, ऋण, लेन-देन और व्यक्तिगत आर्थिक गतिविधियों की संवेदनशील जानकारी होती है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस कानून के नाम पर नागरिकों की निजता से कोई समझौता न हो। डेटा संरक्षण, न्यायिक निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही के बिना ऐसा कोई भी कानून भविष्य में विवाद का कारण बन सकता है। देश के सभी बैंक तकनीकी रूप से समान रूप से सक्षम नहीं हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक और निजी बैंक अत्याधुनिक डिजिटल प्रणालियों से लैस हैं, जबकि अनेक सहकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अभी भी सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। यदि पूरे बैंकिंग तंत्र में समान साइबर सुरक्षा मानक लागू नहीं किए गए, तो कानून का लाभ भी असमान रहेगा।

सरकार के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय है कि केवल विधेयक पारित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। कानून के साथ मजबूत साइबर सुरक्षा, बैंकिंग नियमन, डिजिटल फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं, न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों का विशेष प्रशिक्षण भी आवश्यक होगा। तकनीक आधारित कानून तभी सफल होते हैं, जब उन्हें लागू करने वाली संस्थाएं भी तकनीक के अनुरूप तैयार हों। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष संसद की कार्यशैली रही। विपक्ष यदि हर महत्वपूर्ण विधेयक पर बहस छोड़कर केवल हंगामे का रास्ता अपनाएगा, तो वह सरकार को नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करेगा। दूसरी ओर, सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़े विधायी सुधारों पर पर्याप्त चर्चा हो और सभी आशंकाओं का तथ्यात्मक उत्तर दिया जाए।

बैंकर बुक्स एविडेंस विधेयक निस्संदेह भारत की डिजिटल न्याय व्यवस्था को नई मजबूती देने वाला सुधार है। यह आर्थिक अपराधों के विरुद्ध लड़ाई को अधिक प्रभावी बना सकता है, न्यायिक प्रक्रिया को गति दे सकता है और बैंकिंग प्रणाली को आधुनिक कानूनी आधार प्रदान कर सकता है। लेकिन इसकी सफलता का अंतिम पैमाना केवल इसका पारित होना नहीं, बल्कि इसका निष्पक्ष, सुरक्षित और पारदर्शी क्रियान्वयन होगा। यदि सरकार जवाबदेही, साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण को समान महत्व देती है और विपक्ष भविष्य में हंगामे के बजाय सार्थक बहस की संस्कृति अपनाता है, तभी संसद में पारित ऐसे सुधार वास्तव में देश की न्याय और वित्तीय व्यवस्था को नई दिशा दे पाएंगे।

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