‘भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव’, भारत की सच्चाई का आईना : बुक समीक्षा

‘भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव’ एक समयोचित और अनिवार्य पुस्तक है। संपादक कमलेश सिंह, शोध सहयोगी भारत भूषण और परामर्शदाता संस्थान प्रसार भारती का यह सामूहिक प्रयास अत्यंत सराहनीय है। यह पुस्तक हमें बताती है कि भारत इस समय इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सही नीतियां हमें वैश्विक महाशक्ति बना सकती हैं, और थोड़ी सी भी लापरवाही हमें एक बड़े संकट में धकेल सकती है।

‘भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव’ बुक समकालीन भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक दस्तावेज है। इस बुक के मुख्य संपादक प्रख्यात लेखक और विश्लेषक कमलेश सिंह हैं, जिन्हें इस विषय पर गहन शोध के लिए जाना जाता है। बुक  को अकादमिक और व्यावहारिक रूप से समृद्ध बनाने में भारत भूषण ने मुख्य शोध सहयोगी की भूमिका निभाई है, जबकि भारत के राष्ट्रीय प्रसारक प्रसार भारती ने इसके परामर्शदाता के रूप में काम किया है। प्रसार भारती के जुड़ाव के कारण इस बुक में शामिल आंकड़े और निष्कर्ष अत्यंत प्रामाणिक और व्यापक हो जाते हैं। यह बुक  न केवल भारत की बढ़ती आबादी के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करती है, बल्कि यह भी बताती है कि किस प्रकार यह जनसांख्यिकीय बदलाव देश के भविष्य, अर्थव्यवस्था, राजनीति और सामाजिक संरचना को आकार दे रहा है।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों तक, भारत ने तीव्र जनसांख्यिकीय संक्रमण का अनुभव किया है। एक समय जहाँ भारत को ‘जनसंख्या विस्फोट’ के संकट से जूझते देश के रूप में देखा जाता था, वहीं आज इसे दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। कमलेश सिंह और उनकी टीम ने इस बुक  के माध्यम से इसी बदलाव को डिकोड करने का प्रयास किया है। बुक  का मुख्य उद्देश्य पाठकों को यह समझाना है कि जनसांख्यिकीय बदलाव केवल संख्याओं या जनगणना के आंकड़ों का खेल नहीं है। इसका सीधा संबंध मानव विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और प्रवासन से है। प्रसार भारती के परामर्श के कारण बुक  में नीति-निर्माताओं के दृष्टिकोण को भी शामिल किया गया है, जिससे यह आम पाठकों के साथ-साथ प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए भी एक मार्गदर्शिका बन जाती है। बुक को सुव्यवस्थित तरीके से कई खंडों और अध्यायों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक खंड जनसांख्यिकी के एक विशिष्ट आयाम को उजागर करता है।

बुक का पहला और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के युवा कार्यबल पर केंद्रित है। कमलेश सिंह ने आंकड़ों के माध्यम से दिखाया है कि भारत की आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। भारत के पास अगले दो-तीन दशकों तक दुनिया को श्रम शक्ति आपूर्ति करने की अनूठी क्षमता है। शोध सहयोगी भारत भूषण ने यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है—क्या हम इस युवा आबादी को सही शिक्षा और कौशल दे पा रहे हैं? यदि इन युवाओं को रोजगार नहीं मिला, तो यह लाभांश एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’  में बदल सकता है। इस बुक में घटती प्रजनन दर और क्षेत्रीय असमानता बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक ने बताया है कि भारत में कुल प्रजनन दर अब प्रतिस्थापन स्तर  से नीचे गिर रही है। लेकिन इसमें भारी क्षेत्रीय असमानता है। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में जनसंख्या स्थिर हो चुकी है या घट रही है। यहाँ बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है। बुक इस बात पर गंभीर चिंता जताती है कि यह क्षेत्रीय असंतुलन भविष्य में देश की राजनीति (संसद में सीटों के परिसीमन) और संसाधनों के बंटवारे को कैसे प्रभावित करेगा।

भारत भूषण के शोध का एक बड़ा हिस्सा आंतरिक प्रवासन,प्रवासन और शहरीकरण पर आधारित है। उत्तर और पूर्वी भारत से दक्षिण और पश्चिमी भारत की ओर होने वाले प्रवासन के पैटर्न को बुक  में बहुत अच्छी तरह से रेखांकित किया गया है। शहरीकरण की अनियंत्रित गति और महानगरों पर बढ़ते दबाव को लेकर बुक  में नीतिगत सुधारों की वकालत की गई है। आमतौर पर भारत को एक युवा देश माना जाता है, लेकिन यह बुक  हमें एक भावी संकट बुजुर्ग होती आबादी और सामाजिक सुरक्षा के प्रति भी सचेत करती है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण औसत आयु बढ़ रही है। बुक  के अनुसार, 2050 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। इसके लिए देश के पास पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और वृद्धाश्रमों का क्या ढांचा है? बुक  इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार और समाज दोनों को कटघरे में खड़ा करती है।

एक शोध-आधारित बुक  के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व उसके आंकड़ों की विश्वसनीयता होती है। इस बुक  में भारत भूषण का शोध सहयोग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, नीति आयोग की रिपोर्टों और संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों का बहुत ही सटीक उपयोग किया है। इस बुक  की सबसे बड़ी यूएसपी  इसका प्रसार भारती के परामर्श में तैयार होना है। प्रसार भारती के पास ग्रामीण और शहरी भारत के जमीनी स्तर के अनुभवों और साक्षात्कारों का एक विशाल संग्रह है। इस परामर्श के कारण बुक  केवल शुष्क सांख्यिकीय तालिकाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें केस स्टडीज और वास्तविक जीवन के उदाहरणों को शामिल किया गया है, जो आंकड़ों को जीवंत बना देते हैं। कमलेश सिंह ने संपादन के स्तर पर सराहनीय कार्य किया है। अकादमिक पुस्तकें अक्सर बहुत बोझिल और कठिन शब्दावली से भरी होती हैं, लेकिन इस बुक  की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और सुबोध हिंदी है। ‘Demographic Dividend’ के लिए ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’, ‘Replacement Level’ के लिए ‘प्रतिस्थापन स्तर’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें बहुत ही सरल तरीके से समझाया गया है। बुक में विभिन्न ग्राफ, पाई-चार्ट और मानचित्रों का उपयोग किया गया है। यह प्रस्तुतीकरण पाठकों को जटिल जनसांख्यिकीय रुझानों को एक नज़र में समझने में मदद करता है।

यह बुक  जनसंख्या को केवल एक समस्या के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे आर्थिक विकास के एक कारक के रूप में प्रस्तुत करती है। बुक  केवल वर्तमान का विश्लेषण नहीं करती, बल्कि आगामी 30-40 वर्षों के भारत का एक रोडमैप तैयार करती है।प्रत्येक अध्याय के अंत में समस्या के समाधान के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं, जैसे कि कौशल विकास में सुधार, महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी बढ़ाना और बुजुर्गों के अनुकूल बुनियादी ढांचे का निर्माण। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के जनसांख्यिकीय विभाजन को बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के बहुत ही तटस्थ और वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि यह बुक अपने विषय के साथ पूरा न्याय करती है, फिर भी एक समीक्षक के नाते इसमें कुछ कमियां भी नजर आती हैं। जनसांख्यिकीय बदलाव में ‘लिंगानुपात’ और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर एक अलग और अधिक विस्तृत अध्याय की आवश्यकता थी, जिसे संक्षेप में ही निपटा दिया गया है। आज के युग में जब हम जनसांख्यिकीय लाभांश की बात करते हैं, तो ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण नौकरियों पर आने वाले संकट का विश्लेषण भी जरूरी था। बुक  इस आधुनिक पहलू पर थोड़ी मौन दिखाई देती है। कुछ अध्यायों में (विशेषकर प्रवासन और शहरीकरण वाले खंडों में) आंकड़ों और तर्कों का दोहराव देखने को मिलता है, जिसे संपादन के दौरान और संक्षिप्त किया जा सकता था।

‘भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव’ एक समयोचित और अनिवार्य बुक है। संपादक कमलेश सिंह, शोध सहयोगी भारत भूषण और परामर्शदाता संस्थान प्रसार भारती का यह सामूहिक प्रयास अत्यंत सराहनीय है। यह बुक हमें बताती है कि भारत इस समय इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सही नीतियां हमें वैश्विक महाशक्ति बना सकती हैं, और थोड़ी सी भी लापरवाही हमें एक बड़े संकट में धकेल सकती है। यह बुक अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, पत्रकारों, नीति-निर्माताओं और सिविल सेवा के अभ्यर्थियों के लिए एक ‘मस्ट-रीड’ (Must-Read) बुक  है। आम पाठक भी, जो भारत के भविष्य और इसकी बदलती सामाजिक बनावट को समझना चाहते हैं, इस बुक  से बहुत कुछ सीख सकते हैं। सरल भाषा में गंभीर विषय को समेटने वाली यह कृति हिंदी वैचारिक लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

मीडिया मार्ट इंडिया रेटिंग: 4.5/5 (साढ़े चार सितारे)

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