खुमैनी को लेकर अटकलें और भारत की संतुलित कूटनीति पर सियासी घमासान-रितेश सिन्हा

मध्य-पूर्व का आकाश धुंधला पड़ चुका है। 28 फरवरी 2026 को इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, जिसे इज़राइल ने ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ और अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया। ईरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल भंडारों, परमाणु सुविधाओं और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के मुख्यालयों पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन बरसाए गए। इस हमले में ईरान के सात वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मारे गए, जबकि अमेरिका ने ईरानी नौसेना के 11 जहाजों को डुबो दिया। ईरान ने जवाब में खाड़ी देशों—सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और कतर—में मौजूद अमेरिकी अड्डों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिससे क्षेत्र में युद्ध का भयंकर साया मंडराने लगा। इस संकट के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत की अटकलें जोरों पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई को निशाना, क्षेत्रीय समीकरणों को हमेशा के लिए बदल देगी। पश्चिम एशिया पहले से ही हिजबुल्लाह-हमास संघर्ष, यमन के हूती विद्रोह और सीरिया की अस्थिरता से जूझ रहा था; अब यह नया तूफान पूरी दुनिया को हिला रहा है। भारत ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपेक्षाकृत संयम बरता। विदेश मंत्रालय ने 27 फरवरी को बयान जारी कर सभी पक्षों से संयम, तनाव कम करने और कूटनीति का आह्वान किया। सभी राज्यों की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मार्च को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति गहरी चिंता का विषय है। भारत संवाद और कूटनीति के माध्यम से सभी विवादों के समाधान का समर्थन करता है।” उन्होंने क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए अन्य देशों से सहयोग की अपील की।
यह रुख भारत की परंपरागत पश्चिम एशिया नीति को दर्शाता है। एक ओर इज़राइल से रक्षा प्रौद्योगिकी, खुफिया सहयोग और आतंकवाद विरोधी साझेदारी मजबूत है—मिसाइल डिफेंस सिस्टम डेविड्स स्लिंग, आयरन डोम और ड्रोन तकनीक इसके प्रमाण हैं। दूसरी ओर ईरान भारत के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है; 2025 में भारत ने ईरान से 20 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात किया।
चाबहार बंदरगाह परियोजना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक संपर्क मार्ग प्रदान करती है, जो पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भरता कम करती है। अमेरिका के साथ क्वाड और आई2यू2 जैसे मंचों पर रणनीतिक साझेदारी भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का आधार है। ऐसे में किसी एक पक्ष की ओर झुकाव भारत के बहुआयामी हितों को खतरे में डाल सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने 2 मार्च को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक बुलाई, जिसमें पश्चिम एशिया स्थिति पर विस्तृत समीक्षा हुई। उन्होंने यूएई राष्ट्रपति और इज़राइल प्रधानमंत्री से फोन पर बात की। भारतीय मिशनों ने ईरान, इज़राइल और खाड़ी देशों में रहने वाले 18 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों को सतर्क रहने की सलाह दी, लेकिन अभी निकासी की कोई योजना नहीं है। सरकार की इस ‘संतुलित चुप्पी’ पर विपक्ष ने हमला बोला।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, वैश्विक लोकतंत्र की उभरती आवाज़ है। जब पश्चिम एशिया में सैन्य कार्रवाई हो और खामेनेई जैसे नेता के जीवन पर संकट आए, तब भारत को स्पष्ट सिद्धांत अपनाने चाहिए।” उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भारत की ऐतिहासिक विरासत का हवाला देते हुए संघर्ष विराम, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन और कूटनीतिक समाधान की खुली मांग की।
मसूद ने सवाल उठाया, “रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब नैतिक चुप्पी नहीं। यदि भारत वैश्विक दक्षिण की नेतृत्वकारी आवाज़ बनना चाहता है, तो असंतुलित सैन्य कार्रवाइयों का विरोध करे। संसद को विश्वास में लिया जाए, सभी दलों से परामर्श हो। यदि तनाव बढ़ा, तो ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी कल्याण और आर्थिक रणनीति क्या?” उन्होंने जोर दिया कि विपक्ष राष्ट्रीय सहमति चाहता है, न कि राजनीति। अन्य विपक्षी दल ने भी इसी स्वर में बयान दिए, संसद में विशेष चर्चा की मांग की। यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रहा है।
पश्चिम एशिया से 60 प्रतिशत तेल आयात होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं, जो 10 प्रतिशत की उछाल है। इससे पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, महंगाई दर 6 प्रतिशत पार कर सकती है। परिवहन, उर्वरक और विनिर्माण क्षेत्र प्रभावित होंगे, राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। रुपये पर दबाव पड़ेगा, विदेशी निवेश घटेगा। स्टॉक मार्केट में 2 मार्च को 1500 अंकों की गिरावट देखी गई।
सामरिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ीं। हार्मुज जलडमरूमध्य से 20 प्रतिशत वैश्विक तेल पारगमन प्रभावित हो सकता है। ईरानी हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में भारतीय जहाजों को निशाना बनाने की धमकी दी है। भारत ने नौसेना तैनात कर दी, लेकिन लंबे संघर्ष में ईरान से ड्रोन खरीद प्रभावित हो सकती है। प्रवासी भारतीयों की रेमिटेंस (प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर) पर असर पड़ेगा।
विश्लेषकों का मत दोहरा है। पूर्व राजदूत ने कहा, “भारत की व्यावहारिक कूटनीति सही है। सार्वजनिक बयानबाजी से इज़राइल-अमेरिका संबंध खराब होंगे, जो QUAD और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को प्रभावित करेगा। बंद कमरों में कूटनीति प्रभावी है।” वहीं, विपक्षी विचारक मानते हैं, “भारत को G20 और UN में सक्रिय होकर शांति प्रस्ताव लाना चाहिए। खामेनेई की मौत के बाद ईरान में अस्थिरता से ISIS जैसे खतरे बढ़ेंगे। “संयुक्त राष्ट्र ने हमलों की निंदा की, लेकिन वीटो शक्तियां बाधा। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी अमेरिका के साथ जवाबी कार्रवाई की तैयारी में हैं। रूस-चीन ने ईरान का साथ दिया, जो बहुपक्षीय ध्रुवीकरण को गहरा रहा है।
यह बहस भारत की विदेश नीति की दिशा पर केंद्रित है—मुखर नैतिकता या व्यावहारिक संतुलन? यदि तनाव बढ़ा, तो भारत को ऊर्जा विविधीकरण (रूस, अमेरिका से अधिक आयात), नौसेना मजबूती और कूटनीतिक मध्यस्थता पर ध्यान देना होगा। इमरान मसूद जैसे नेताओं के बयान विमर्श को जीवंत बनाते हैं, लेकिन सरकार का रुख स्पष्ट है: शांति के लिए कूटनीति, हितों की रक्षा के लिए सतर्कता।पश्चिम एशिया का यह तूफान कब थमेगा, कहा नहीं जा सकता। लेकिन भारत की संतुलित कूटनीति इसकी परीक्षा लेगी। वैश्विक दक्षिण की नेता बनने का दावा सार्थक सिद्ध हो, यही अपेक्षा है। आने वाले दिन क्षेत्रीय घटनाक्रम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं पर नजर रखेंगे।
