विश्व में योग की धूम, भीतर ठेकों का हुजूम

योग को दुनिया तक पहुंचाने के लिए मोदी साधुवाद के पात्र,आयुष मंत्रालय ने बना दिया ठेका, प्रचार और दिखावे का बाजार-रितेश सिन्हा

योग भारत की प्राचीन साधना है। यह शरीर, मन और जीवन को संतुलित करने का सरल मार्ग है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग को विश्व मंच तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता दिलाने से लेकर दुनिया के अनेक देशों में योग को भारत की पहचान बनाने तक, मोदी ने योग को एक वैश्विक अभियान का रूप दिया। इसके लिए उन्हें साधुवाद मिलना चाहिए। इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है- जिस योग को मोदी ने भारत की सांस्कृतिक शक्ति बनाया, उसी योग को देश के भीतर आयुष मंत्रालय और उससे जुड़े तंत्र ने ठेकों, प्रचार और दिखावे के बाजार में क्यों बदल दिया?

इस बार भी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर बड़े दावे किए गए। दुनिया भर में करीब 2,500 स्थानों पर कार्यक्रमों की बात कही गई। भारत में इसका मुख्य आयोजन कोलकाता के रेड रोड पर हुआ, जहां प्रधानमंत्री मोदी ने योग को संतुलित जीवन, मानसिक शांति और स्वस्थ बुढ़ापे का आधार बताया। विषय रखा गया—“स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग”। विषय सही है, समय के अनुकूल भी। तनाव, मोटापा, मधुमेह और अनियमित जीवनशैली के इस दौर में योग की उपयोगिता और बढ़ जाती है। सवाल उठता है योग दिवस सचमुच जनस्वास्थ्य का अभियान है या फिर यह आयुष मंत्रालय, सरकारी तंत्र, ठेकेदार कंपनियों और मौसमी गैरसरकारी संस्थाओं के लिए सालाना कमाई का सबसे सुविधाजनक मंच!

योग पर किसी को आपत्ति नहीं है। आपत्ति उस तंत्र पर है, जिसने योग दिवस को जनस्वास्थ्य के अभियान से ज्यादा सरकारी आयोजन, ठेके, प्रचार और दिखावे का मंच बना दिया। हर साल 21 जून आते-आते मंत्रालयों, जिलों, नगर निकायों, विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों में खरीद और आयोजन की अलग हलचल शुरू हो जाती है। चटाइयां, वस्त्र, टोपी, बैनर, मंच, ध्वनि व्यवस्था, बड़ी स्क्रीनें, पानी, प्रमाणपत्र, छायांकन, प्रचार सामग्री, पंजीकरण, स्वयंसेवक, प्रसारण सब कुछ एक साथ। योग का मूल संदेश सरल है, उसके नाम पर खड़ा किया गया तामझाम भारी। 21 जून को योग होता है, 22 जून से भुगतान का हिसाब शुरू हो जाता है।

सबसे बड़ा सवाल आयुष मंत्रालय पर है। अगर योग को दुनिया तक पहुंचाने का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है, तो योग को देश के भीतर दिखावे, प्रचार और आयोजन-निर्भर मॉडल में बदलने की जवाबदेही भी आयुष मंत्रालय से पूछी जानी चाहिए। यही मंत्रालय हर साल योग को “जन-आंदोलन” बताता है, बड़े-बड़े दावे करता है, नए नारे गढ़ता है, लेकिन ज़मीन पर उसकी प्राथमिकताएं उलटी दिखाई देती हैं। 2025-26 में आयुष मंत्रालय को करीब 3,992.90 करोड़ रुपये मिले थे और 2026-27 में यह बढ़कर करीब 4,408.93 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इतने बड़े बजट के बाद भी अगर योग मोहल्ले, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और बुजुर्गों की दिनचर्या तक नहीं पहुंच पा रहा तो यह केवल कमी नहीं, मंत्रालय की नीति की नाकामी है। आयुष ने योग को जनस्वास्थ्य की स्थायी व्यवस्था बनाने के बजाय सरकारी दृश्य, सरकारी दावा और सरकारी आयोजन में बदल दिया।

मंत्रालय पर दूसरा सवाल और भी सीधा है। अगर आयुष के पास हजारों करोड़ रुपये हैं, तो देश के कितने जिलों में स्थायी योग केंद्र बने? कितने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में योग परामर्श शुरू हुआ? कितने सरकारी स्कूलों में नियमित योग शिक्षक तैनात हुए? कितने बुजुर्गों के लिए स्थानीय स्तर पर योग कार्यक्रम शुरू किए गए? इन सवालों के जवाब साफ-साफ सामने नहीं आते। वजह भी साफ है—मंत्रालय का जोर काम पर कम, काम के प्रचार पर ज्यादा दिखाई देता है। आयुष की कार्यशैली में एक बीमारी साफ दिखती है—जहां स्थायी ढांचा चाहिए, वहां आयोजन कर दो; जहां नियमित सेवा चाहिए, वहां नारा दे दो; जहां स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए, वहां प्रमाणपत्र बांट दो। यही प्रवृत्ति योग को नीति से ज्यादा प्रदर्शन बना रही है।

इस बार योग दिवस का विषय “स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग” रखा गया। लेकिन क्या आयुष मंत्रालय ने इस विषय के अनुरूप कोई स्थायी व्यवस्था बनाई? अगर मंत्रालय सचमुच बुजुर्गों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर होता, तो हर जिले में वरिष्ठ नागरिकों के लिए योग केंद्र बनते, शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में योग-परामर्श चलता, वृद्धजन समूहों के लिए नियमित योग सत्र होते और सरकारी अस्पतालों से जुड़ा एक योग सहायता ढांचा तैयार होता। लेकिन हुआ क्या? फिर वही एक दिन का भव्य आयोजन, मंच से संदेश, लाखों की भागीदारी के दावे, प्रचार का शोर और उसके बाद वही सन्नाटा। यही वजह है कि सवाल उठता है—क्या आयुष मंत्रालय योग को स्वास्थ्य नीति बनाना चाहता है, या उसे सालाना दृश्य-उत्सव बनाए रखना चाहता है?

आयुष मंत्रालय का दावा है कि उसके वर्ष भर के अभियान के तहत दो लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण देकर “योग मित्र” बनाया गया। सुनने में यह उपलब्धि बड़ी लगती है, लेकिन यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि इन दो लाख लोगों में कितने आज भी सक्रिय हैं? कितने गांवों, कस्बों और शहरों में वे नियमित योग सिखा रहे हैं? कितने बुजुर्गों, कितनी महिलाओं, कितने विद्यार्थियों और कितने रोगियों तक यह प्रशिक्षण पहुंचा? कितने जिलों में इससे स्थायी योग केंद्र बने? अगर इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह संख्या भी उसी सरकारी बीमारी का हिस्सा मानी जाएगी, जिसमें गिनती तो बहुत होती है, असर बहुत कम दिखाई देता है।

कोलकाता के मुख्य आयोजन को लेकर करीब 10 लाख लोगों की भागीदारी का दावा किया गया। अगर यह दावा सही है, तो इस आयोजन पर खर्च भी छोटा नहीं रहा होगा। मंच, सुरक्षा, यातायात, सफाई, चटाइयां, वस्त्र, प्रचार, पंजीकरण, प्रसारण, बड़ी स्क्रीनें, पानी, स्वयंसेवक, मीडिया प्रबंधन—इन सब पर कितना पैसा खर्च हुआ? किन कंपनियों को काम मिला? किन गैरसरकारी संस्थाओं को जिम्मेदारी दी गई? किस प्रक्रिया से दी गई? और सबसे अहम—क्या इसका पूरा ब्योरा सार्वजनिक है? अगर यह जनस्वास्थ्य का कार्यक्रम है, तो उसके खर्च पर पर्दा क्यों? जनता के नाम पर कार्यक्रम, जनता के पैसे से खर्च, लेकिन हिसाब अस्पष्ट—यहीं से शक गहराता है कि मामला योग से ज्यादा आयोजन और ठेकों का है।

योग दिवस अब धीरे-धीरे ठेका-उत्सव बनता जा रहा है। सबसे ज्यादा फायदा उस बुजुर्ग को नहीं मिलता जिसे रोज़ योग की जरूरत है। उस रोगी को नहीं मिलता जिसे मधुमेह, मोटापा, तनाव या बढ़ते रक्तचाप से राहत चाहिए। उस छात्र को नहीं मिलता जिसके स्कूल में खेल शिक्षक तक नहीं है। फायदा मिलता है आयोजन एजेंसियों, सामान सप्लाई करने वालों, छपाई फर्मों, मंच सजाने वालों, प्रचार एजेंसियों और जून के महीने में अचानक सक्रिय होने वाली गैरसरकारी संस्थाओं को। योग दिवस कम और काम-आदेश का मौसम ज्यादा लगता है।

गैरसरकारी संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। सिद्धांत यह है कि ये संस्थाएं योग को गांव-गांव, बस्ती-बस्ती, बुजुर्गों, महिलाओं और गरीब तबकों तक पहुंचाएं। लेकिन हकीकत में कई संस्थाएं जून आते ही अचानक सक्रिय हो जाती हैं। पंजीकरण शुरू, प्रमाणपत्र शुरू, तस्वीरें शुरू, “हजारों लोगों ने भाग लिया” जैसे दावे शुरू। कई जगह सेवा कम और दिखावा ज्यादा दिखाई देता है। योग के नाम पर सरकारी मंचों तक पहुंच, अनुदान, पहचान और अगली बार फिर काम पाने की तैयारी चलती है। योग को सेवा से ज्यादा परियोजना बना दिया गया है।

कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। योग चटाइयां, कपड़े, स्वास्थ्य किट, योग पाठ्यक्रम, ध्यान सत्र, दफ्तरों के लिए योग पैकेज—सब कुछ बिक रहा है। योग अब एक बड़ा व्यापार भी बन चुका है। मंच से सादगी और अनुशासन की बात होती है, लेकिन उसी मंच के पीछे योग के नाम पर बिक्री और प्रचार का पूरा कारोबार चलता है। योग सबका है, लेकिन उसके नाम पर कमाई कुछ लोगों की जेब में जा रही है। आम आदमी के हिस्से में तस्वीर आती है, बाजार के हिस्से में मुनाफा। योग की आत्मा सादगी में है, लेकिन उसके नाम पर खड़ा कारोबार ठेकों, प्रचार और मुनाफे पर पल रहा है।

आयुष मंत्रालय की सबसे बड़ी कमी यही है कि उसने योग को रोज़मर्रा की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाने के बजाय, उसे बड़े आयोजन का विषय ज्यादा बनाए रखा। अगर योग सच में इतना महत्वपूर्ण है, तो हर सरकारी स्कूल में योग शिक्षक क्यों नहीं हैं? हर शहर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में योग सलाह क्यों नहीं है? हर जिले में बुजुर्गों के लिए स्थायी योग केंद्र क्यों नहीं हैं? अगर योग तनाव, मधुमेह, मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली से लड़ने का हथियार है, तो उसे एक दिन के उत्सव तक क्यों सीमित कर दिया गया? आयुष को मंच नहीं, व्यवस्था बनानी चाहिए थी। भाषण नहीं, ढांचा खड़ा करना चाहिए था। देश का जनस्वास्थ्य ढांचा अभी भी कमजोर है। कई जगह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं हैं। बुजुर्गों के लिए अलग स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। स्कूलों में खेल और शारीरिक शिक्षा की हालत कमजोर है। ऐसे में अगर सरकार योग दिवस को स्वास्थ्य क्रांति बताती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। एक दिन का सामूहिक योग, साल भर की स्वास्थ्य कमी को नहीं छिपा सकता।

योग को दुनिया तक पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी साधुवाद के पात्र हैं, लेकिन योग के नाम पर मंत्रालयी दिखावा, ठेका-तंत्र, प्रचार-प्रधान मॉडल और गैरसरकारी संस्थाओं-कंपनियों की मौज के लिए आयुष मंत्रालय को जवाब देना ही होगा। योग दिवस का असली अर्थ तभी बनेगा जब सरकार हर खर्च का सार्वजनिक लेखा-परीक्षण कराए, बताए कि कितना पैसा स्थायी योग व्यवस्था पर लगा और कितना आयोजन पर, और यह भी बताए कि कितने स्थायी केंद्र बने, कितने प्रशिक्षक तैनात हुए, कितने बुजुर्गों और विद्यार्थियों को नियमित सुविधा मिली। योग भारत की धरोहर है, इस पर गर्व होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे विश्व मंच तक पहुंचाया, इसके लिए उन्हें श्रेय मिलना चाहिए। लेकिन अगर उसी योग के नाम पर ठेकों का हुजूम, प्रचार का शोर, आयुष की आत्मप्रशंसा, कंपनियों की कमाई और गैरसरकारी संस्थाओं की मौसमी सक्रियता सबसे ज्यादा दिखने लगे, तो सवाल उठेंगे ही। योग दिवस को जनस्वास्थ्य का पर्व बनना था, उसे सरकारी खरीद और आयोजन का मौसम नहीं बनना चाहिए था। आज हालत यह है कि योग के नाम पर साधना कम, सामान और सप्लाई का खेल ज्यादा दिखता है। दुनिया योग कर रही है, और हमारा तंत्र योग के नाम पर बजट, बैनर और बिल गिनने में लगा है। यही इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी विडंबना है।

योग के नाम पर देश को स्वास्थ्य, अनुशासन और संतुलन मिलना चाहिए था; लेकिन मंत्रालयी कामकाज ने उसके साथ प्रचार, भुगतान और प्रबंधन जोड़ दिया। मोदी ने योग को दुनिया तक पहुंचाया, पर आयुष मंत्रालय उसे अब तक जनता की रोजमर्रा की सेहत तक नहीं पहुंचा पाया। यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा विरोधाभास है—ऊपर योग का गौरव, नीचे योग का कारोबार।

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