पटना मेट्रो पर सम्राट चौधरी का एक्शन, लेकिन 7 साल की सुस्ती का हिसाब कौन देगा?

₹13,365 करोड़ की परियोजना पर मुख्यमंत्री की सख्ती, मगर नौकरशाही की कार्यशैली, विभागीय समन्वय की कमी और जवाबदेही पर बरकरार हैं बड़े सवाल (भाग-1) रितेश सिन्हा

बिहार की राजधानी पटना में बढ़ती आबादी, लगातार बिगड़ती यातायात व्यवस्था और शहरी विस्तार के बीच पटना मेट्रो परियोजना को राज्य के भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना परियोजनाओं में गिना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस परियोजना को बिहार के शहरी विकास की नई पहचान बनना था, वही आज अपनी धीमी रफ्तार और लगातार बढ़ती समयसीमा के कारण सवालों के घेरे में है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का सक्रिय होना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। हाल ही में उन्होंने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि निर्माण कार्य में तेजी लाई जाए, गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए और तय समयसीमा के भीतर परियोजना को पूरा किया जाए। सम्राट चौधरी का यह हस्तक्षेप बताता है कि सरकार अब इस परियोजना को लेकर गंभीर है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जिस परियोजना को 7 वर्ष पहले स्वीकृति मिली थी, उस पर आज भी बार-बार समीक्षा बैठकें करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? यदि समय पर निगरानी, विभागीय समन्वय और जवाबदेही सुनिश्चित होती, तो शायद आज स्थिति अलग होती।

पटना मेट्रो परियोजना को 27 फरवरी 2019 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली। परियोजना की कुल स्वीकृत लागत ₹13,365.77 करोड़ है। इसमें लगभग 32.50 किलोमीटर लंबा मेट्रो नेटवर्क विकसित किया जा रहा है, जिसमें दो कॉरिडोर शामिल हैं। पहला कॉरिडोर दानापुर से खेमनीचक और दूसरा पटना जंक्शन से न्यू आईएसबीटी तक प्रस्तावित है। संसद में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि परियोजना का संशोधित लक्ष्य सितंबर 2030 तक पूरा करने का है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। यदि 2019 में स्वीकृत परियोजना को पूरा होने में 2030 तक का समय लग रहा है तो क्या बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था बड़े आधारभूत ढांचा परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में सक्षम है? आखिर 7 से 11 वर्षों का समय किसी भी महानगर की मेट्रो परियोजना के लिए सामान्य कैसे माना जा सकता है?

सरकार ने संसद में देरी के कई कारण गिनाए हैं—भूमि अधिग्रहण में विलंब, भूमिगत उपयोगिता सेवाओं का स्थानांतरण, कोविड-19 महामारी, कुछ स्थानों पर एलाइनमेंट में बदलाव तथा जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी से ऋण समझौते में समय लगना। ये कारण निश्चित रूप से वास्तविक हैं, लेकिन इनसे एक और गंभीर प्रश्न पैदा होता है। क्या परियोजना शुरू करने से पहले इन चुनौतियों का समुचित आकलन किया गया था? यदि नहीं, तो परियोजना प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी थी?

देश में कोई भी बड़ी परियोजना बिना जोखिम के नहीं होती। लेकिन सफल परियोजनाओं और पिछड़ती परियोजनाओं में अंतर यह होता है कि सफल परियोजनाओं में समस्याओं का समाधान समय पर खोज लिया जाता है, जबकि कमजोर परियोजना प्रबंधन में समस्याएँ वर्षों तक परियोजना को पीछे धकेलती रहती हैं। पटना मेट्रो के मामले में भी यही तस्वीर दिखाई देती है।

भूमि अधिग्रहण, बिजली के खंभों का स्थानांतरण, जलापूर्ति पाइपलाइन, सीवर नेटवर्क, दूरसंचार केबल और यातायात प्रबंधन जैसे विषय अलग-अलग विभागों के अधीन आते हैं। यदि इनमें समन्वय मजबूत न हो, तो निर्माण एजेंसी चाहे जितनी सक्षम हो, परियोजना समय पर पूरी नहीं हो सकती। यही कारण है कि विशेषज्ञ किसी भी मेट्रो परियोजना में “इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट मैनेजमेंट” को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

यह केवल पटना मेट्रो की समस्या नहीं है। बिहार में अनेक बड़ी परियोजनाएँ वर्षों तक फाइलों में उलझी रहती हैं। सड़क निर्माण हो, सिंचाई योजना हो, सरकारी भवन हों या शहरी विकास की परियोजनाएँ—निर्धारित समयसीमा से पीछे रहने की शिकायतें नई नहीं हैं। यदि हर परियोजना में एक जैसे कारण सामने आते हैं, तो समस्या किसी एक एजेंसी की नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक कार्य संस्कृति की है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि परियोजनाओं में देरी के बावजूद जवाबदेही शायद ही कभी तय होती है। कितने अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई? किन ठेकेदारों पर दंड लगाया गया? किन विभागों ने निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं किया? इन प्रश्नों के उत्तर शायद ही कभी सार्वजनिक किए जाते हैं। यही कारण है कि समीक्षा बैठकों की संख्या बढ़ती जाती है, लेकिन परियोजनाओं की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाती।

केंद्र सरकार की परियोजना निगरानी रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2026 तक पटना मेट्रो की भौतिक प्रगति लगभग 49 प्रतिशत थी और लगभग ₹4,984 करोड़ व्यय किए जा चुके थे। यह निश्चित रूप से प्रगति का संकेत है, लेकिन यदि आधे से कम समय में आधा काम भी पूरा नहीं हुआ और शेष कार्य में भूमिगत निर्माण, सिस्टम इंस्टॉलेशन, ट्रैक, सिग्नलिंग, स्टेशन फिनिशिंग और ट्रायल जैसी जटिल प्रक्रियाएँ बाकी हैं, तो समयसीमा का पालन अपने आप में बड़ी चुनौती होगी।

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