हजारों करोड़ के निवेश के बावजूद रोजगार और उद्योग पर सवाल बरकरार, बियाडा और नौकरशाही की भूमिका भी कटघरे में

बिहार एक बार फिर विकास की नई बहस के केंद्र में है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्रों, सैटेलाइट टाउनशिप और शहरी विस्तार परियोजनाओं के लिए समेकित आधारभूत संरचना विकसित करने की कार्ययोजना पर तेजी से काम किया जाए। भूमि की पहचान, अधिग्रहण और हस्तांतरण की प्रक्रिया को गति देने के साथ-साथ सभी परियोजनाओं की नियमित समीक्षा का निर्देश भी दिया गया। सरकार का दावा है कि बिहार अब केवल सड़क और पुल निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश, उद्योग और रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। लेकिन यह लक्ष्य जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसकी राह उतनी ही कठिन है। क्योंकि बिहार की सबसे बड़ी चुनौती अब सड़क बनाने की नहीं, बल्कि उन सड़कों के किनारे उद्योग खड़े करने की है। राज्य की जनता भी अब यही सवाल पूछ रही है कि आखिर दो दशकों तक आधारभूत संरचना पर हुए भारी निवेश का लाभ रोजगार और आय के रूप में कब दिखाई देगा?

पिछले बीस वर्षों में बिहार ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2005 में जहां राज्य की सड़क लंबाई लगभग 14 हजार किलोमीटर थी, वहीं आज यह 26 हजार किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। राष्ट्रीय राजमार्गों का जाल भी तेजी से विस्तारित हुआ है। गंगा पर नए पुल बने, ग्रामीण संपर्क मार्गों का विस्तार हुआ, बिजली आपूर्ति की स्थिति में बड़ा सुधार आया और शिक्षा तथा स्वास्थ्य संस्थानों का नेटवर्क मजबूत हुआ। केवल वर्ष 2025 में ही राज्य सरकार ने 21,406 करोड़ रुपये की लागत वाली 11,346 सड़कों और 730 पुलों से जुड़ी परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इसके अतिरिक्त 8,716 करोड़ रुपये की लागत से 6,938 ग्रामीण सड़कों के सुदृढ़ीकरण का कार्य शुरू किया गया। यह ऐसे आंकड़े हैं जिनसे इनकार नहीं किया जा सकता। आज बिहार का बजट 3.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार 13 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंचने का अनुमान है। 2026-27 में पूंजीगत व्यय 63 हजार करोड़ रुपये से अधिक रखा गया है। यानी सड़क, पुल, भवन, सिंचाई, बिजली और अन्य परिसंपत्तियों के निर्माण पर अभूतपूर्व खर्च किया जा रहा है। लेकिन इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक असहज सच्चाई भी छिपी है। बिहार आज भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के सबसे निचले राज्यों में शामिल है। राष्ट्रीय औसत की तुलना में बिहार की प्रति व्यक्ति आय बेहद कम है। इसका अर्थ है कि सरकारी खर्च और आम नागरिक की आर्थिक स्थिति के बीच अभी भी बड़ी दूरी मौजूद है।
यही वह बिंदु है जहां बिहार के विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए, यदि आधारभूत संरचना में व्यापक सुधार हुआ, यदि सड़कें, पुल और बिजली की स्थिति बेहतर हुई, तो फिर बिहार की अर्थव्यवस्था उद्योग आधारित क्यों नहीं बन पाई? आखिर क्यों लाखों बिहारी आज भी रोजगार के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र की ओर पलायन करने को मजबूर हैं? क्यों बिहार आज भी देश का सबसे बड़ा श्रम आपूर्तिकर्ता राज्य बना हुआ है? इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीति में नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढांचे और औद्योगिक नीति के क्रियान्वयन में भी छिपा हुआ है। पिछले डेढ़-दो दशकों में बिहार में उद्योगीकरण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण यानी बियाडा के कंधों पर रही है। वर्तमान में उद्योग विभाग के सचिव कुंदन कुमार इसके अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक हैं। उनसे पहले भी कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने इस संस्था का नेतृत्व किया। लेकिन सवाल किसी एक अधिकारी का नहीं बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसने वर्षों तक बिहार के औद्योगिक भविष्य की दिशा तय की।
बियाडा का उद्देश्य उद्योगों के लिए भूमि उपलब्ध कराना, औद्योगिक क्षेत्रों का विकास करना और निवेशकों को आवश्यक सुविधाएं देना था। लेकिन पिछले 15 वर्षों का रिकॉर्ड देखा जाए तो उपलब्धियों और अपेक्षाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। मई 2026 में बियाडा ने 19 इकाइयों को लगभग 20 एकड़ भूमि आवंटित कर 284 करोड़ रुपये निवेश और 1,200 रोजगार की संभावना जताई। जनवरी 2026 में 25 इकाइयों को 12.5 एकड़ भूमि आवंटित कर 168 करोड़ रुपये निवेश तथा लगभग 1,194 रोजगार का दावा किया गया। फरवरी 2026 में 14 इकाइयों को 10 एकड़ भूमि देकर 108 करोड़ रुपये निवेश और लगभग 1,300 रोजगार का अनुमान व्यक्त किया गया। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में ये आंकड़े प्रभावशाली लग सकते हैं, लेकिन 13 करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्य के संदर्भ में इन्हें देखें तो तस्वीर बदल जाती है। प्रश्न उठता है कि क्या कुछ दर्जन इकाइयों और कुछ हजार संभावित नौकरियों को औद्योगिक क्रांति कहा जा सकता है? क्या यही वह गति है जिससे बिहार गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक या तेलंगाना जैसे राज्यों की बराबरी करेगा?
वास्तविकता यह है कि बिहार में वर्षों तक भूमि आवंटन को उपलब्धि और निवेश प्रस्तावों को सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया। जबकि किसी भी औद्योगिक नीति की सफलता का पैमाना चालू कारखाने, उत्पादन, निर्यात और रोजगार होते हैं। एमओयू उद्योग नहीं होता, निवेश प्रस्ताव रोजगार नहीं होता और भूमि आवंटन आर्थिक परिवर्तन नहीं होता। आर्थिक परिवर्तन तब होता है जब कारखानों की चिमनियां चलती हैं और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। बिहार की एक और बड़ी विडंबना यह रही कि विकास का बड़ा हिस्सा सरकारी खर्च पर आधारित रहा। सड़कें सरकार ने बनाईं, पुल सरकार ने बनाए, भवन सरकार ने बनाए और योजनाएं भी सरकार ने चलाईं। लेकिन निजी क्षेत्र की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी। किसी भी अर्थव्यवस्था की स्थायी मजबूती तब मानी जाती है जब निजी उद्योग निवेश करे, उत्पादन बढ़ाए और रोजगार सृजित करे। बिहार में यही कड़ी सबसे कमजोर रही।
नौकरशाही की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। बिहार का प्रशासनिक ढांचा देश के सबसे बड़े ढांचों में से एक है। वर्ष 2026-27 में राज्य सरकार लगभग 72,960 करोड़ रुपये वेतन पर, 35,170 करोड़ रुपये पेंशन पर और 25,364 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान पर खर्च करने जा रही है। यानी केवल इन तीन मदों पर ही 1.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होगा। यह राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग आधा हिस्सा है। स्वाभाविक रूप से जनता पूछेगी कि जब व्यवस्था को चलाने पर इतना बड़ा खर्च हो रहा है, तब उसके बदले परिणाम क्या मिल रहे हैं? बिहार में वर्षों तक बैठकों, प्रस्तुतियों, समीक्षाओं और फाइलों की कमी नहीं रही। कमी रही तो परिणामों की। उद्योग लगाने के इच्छुक निवेशकों को कई स्तरों की स्वीकृतियों, विभागीय समन्वय की समस्याओं और निर्णय लेने में देरी का सामना करना पड़ा। कई औद्योगिक क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रहीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बिहार की नौकरशाही ने उद्योगों को उसी गंभीरता से लिया, जिस गंभीरता से उसने निर्माण परियोजनाओं को लिया?
हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जिस तरह आधारभूत संरचना को उद्योग, निवेश और सैटेलाइट टाउनशिप के साथ जोड़ने की कोशिश शुरू की है, वह पिछली सोच से अलग दिखाई देती है। पहली बार विकास की चर्चा केवल सड़क और पुल तक सीमित नहीं रखी जा रही, बल्कि आर्थिक गतिविधियों और रोजगार सृजन से जोड़ी जा रही है। गया इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग सिटी जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने, नए औद्योगिक क्षेत्रों के विकास और निवेश आकर्षित करने की कोशिशें इस दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं। सफलता का फैसला घोषणाओं से नहीं बल्कि परिणामों से होगा। बिहार की जनता अब शिलान्यास नहीं, उत्पादन देखना चाहती है। वह भूमि आवंटन नहीं, रोजगार देखना चाहती है। वह निवेश प्रस्ताव नहीं, चालू कारखाने देखना चाहती है। यदि सम्राट चौधरी बियाडा की कार्यप्रणाली में सुधार लाने, नौकरशाही को परिणाम आधारित जवाबदेही के दायरे में लाने और औद्योगिक परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कराने में सफल होते हैं, तो बिहार वास्तव में पिछलग्गू राज्य की छवि से बाहर निकल सकता है।
अन्यथा इतिहास एक कठिन सवाल जरूर पूछेगा। आखिर जब राज्य का बजट 3.47 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जब आधारभूत संरचना पर रिकॉर्ड खर्च हुआ, जब सड़कें, पुल, बिजली और औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए, तब बिहार के युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर क्यों जाना पड़ा? यह सवाल केवल किसी सरकार से नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से पूछा जाएगा जिसने विकास के दावे तो किए, लेकिन उन्हें उद्योग और रोजगार में बदलने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।बिहार अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सड़कों का दौर काफी हद तक पूरा हो चुका है। अब लड़ाई कारखानों, निवेश और रोजगार की है। यदि यह लड़ाई जीती गई तो बिहार की पहचान बदल जाएगी। लेकिन यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया तो हजारों करोड़ रुपये की आधारभूत संरचना केवल आंकड़ों की उपलब्धि बनकर रह जाएगी। और तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा—क्या बिहार ने सड़कें तो बना लीं, लेकिन उन सड़कों पर चलने वाली अर्थव्यवस्था खड़ी करने में देर कर दी?

