पत्रकारिता करो तो आप जाति, धर्म, सरकार विरोधी, और आतंकवादी। सरकार कहे आपको समस्या क्या है? आप मोदी विरोधी हो ! लगता है बहुत जान बाकी है कलम में!

भारतीय लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। लेकिन आजकल अगर कोई पत्रकार सवाल पूछता है, सरकार की नीतियों पर आलोचना करता है, तथ्य सामने रखता है, तो तुरंत लेबल लग जाता है “जातिवादी”, “धर्म विरोधी”, “सरकार विरोधी”, “देशद्रोही”, “आतंकवादी” और सबसे आम “मोदी विरोधी”। सत्ता पक्ष से बस एक ही सवाल आता है “आपको समस्या क्या है?” ऐसा लगता है कलम अभी भी जिंदा है, लेकिन उसे कुचलने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

आजादी के बाद से भारतीय पत्रकारिता ने कई उतार-चढ़ाव देखे। आपातकाल में जब प्रेस पर सेंसरशिप लगी, पत्रकार जेल गए, तब भी कुछ कलमों ने सत्य लिखा। 1990 के दशक में उदारीकरण के बाद मीडिया का विस्तार हुआ। लेकिन 2014 के बाद से यह बहस और तेज हो गई है कि क्या स्वतंत्र पत्रकारिता अब संभव है? सरकार कहती है हम विकास कर रहे हैं, गरीबी घट रही है, इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, आतंकवाद पर लगाम लगी है। लेकिन जब कोई पत्रकार महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय, छात्रों की निराशा, धार्मिक ध्रुवीकरण या संस्थागत स्वायत्तता पर सवाल उठाता है तो जवाब मिलता है “तुम्हें देश की प्रगति नहीं दिख रही?” या “तुम पाकिस्तान की तरफदारी कर रहे हो।”

आज की सबसे बड़ी समस्या “लेबलिंग” है। कोई भी रिपोर्ट अगर सरकार की छवि पर सवाल उठाती है, तो मुझे “मोदी विरोधी” घोषित कर दिया जाता है। मानो मोदी जी की आलोचना करना राष्ट्र की आलोचना है। विपक्षी राज्यों में जब केंद्र की नीतियों की आलोचना होती है तो उसे “राजनीतिक साजिश” कहा जाता है। कुछ पत्रकारों और मीडिया हाउस पर ED, CBI, Income Tax के छापे पड़े। कुछ चैनल बंद हुए, कुछ वेबसाइट्स ब्लॉक हुईं। IT Rules 2021 ने सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज पर सरकार को ज्यादा नियंत्रण दिया। “फेक न्यूज” के नाम पर सवाल उठाने वाले आवाजों को दबाने का हथियार बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ, कुछ पत्रकार स्वयं सत्ता के करीब बैठकर “Godi Media” बन गए। वे सरकार की हर नीति की तारीफ में लगे रहते हैं। असली पत्रकारिता जो सवाल पूछती है, उसे “विपक्षी प्रोपगैंडा” बताया जाता है। जाति और धर्म का मुद्दा सबसे संवेदनशील है। अगर कोई पत्रकार दलित-आदिवासी मुद्दों, लिंचिंग की घटनाओं, या अल्पसंख्यक समुदाय की शिकायतों पर रिपोर्ट करता है तो उसे “धर्म विरोधी” और “जातिवादी” कह दिया जाता है। वहीं, अगर हिंदू परंपराओं या बहुसंख्यक भावनाओं पर कोई टिप्पणी होती है तो “हिंदूफोबिया” का आरोप लगता है। दोनों तरफ से हमला होता है। सोशल मीडिया ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। एक रिपोर्ट आते ही ट्रोल आर्मी सक्रिय हो जाती है। “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “अर्बन नक्सल”, “खालिस्तानी”, “ISIS सपोर्टर” जैसे टर्म्स आम हो गए हैं। पत्रकारों को धमकियां मिलती हैं, उनके परिवारों को टारगेट किया जाता है। कई महिला पत्रकारों के साथ अभद्रता चरम पर है।

“समस्या क्या है?”सरकार बार-बार पूछती है “आपको समस्या क्या है?” विकास के आंकड़े दिखाती है हाईवे, एयरपोर्ट, डिजिटल इंडिया, जीएसटी, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत आदि। लेकिन पत्रकार का काम आंकड़ों से परे जाकर हकीकत देखाना है । बेरोजगारी, CMIE जैसे स्वतंत्र आंकड़े बताते हैं कि युवा बेरोजगारी चिंताजनक स्तर पर है। महंगाई, आम आदमी रसोई का बजट कैसे चलाए, यह सवाल पूछना “सरकार विरोध” कैसे हो गया? किसान, MSP, कर्जमाफी, फसल बीमा, इन पर सवाल उठाना “किसान विरोधी” क्यों? संस्थाएं, RBI, CBI, ED, चुनाव आयोग, मीडिया काउंसिल, इनकी स्वायत्तता पर बहस को “संस्थागत हमला” क्यों कहा जाता है?

राहुल गांधी की “मोदी सरकार” आलोचना पर “देशद्रोही” कहना, अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी की आलोचना पर चुप रहना यह दोहरा मापदंड है। हर सरकार यही करती आई है। इंदिरा गांधी के समय, वाजपेयी सरकार में, मनमोहन सिंह के समय भी आलोचकों को दबाने की कोशिश हुई। लेकिन आज सोशल मीडिया और डिजिटल युग में यह और प्रभावी हो गया है। कुछ उदाहरण ,कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद स्थिति पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर दबाव। दिल्ली दंगे, किसान आंदोलन, कोविड प्रबंधन, मणिपुर हिंसा, इन मुद्दों पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वालों को “एजेंडा” चलाने का आरोप। कुछ पत्रकार जेल गए , सिद्दीक कप्पन, मोहम्मद जुबैर, प्रवीण स्वामी जैसे नाम चर्चा में रहे। कुछ ने देश छोड़ दिया। कई ने आत्म-सेंसरशिप अपना ली, “बच के रहो, नौकरी चली जाएगी।”

आज पत्रकारिता की चुनौतियां आर्थिक दबाव, मीडिया हाउस बड़े-बड़े कॉर्पोरेट के अधीन हैं। विज्ञापन सरकार और कारोबारियों पर निर्भर। आलोचना करने पर विज्ञापन बंद हो जाते हैं। भौतिक खतरा, कई पत्रकारों की हत्या हुई ,गौरी लंकेश, रवीश कुमार पर हमले की कोशिश, आखलाक और अन्य मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले। पोलराइजेशन, मीडिया भी दो खेमों में बंट गया ,प्रो-गवर्नमेंट और एंटी-गवर्नमेंट। निष्पक्षता का अभाव। डिजिटल सेंसरशिप, फैक्ट चेक यूनिट, ब्लॉकिंग ऑर्डर, एल्गोरिदम कंट्रोल।ट्रोल्स और फेक न्यूज, सच्ची खबर को भी फेक बताकर उड़ाया जाता है।

    फिर भी कुछ पत्रकार, यूट्यूब चैनल, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट और छोटे पोर्टल सत्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। The Wire, The Print, Scroll, Alt News, Article 14,Media Mart India जैसे प्लेटफॉर्म सवाल पूछ रहे हैं। मुख्यधारा के कुछ पत्रकार रवीश कुमार, निखिल कुमार, पूनम पांडे,उमाशंकर सिंह आदि अपनी राह पर डटे हैं। कलम में जान बाकी हैलगता है बहुत जान बाकी है कलम में। क्योंकि सत्य को दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। रामनाथ गोयनका, अरुण शौरी, कुलदीप नायर, बीजी वर्गीज जैसे पत्रकारों की परंपरा अभी खत्म नहीं हुई। पत्रकारिता का धर्म सत्ता को आईना दिखाना है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र टिकता है जब प्रेस स्वतंत्र हो। संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह सीमित होती जा रही है। पत्रकारों को और अधिक तथ्य-आधारित, संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। मीडिया हाउसों को स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए। सरकार को आलोचना को “विरोध” न मानकर सुधार का अवसर मानना चाहिए। जनता को विविध स्रोतों से जानकारी लेनी चाहिए, न कि एकतरफा प्रचार पर भरोसा करना चाहिए।

    पत्रकारिता करो तो आप जाति, धर्म, सरकार विरोधी और आतंकवादी , यह मानसिकता लोकतंत्र के लिए खतरा है। “आप मोदी विरोधी हो” कहकर हर सवाल को खारिज करना सही नहीं। मोदी सरकार ने कई अच्छे काम किए हैं डिजिटलाइजेशन, आयुष्मान, उज्ज्वला, आतंकवाद पर सख्ती। लेकिन आलोचना का स्थान भी होना चाहिए। कोई सरकार अपरfect नहीं होती। कलम में जान बाकी है। जब तक सवाल पूछने वाले बाकी हैं, लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। दबाव झेलते हुए भी कुछ पत्रकार सत्य लिख रहे हैं। इतिहास इन्हीं सच्चे कलमों को याद रखता है, न कि चापलूसों को। समस्या सरकार की नहीं, बल्कि “आलोचना = विरोध” वाली सोच की है। जब तक यह बदल नहीं जाती, बहस जारी रहेगी। पत्रकारिता मर नहीं सकती, क्योंकि सत्य कभी नहीं मरता।

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