शिक्षा और जाति का संबंध, परंपरा, वर्तमान परिवेश और भारतीय संस्कृति का परिप्रेक्ष्य

“सा सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात् विद्या वही है जो मुक्त करे (अज्ञान, संकीर्णता और बंधनों से)-डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा,मध्य प्रदेश

“शिक्षा और जाति का संबंध” एक ऐसा विषय है जिस पर जब भी चर्चा होती है, तो इतिहास की परतें, वर्तमान की विसंगतियां और भविष्य की उम्मीदें एक साथ सामने आ जाती हैं। यह सवाल अपने आप में गहरा विरोधाभास समेटे हुए है,एक तरफ़ शिक्षा को समाज को जोड़ने और ऊंच-नीच के भेदों को मिटाने का सबसे शक्तिशाली साधन माना जाता है, तो दूसरी तरफ़ इतिहास गवाह है कि कैसे एक लंबी अवधि तक शिक्षा और ज्ञान पर कुछ चुनिंदा वर्गों का एकाधिकार रहा है। आइए, इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर भारतीय संस्कृति की मूल भावना, वर्तमान परिवेश और कुछ खास बिंदुओं के आलोक में एक विशद विश्लेषण करते हैं।

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि,,, ज्ञान पर एकाधिकार और सामाजिक विभाजन-

प्राचीन काल के उत्तराधिकार और मध्यकाल तक आते-आते भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे एक कठोर जन्म-आधारित जाति व्यवस्था में तब्दील हो गई। ज्ञान का संप्रेषण और सीमाएं,, इस व्यवस्था में शिक्षा (विशेषकर वेदों, शास्त्रों और उच्च दर्शन का अध्ययन) मुख्य रूप से उच्च समझे जाने वाले वर्गों तक सीमित कर दी गई। श्रम का अवमूल्यन,,जो वर्ग कृषि, हस्तशिल्प, चर्मकला या अन्य शारीरिक श्रम से जुड़े थे, उन्हें औपचारिक और उच्च शिक्षा के अवसरों से वंचित कर दिया गया। श्रम करने वाले को हीन और ज्ञान अर्जित करने वाले को श्रेष्ठ मानने की इस विकृत मानसिकता ने समाज में गहरी खाई पैदा कर दी।

भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप,, क्या वास्तव में जाति आधारित थी विद्या?

यदि हम वर्तमान रूढ़ियों से ऊपर उठकर अपनी मूल सनातन और भारतीय संस्कृति (ऋग्वैदिक काल और उपनिषद काल) की गहराइयों में जाएं, तो एक बिल्कुल अलग और उदार चित्र उभरता है। गुण और कर्म की प्रधानता श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं। समाज की व्यवस्था जन्म से नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुण, स्वभाव और कर्म के आधार पर तय हुई थी, न कि माता-पिता के कुल के आधार पर। विद्वानों के प्रेरणादायक उदाहरण, महर्षि वेद व्यास, जिन्होंने वेदों का संकलन किया और महाभारत की रचना की, उनका जन्म एक मछुआरे परिवार में हुआ था। महर्षि वाल्मीकि, जिन्होंने रामायण रची, वे अपनी प्रारंभिक पृष्ठभूमि से ऋषि नहीं थे। महर्षि नारद और ऋषि सतयुग से लेकर वेदों की ऋचाएं रचने वाले कई ऐसे ऋषि रहे हैं जिनकी कुल-जाति आज के अर्थों में गौण थी, लेकिन उनके ज्ञान और ब्रह्मतेज के आगे पूरा समाज नतमस्तक था।

 संस्कृति का संदेश,,भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र “वसुधैव कुटुंबकम्”(संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है) और “आत्मवत सर्वभूतेषु”(सबको अपने समान देखना) है। यह संस्कृति कभी भी किसी मनुष्य को उसकी जाति के आधार पर ज्ञान के अधिकार से वंचित करने का समर्थन नहीं करती, यह तो अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की बात करती है।

आधुनिक भारत और संविधान, शिक्षा, समता और सामाजिक न्याय

आधुनिक भारत में बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस संबंध को सबसे गहराई से समझा और रेखांकित किया। उनका यह ऐतिहासिक कथन आज भी गूंजता है। “शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो जो पिएगा, वह दहाड़ेगा।” संविधान निर्माताओं ने यह भली-भांति समझा कि जब तक समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों तक शिक्षा नहीं पहुंचेगी, तब तक समानता और लोकतंत्र की कल्पना बेमानी है। संवैधानिक प्रावधान, भारतीय संविधान के अनुच्छेदों  ने शिक्षा को हर नागरिक का मौलिक अधिकार बनाया, जिससे जाति, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव की दीवारें ढहने लगीं। आरक्षण और प्रोत्साहन,शिक्षा के क्षेत्र में दी गई विशेष व्यवस्थाओं और छात्रवृत्तियों ने हाशिए के समाज के युवाओं को मुख्यधारा में आने का अभूतपूर्व अवसर दिया।

वर्तमान परिवेश और सोच,बदलाव और नई चुनौतियां

आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में शिक्षा और जाति के संबंध का परिदृश्य बदला है, लेकिन पूरी तरह से यह धब्बा मिटा नहीं है। सकारात्मक बदलाव, आज गांवों और कस्बों की गलियों से निकलकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षक वे युवा बन रहे हैं जिनमें  से कई के माता-पिता ने कभी ककहरा भी नहीं पढ़ा था। डिग्रियां और योग्यता अब किसी एक जाति की बपौती नहीं रहीं। मानसिकता के स्तर पर अंतर्विरोध,विडंबना यह है कि आधुनिक डिग्रियां हासिल करने के बावजूद आज भी हमारे अवचेतन मन में जाति गहरे रूप से बैठी हुई है। वैवाहिक विज्ञापनों में ‘जाति’ की खोज, शिक्षण संस्थानों या कार्यस्थलों पर होने वाले सूक्ष्म भेदभाव और राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए जातिगत अस्मिताओं का दोहन यह बताता है कि साक्षरता तो बढ़ी है, लेकिन उस स्तर की ‘संवेदनशीलता’ और ‘बोध’ अभी भी अधूरा है।

कमर्शियल शिक्षा बनाम समता,,वर्तमान समय में महंगी होती उच्च शिक्षा (कोचिंग कल्चर, प्राइवेट यूनिवर्सिटीज) के कारण एक नया विभाजन पैदा हो रहा है,जहां जाति के साथ-साथ आर्थिक वर्ग भी एक बड़ा कारक बन गया है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कई वंचितों को उच्च शिक्षा से दूर कर रहा है। ज्ञान ही बंधन को तोड़ेगा, शिक्षा और जाति का संबंध इस बात पर निर्भर करता है कि हम शिक्षा को किस रूप में परिभाषित करते हैं। यदि शिक्षा केवल नौकरी पाने का एक साधन या डिग्री हासिल करने का माध्यम है, तो यह समाज में केवल अहंकार और नई जातियों (जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग बनाम अनपढ़ वर्ग) को जन्म देगी। लेकिन यदि शिक्षा का अर्थ संवेदनशीलता, विवेक, समानता और मानवता को समझना है, तो यह उस हर दीवार को गिरा देगी जो इंसान को इंसान से अलग करती है। हमारी भारतीय संस्कृति का वास्तविक संदेश यही सिखाता है कि हर मनुष्य के भीतर एक ही चेतना का वास है। जिस दिन हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में केवल तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ मूल्यों और समतावादी दृष्टिकोण का समावेश पूरी तरह हो जाएगा, उस दिन ‘शिक्षा और जाति’ का यह विषैला समीकरण हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा और हर व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके कर्म और चरित्र से होगी।

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