‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ या ‘ईज ऑफ क्लोजिंग बिजनेस’,सदन को अधूरी तस्वीर दिखा रही हैं निर्मला सीतारामन!

रितेश सिन्हा

राज्यसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने कहा कि मोदी सरकार ने भारत में कारोबार करना पहले से कहीं आसान बना दिया है। उनके अनुसार नियमों को सरल किया गया है, निवेशकों के लिए बेहतर माहौल तैयार हुआ है, स्टार्टअप को बढ़ावा मिला है, पेटेंट प्रक्रिया तेज हुई है और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना ने विनिर्माण क्षेत्र को नई ताकत दी है।

उन्होंने यह भी कहा कि इन प्रयासों से भारत में कारोबार करना, निवेश करना और नवाचार करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। सवाल यह है कि क्या संसद के सामने पूरी तस्वीर रखी गई? या फिर केवल उपलब्धियों का एक पक्ष बताया गया? सरकार के अपने ही आंकड़े कई ऐसे सवाल खड़े करते हैं, जिनका जवाब अभी तक नहीं मिला है। सरकार के अनुसार जून 2026 तक देश में 2.30 लाख से अधिक डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप हैं। इनसे 23.36 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का दावा किया गया है। सरकार यह भी कहती है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और लगभग आधे स्टार्टअप टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं। पहली नजर में यह तस्वीर बेहद उत्साहजनक लगती है।

सरकार ने राज्यसभा में यह नहीं बताया कि 31 जनवरी 2026 तक 6,789 डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप बंद हो चुके हैं। यह कोई विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि लोकसभा में केंद्र सरकार द्वारा दिया गया आधिकारिक जवाब है। सबसे ज्यादा 875 आईटी सेवा, 553 स्वास्थ्य एवं जीवन विज्ञान, 491 शिक्षा, 320 खाद्य एवं पेय और 301 कृषि क्षेत्र के स्टार्टअप बंद हुए हैं। सवाल उठता है कि यदि भारत में कारोबार करना पहले से इतना आसान हो गया है, तो फिर हजारों स्टार्टअप अपने दरवाजे बंद करने को क्यों मजबूर हुए?

सरकार नए स्टार्टअप की संख्या बताती है, लेकिन बंद हुए स्टार्टअप की चर्चा नहीं करती। किसी भी देश की आर्थिक सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि कितनी कंपनियां शुरू हुईं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि कितनी कंपनियां टिक सकीं। यदि हजारों स्टार्टअप कुछ ही वर्षों में बंद हो गए, तो यह केवल बाजार की समस्या नहीं है, बल्कि नीतियों और कारोबारी माहौल पर भी सवाल खड़ा करता है।

सरकार का कहना है कि स्टार्टअप को हर संभव सहायता दी जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स के माध्यम से 25,859 करोड़ रुपये का निवेश स्वीकृत किया गया। स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना के तहत लगभग 592 करोड़ रुपये मंजूर किए गए और क्रेडिट गारंटी योजना के तहत 925 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण को गारंटी दी गई। यदि सरकार ने इतनी बड़ी वित्तीय सहायता दी, तो फिर 6,789 स्टार्टअप बंद क्यों हो गए? क्या केवल योजनाएं बना देना ही पर्याप्त है या उनकी सफलता का भी मूल्यांकन होना चाहिए? बीते कुछ वर्षों में देश के कई चर्चित स्टार्टअप संकट में आए। बायजूज़, डंजो, गोमैकेनिक, फार्मईज़ी, शेयरचैट और कू जैसी कंपनियां आर्थिक मुश्किलों से जूझती रहीं। हजारों कर्मचारियों की नौकरियां चली गईं। कई कंपनियों का मूल्यांकन तेजी से गिरा। यदि माहौल इतना अनुकूल है, तो ऐसी स्थिति क्यों बनी? क्या सरकार इस पर कोई श्वेतपत्र जारी करेगी?

सरकार 120 से अधिक यूनिकॉर्न होने का दावा करती है। लेकिन यह नहीं बताती कि कई यूनिकॉर्न का मूल्यांकन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से घटा है। निवेशकों ने अपने निवेश का पुनर्मूल्यांकन किया, विस्तार योजनाएं रुकीं और छंटनी का दौर चला। केवल यूनिकॉर्न बनने का रिकॉर्ड गिनाना पर्याप्त नहीं है, उनकी वर्तमान आर्थिक स्थिति भी देश के सामने रखनी चाहिए। वित्त मंत्री कहती हैं कि निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाया गया है। देश के 6.3 करोड़ एमएसएमई 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं, आज भी समय पर भुगतान, बैंक ऋण, कार्यशील पूंजी और बढ़ते अनुपालन बोझ जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। यदि कारोबार इतना आसान हो गया है तो छोटे उद्योगों की शिकायतें लगातार क्यों बढ़ रही हैं?

सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की बात करती है। लेकिन जिस विश्व बैंक की रैंकिंग का वर्षों तक प्रचार किया गया, उसे 2021 में ही समाप्त कर दिया गया। ऐसे में सरकार किस स्वतंत्र वैश्विक मानक के आधार पर यह दावा कर रही है कि भारत में कारोबार करना पहले से आसान हो गया है? संसद को इसका स्पष्ट उत्तर मिलना चाहिए। सरकार पीएलआई योजना को अपनी सबसे बड़ी आर्थिक सफलता बताती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक पीएलआई योजनाओं के तहत 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश, 22.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का उत्पादन और 14.15 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का दावा किया गया है। लेकिन यह भी बताया जाना चाहिए कि इनमें स्थायी रोजगार कितने हैं, कितनी कंपनियां अपने लक्ष्य तक पहुंचीं और इस योजना का लाभ छोटे एवं मझोले उद्योगों को कितना मिला।

किसानों की आय बढ़ाने का दावा भी सरकार बार-बार करती है। लेकिन यदि किसानों की स्थिति इतनी बेहतर हुई है, तो एमएसपी, लागत, कर्ज, फसल बीमा और मुआवजे को लेकर आंदोलन आज भी क्यों हो रहे हैं? यदि हर क्षेत्र में सरकार के दावे सही हैं, तो असंतोष खत्म क्यों नहीं हुआ? लोकतंत्र में संसद सरकार के प्रचार का मंच नहीं, बल्कि जवाबदेही का मंच है। सरकार को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि 2.30 लाख स्टार्टअप शुरू हुए, बल्कि यह भी बताना चाहिए कि 6,789 स्टार्टअप क्यों बंद हुए, उनमें कितने लोगों की नौकरियां गईं, कितने उद्यमियों ने अपनी पूंजी गंवाई और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या नीति बनाई गई है।

देश का युवा, उद्योग जगत और निवेशक केवल सरकारी दावे नहीं, पूरी सच्चाई जानना चाहता है। उपलब्धियां बताना सरकार का अधिकार है, लेकिन विफलताओं को छिपाना नहीं। यदि सरकार 23.36 लाख रोजगार बनने का दावा करती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि स्टार्टअप बंद होने से कितने रोजगार खत्म हुए। यदि सरकार भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बताती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि हजारों उद्यमियों के सपने क्यों टूटे।

जब तक इन सवालों का स्पष्ट और तथ्यात्मक उत्तर नहीं दिया जाता, तब तक यह प्रश्न उठता रहेगा कि क्या भारत वास्तव में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या फिर हजारों युवाओं और उद्यमियों के लिए यह धीरे-धीरे ‘ईज ऑफ क्लोजिंग बिजनेस’ बनता जा रहा है।

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