“डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

रात के दो बज रहे थे, लेकिन मंजूर साहब की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उनके सामने कॉपी का एक पन्ना खुला था, जिस पर पेंसिल से लिखी गई रकम (गिनती) बार-बार मिटाई और दोबारा लिखी जा रही थी। अगले महीने उनकी बड़ी बेटी, मरियम की शादी थी। घर में खुशी का माहौल होना चाहिए था, लेकिन मंजूर साहब के लिए यह खुशी एक ऐसे बोझ की तरह थी जो उनकी बूढ़ी हड्डियों को तोड़ रहा था। “कितना हिसाब बना?” मंजूर साहब की पत्नी, तस्नीम ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा। मंजूर साहब ने एक गहरी साँस भरी, चश्मा उतारा और काँपती आवाज़ में बोले, “तस्नीम… बीस लाख का दहेज माँगा है उन्होंने। कहते हैं लड़का सिविल इंजीनियर है, हमारी नाक का सवाल है। फिर छह लाख रुपये का बारात का खाना, लड़के के लिए महँगी घड़ी, सोने की अंगूठी… यही नहीं, मकलावे (शादी के बाद पहली विदाई) के दिन का खाना, वलीमे (रिसेप्शन) वाले दिन का नाश्ता, और तो और लड़की को रुख़सत (विदा) करते वक्त ससुराल वालों के तमाम छोटे-बड़े रिश्तेदारों के लिए सूट और उपहार!” तस्नीम ने घबराकर कहा, “और वह जो बारात वापस जाते हुए साथ खाना पैक करके भेजने की शर्त है?”

“हाँ… वह भी!” मंजूर साहब का गला सूख गया। “बेटियों को कोई मुफ़्त में नहीं ले जाता तस्नीम! यहाँ तो ऐसा लगता है जैसे बेटी पैदा होना ही कोई जुर्म था, जिसकी सजा बाप पूरी ज़िंदगी भुगतता है।” मरियम, जो दरवाजे के पीछे खड़ी यह बातें सुन रही थी, उसके दिल पर जैसे तीर-सा लग गया। वही मरियम जिसने अपनी मेहनत और क़ाबिलियत से यूनिवर्सिटी में टॉप किया था, आज महज़ एक “लड़की” होने के नाते अपने बाप की कर्ज़दार और मजबूर नज़र आ रही थी। उसके ज़हन में तस्वीर का वही सवाल गूँजने लगा जो अभी उसने एक तस्वीर देखी थी,,”बेटी है या सज़ा?”
अगली सुबह, मंजूर साहब ने अपना आख़िरी सहारा यानी वह छोटा-सा मकान गिरवी रखने का फ़ैसला कर लिया। जब वह कागज़ात पर दस्तख़त करने लगे, तो मरियम उनके सामने आकर खड़ी हो गई। “अब्बू! रुक जाइए।” मरियम की आवाज़ में एक अजीब-सा दृढ़ संकल्प था। “बेटा, तुम बीच में मत बोलो, यह बड़ों के मामले हैं।” मंजूर साहब ने प्यार से समझाना चाहा। “नहीं अब्बू! यह मेरा मामला है,” मरियम ने बाप के बूढ़े और काँपते हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा। “अगर मेरी शादी के लिए आपको अपनी इज़्ज़त-ए-नफ़्स (स्वाभिमान), अपना घर और अपनी उम्र भर की जमा-पूँजी दाँव पर लगानी पड़े, तो मुझे ऐसी शादी नहीं चाहिए। अगर एक बेटी को विदा करने की क़ीमत इतनी संगीन है,
तो यह रस्म नहीं बल्कि एक सज़ा है जो हमारा समाज एक बाप को देता है।” मरियम ने उसी वक्त इस रिश्ते को ठुकरा दिया। शुरुआत में समाज और रिश्तेदारों ने तरह-तरह की बातें बनाईं, लेकिन मंजूर साहब का सिर फ़ख्र (गर्व) से ऊँचा हो गया। कुछ समय बाद मरियम ने अपनी क़ाबिलियत के बल पर एक प्रतिष्ठित संस्थान में अच्छे पद पर नौकरी हासिल की और एक ऐसे सुशिक्षित और सभ्य इंसान से उसका रिश्ता तय हुआ, जिसके घर वालों ने दहेज, फ़िज़ूल की रस्मों और दिखावे को सख्त नापसंद किया। मंजूर साहब ने उस दिन सुकून की साँस ली और मुस्कुराकर बोले,
“बेटी सज़ा नहीं… बेटी तो रहमत (ईश्वर की कृपा) है, सज़ा तो वह नादान समाज है जो इस रहमत को बोझ बना देता है।”




