दिमागी नक्सल, वाद विवाद , जरूरत थी या नहीं ?, देश क्या चाहता है ?

‘दिमागी नक्सल’ शब्द का आना यह साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई और उग्र होने वाली है। जहां सरकार इसे ‘सुरक्षा और राष्ट्रवाद’ के चश्मे से देख रही है, वहीं विपक्ष और आलोचक इसे ‘लोकतंत्र और असहमति की आवाज’ पर हमला मान रहे हैं। बहरहाल, 80वें स्वतंत्रता दिवस का यह भाषण आने वाले समय में देश के राजनीतिक विमर्श की दिशा तय करने वाला साबित हो रहा है। ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर चल रहा वाद-विवाद भारत के जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इस बहस में राष्ट्र की सुरक्षा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है।


समकालीन भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में ‘दिमागी नक्सल’ या ‘अर्बन न नक्सल’ एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिसने देश के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और आम जनता को दो धड़ों में बाँट दिया है। एक तरफ जहाँ सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक अदृश्य लेकिन सबसे बड़ा खतरा है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आलोचकों का कहना है कि यह शब्द केवल असहमति की आवाजों को दबाने का एक राजनीतिक हथियार है। इस विषय पर देश के भीतर चल रहा वाद-विवाद अब केवल बंद कमरों या टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम नागरिकों के बीच भी एक बड़ा सवाल बन चुका है: क्या इस अवधारणा और इसके खिलाफ कार्रवाई की सच में जरूरत थी, और आखिरकार इस मुद्दे पर देश का आम नागरिक क्या चाहता है?

‘दिमागी नक्सल’ शब्द का सीधा संबंध उन लोगों से जोड़ा जाता है जो शहरों में रहकर, समाज के पढ़े-लिखे वर्ग का हिस्सा बनकर, कथित तौर पर जंगलों में सक्रिय सशस्त्र माओवादियों के एजेंडे को वैचारिक और रसद सहायता पहुँचाते हैं। इस मुद्दे पर दो स्पष्ट और विरोधी विचारधाराएँ आमने-सामने हैं। सरकार का तर्क है कि जंगलों में बंदूकों के बल पर लड़ने वाले नक्सली उतने खतरनाक नहीं हैं, जितने शहरों में बैठकर विश्वविद्यालयों, मीडिया, और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से युवाओं के दिमाग में देश विरोधी जहर घोलने वाले लोग हैं। इन्हें ‘वैचारिक माओवादी’ कहा जाता है, जो देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और हिंसा को सही ठहराने का काम करते हैं। इसके विपरीत, आलोचकों का आरोप है कि ‘अर्बन न नक्सल’ जैसी कोई संगठित अवधारणा है ही नहीं।

यह केवल एक ऐसा लेबल है जिसका उपयोग सरकार की नीतियों, आदिवासियों के विस्थापन और कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ आवाज उठाने वाले वकीलों, पत्रकारों, प्रोफेसरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को डराने और उन्हें जेल में डालने के लिए किया जाता है। उनके अनुसार, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) पर सीधा हमला है। इस सवाल पर कि क्या इस शब्द को गढ़ने और इसके खिलाफ कड़े कानून (जैसे UAPA) के तहत कार्रवाई करने की जरूरत थी या नहीं, देश की राय बंटी हुई है। समर्थकों का मानना है कि भीमा कोरेगांव मामले (2018) और उसके बाद सामने आए कई दस्तावेजों ने यह साबित किया कि शहरी नेटवर्क जंगलों में बैठे कमांडरों के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता है। फंडिंग और रसद, शहरों में बैठे लोग माओवादियों के लिए विदेशी और घरेलू फंडिंग का इंतजाम करते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगैंडा, भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार विरोधी दिखाना और नक्सलियों को ‘क्रांतिकारी’ के रूप में पेश करना इनका मुख्य काम होता है। युवाओं का ब्रेनवॉश, प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में देश की न्यायपालिका, सेना और सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक विमर्श तैयार करना, जिससे युवाओं को व्यवस्था के खिलाफ भड़काया जा सके। इसलिए, राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए इस अदृश्य नेटवर्क को तोड़ना बेहद जरूरी था।

दूसरी ओर, विरोधियों का तर्क है कि असहमति (Dissent) लोकतंत्र की सुरक्षा का वाल्व है। यूएपीए (UAPA) जैसे कड़े कानूनों के तहत बिना जमानत के सालों तक बुद्धिजीवियों को बंद रखना मानवीय गरिमा के खिलाफ है। कई मामलों में अदालतें सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी कर चुकी हैं, जिससे यह साफ होता है कि केवल धारणा के आधार पर गिरफ्तारियां की गईं। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की बात करने वालों को नक्सलवादी बता देने से मूल समस्या (गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण) का समाधान नहीं होता, बल्कि वह और दब जाती है। इस पूरे वैचारिक घमासान के बीच भारत का आम नागरिक, जो न तो किसी कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़ा है और न ही वामपंथी उग्रवाद का समर्थक है, क्या सोचता है? देश का जनमानस इस मुद्दे पर एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण चाहता है। भारत का आम नागरिक किसी भी कीमत पर हिंसा का समर्थन नहीं करता। देश की जनता चाहती है कि राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि रहे। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह जंगल में हो या शहर के आलीशान केबिन में, अगर वह भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकने या सुरक्षा बलों की हत्या की साजिश रचता है, तो उसे कानून के तहत सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। जनता यह भी चाहती है कि देश में लोकतंत्र की आत्मा जिंदा रहे।

सरकार की नीतियों की आलोचना करने का मतलब देशद्रोह नहीं होना चाहिए। एक आम नागरिक चाहता है कि यदि कोई पत्रकार भ्रष्टाचार को उजागर करता है, या कोई वकील किसी गरीब की लड़ाई लड़ता है, तो उसे ‘दिमागी नक्सल’ का टैग देकर प्रताड़ित न किया जाए। देश की असली चाहत यह है कि नक्सलवाद की जड़ पर प्रहार किया जाए। नक्सलवाद वहीं पनपता है जहाँ विकास की किरण नहीं पहुँचती। देश चाहता है कि सरकारें आदिवासी क्षेत्रों में सड़कें, अस्पताल, स्कूल और रोजगार के साधन पहुँचाएँ ताकि बाहरी ताकतें उनकी लाचारी का फायदा न उठा सकें। जब विकास और न्याय जमीनी स्तर पर दिखेगा, तो वैचारिक उग्रवाद का आधार अपने आप खत्म हो जाएगा। ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर चल रहा वाद-विवाद भारत के जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इस बहस में राष्ट्र की सुरक्षा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। देश न तो आतंकवाद या उग्रवाद को बर्दाश्त करना चाहता है और न ही एक ऐसी व्यवस्था जहाँ सवाल पूछने की आजादी को ही अपराध मान लिया जाए। समय की मांग है कि कानून का इस्तेमाल बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के, पूरी पारदर्शिता के साथ देश की रक्षा के लिए हो, ताकि सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों का सह-अस्तित्व बना रहे।

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