नया अफवाह ,भ्रम का जाल,हालिया विवाद,IT सेल , सरकार, काँग्रेस , राहुल गांधी

राहुल गांधी को लेकर छिड़ी यह डिजिटल जंग यह साफ दर्शाती है कि आगामी विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीति के लिए नैरेटिव (विमर्श) सेट करने की होड़ मची हुई है। बीजेपी जहां राहुल गांधी को एक ‘भ्रमित और सनातन-विरोधी’ नेता के रूप में स्थापित करने पर आमादा है, वहीं राहुल गांधी और कांग्रेस इस चक्रव्यूह को तोड़कर खुद को देश की आम जनता, किसानों और युवाओं की असली आवाज के रूप में पेश करने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लेकर सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में एक बार फिर बड़ा वैचारिक और राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आईटी सेल पर आरोप लग रहे हैं कि उसने हाल के दिनों में राहुल गांधी के बयानों, उनकी तस्वीरों और उनके विदेशी दौरों को लेकर एक सुनियोजित ‘भ्रम जाल’ या दुष्प्रचार अभियान (Misinformation Campaign) चलाया है। कांग्रेस पार्टी ने इसे राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाई बीजेपी की एक हताश कोशिश करार दिया है। वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी आईटी सेल का तर्क है कि वे केवल राहुल गांधी के बयानों में छिपे विरोधाभासों और उनकी देश-विरोधी नीतियों को जनता के सामने बेनकाब कर रहे हैं। यह पूरा मामला तब और गरमा गया जब संसद सत्र के दौरान और उसके ठीक बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स एक्स (Twitter), फेसबुक और व्हाट्सएप पर राहुल गांधी से जुड़े कई वीडियो क्लिप्स और तस्वीरें तेजी से वायरल की गईं, जिन्हें बाद में कई स्वतंत्र फैक्ट-चेकर्स ने भ्रामक और तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया पाया। पिछले कुछ हफ्तों में बीजेपी आईटी सेल और उसके समर्थकों द्वारा राहुल गांधी को घेरने के लिए मुख्य रूप से तीन बड़े नैरेटिव या भ्रम फैलाने की कोशिश की गई है।

संसद के भीतर राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिए गए भाषण के एक हिस्से को बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख और अन्य नेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ शेयर किया गया कि “राहुल गांधी ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहा है।” इस वीडियो को लाखों बार देखा गया और टीवी डिबेट्स का मुख्य मुद्दा बना दिया गया। जब इस बयान का पूरा वीडियो और संसद की कार्यवाही का रिकॉर्ड देखा गया, तो साफ हुआ कि राहुल गांधी ने साफ तौर पर बीजेपी, आरएसएस और सत्ता पक्ष के नेताओं की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि “जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे चौबीसों घंटे हिंसा, नफरत और असत्य फैलाते हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया था कि हिंदू धर्म अभय (डर से मुक्ति), अहिंसा और प्रेम सिखाता है, न कि नफरत। लेकिन आईटी सेल ने उनके भाषण से ‘बीजेपी’ शब्द को हटाकर केवल ‘हिंदू’ शब्द को वायरल कर दिया ताकि बहुसंख्यक समाज में उनके खिलाफ गुस्सा पैदा किया जा सके। राहुल गांधी के हालिया विदेश दौरों को लेकर भी एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई।

सोशल मीडिया पर कुछ धुंधली तस्वीरें और पोस्ट शेयर करके दावा किया गया कि राहुल गांधी ने अमेरिका और यूरोप में भारत-विरोधी लॉबिंग करने वाले समूहों और चीनी अधिकारियों से गुप्त मुलाकातें की हैं। यहाँ तक कि उनके सुरक्षा घेरे (SPG/पायलट सुरक्षा) को लेकर भी भ्रामक दावे किए गए कि वे जानबूझकर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों से चीजें छुपा रहे हैं। कांग्रेस के संचार विभाग ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन मुलाकातों की मूल तस्वीरें जारी कीं। ये तस्वीरें सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों, प्रवासी भारतीयों (Diaspora) और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ खुली चर्चाओं की थीं। कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी जानबूझकर राहुल गांधी की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को ‘देशद्रोह’ के चश्मे से दिखाना चाहती है। देश में चल रहे किसान आंदोलनों और संसद में पेश हुए बजट पर राहुल गांधी के भाषणों के छोटे-छोटे 10-15 सेकंड के वीडियो क्लिप्स बनाकर उन्हें ‘पप्पू 2.0’ के रूप में पेश करने की दोबारा कोशिश की गई। एक क्लिप में राहुल गांधी के आर्थिक आंकड़ों को इस तरह पेश किया गया जैसे उन्हें गणित की समझ ही न हो। फैक्ट-चेक में सामने आया कि राहुल गांधी सरकार द्वारा बजट में किए गए आवंटन और असल खर्च के अंतर को समझा रहे थे।

आईटी सेल ने उनके द्वारा पूछे गए सवालों (तंज) को ही उनका अंतिम बयान बनाकर पेश कर दिया। इस नए वैचारिक और डिजिटल युद्ध ने देश की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। दोनों ही दल एक-दूसरे पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार करने का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के डिजिटल मीडिया विंग और प्रवक्ताओं का कहना है कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों और उसके बाद विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी के आक्रामक तेवरों ने बीजेपी के ‘पप्पू’ वाले पुराने नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है। बीजेपी आईटी सेल राहुल गांधी की छवि को खराब करने के लिए हर महीने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहा है। जब भी राहुल गांधी बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, नीट धांधली या कॉकरोच आंदोलन जैसे युवाओं के मुद्दों पर सरकार को घेरते हैं, आईटी सेल तुरंत कोई पुराना या भ्रामक वीडियो लाकर मुख्य विमर्श को भटका देता है। कांग्रेस ने अब ऐसी भ्रामक पोस्ट करने वाले बीजेपी नेताओं और हैंडल धारकों के खिलाफ देश भर के विभिन्न राज्यों में पुलिस शिकायतें और मानहानि के मुकदमे दर्ज कराने शुरू कर दिए हैं। दूसरी तरफ, बीजेपी आईटी सेल और उसके रणनीतिकारों का साफ कहना है कि वे कोई भ्रम नहीं फैला रहे हैं, बल्कि राहुल गांधी के ‘अपरिपक्व और विभाजनकारी’ बयानों को देश के सामने ला रहे हैं। बीजेपी का तर्क है। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी देश को जातियों में बांटकर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं और आईटी सेल केवल उनके इस खतरनाक एजेंडे को बेनकाब कर रहा है।

सत्ता पक्ष के अनुसार, राहुल गांधी संसद के भीतर प्रधानमंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे जनता तक पहुंचाना एक सजग राजनीतिक दल का कर्तव्य है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी आईटी सेल द्वारा राहुल गांधी पर केंद्रित इस नए ‘भ्रम अभियान’ और कांग्रेस के पलटवार ने भारतीय राजनीति में सूचनाओं के प्रवाह को बेहद जहरीला बना दिया है। डीपफेक (Deepfake), एआई टूल्स (AI Tools) और डॉक्टर वीडियो (Edited Videos) के इस दौर में आम नागरिक के लिए सच और झूठ के बीच का अंतर कर पाना नामुमकिन होता जा रहा है। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए चलाए जाने वाले ये ‘भ्रमजाल’ न केवल किसी नेता की छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि समाज में नफरत और ध्रुवीकरण को भी गहरा करते हैं। लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा ‘दिमागी नक्सलियों’ पर किए गए प्रहार और सड़कों पर युवाओं के ‘कॉकरोच आंदोलन’ के बीच, राहुल गांधी को लेकर छिड़ी यह डिजिटल जंग यह साफ दर्शाती है कि आगामी विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीति के लिए नैरेटिव (विमर्श) सेट करने की होड़ मची हुई है। बीजेपी जहां राहुल गांधी को एक ‘भ्रमित और सनातन-विरोधी’ नेता के रूप में स्थापित करने पर आमादा है, वहीं राहुल गांधी और कांग्रेस इस चक्रव्यूह को तोड़कर खुद को देश की आम जनता, किसानों और युवाओं की असली आवाज के रूप में पेश करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता इस डिजिटल युद्ध में फैले भ्रम को स्वीकार करती है या वास्तविक मुद्दों के आधार पर अपना फैसला सुनाती है।

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