समय प्रज्ञा मिश्रा के साथ खड़े रहने का: स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतंत्र की साख

प्रज्ञा मिश्रा आज सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि खोई हुई पत्रकारिता की साख को वापस लाने का एक आंदोलन हैं। उनके उठाए सवाल देश के हर उस नागरिक के सवाल हैं जो एक बेहतर, पारदर्शी और न्यायप्रिय भारत की कल्पना करता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सच को दबाने की कोशिश की गई है, तब-तब जनता की सामूहिक आवाज ने तानाशाहियों को झुकाया है। आज प्रज्ञा मिश्रा के साथ खड़े होना, देश के भविष्य और अपनी आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों के साथ खड़े होना है।

आज के दौर में जब मुख्यधारा का मीडिया (Mainstream Media) बड़े कॉर्पोरेट घरानों और राजनीतिक दबावों के बीच अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है, तब स्वतंत्र पत्रकारिता (Independent Journalism) लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को जिंदा रखे हुए है। इसी स्वतंत्र और निडर पत्रकारिता का एक बड़ा और चर्चित नाम है प्रज्ञा मिश्रा। ‘उल्टा चश्मा यूसी’ (Ulta Chashma UC) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जनता की आवाज उठाने वाली प्रज्ञा मिश्रा ने पत्रकारिता के उन बुनियादी सिद्धांतों को पुनर्जीवित किया है, जिन्हें आज का ‘गोदी मीडिया’ भूल चुका है। ऐसे समय में जब सच बोलना सबसे बड़ा जोखिम बन गया है, यह समय प्रज्ञा मिश्रा जैसी निडर आवाज के साथ खड़े रहने का है। वर्तमान समय में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के गुणगान और सनसनीखेज बहसों (Debates) में व्यस्त है। जनता के वास्तविक मुद्दे जैसे बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और भ्रष्टाचार मुख्य विमर्श से गायब हो चुके हैं। इस अंधकार युग में डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकार ग्राउंड जीरो पर जाकर जनता की असल परेशानियां दिखा रहे हैं। लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता की यह राह इतनी आसान नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कॉर्पोरेट और सरकारी विज्ञापनों के बिना चैनल चलाना बेहद मुश्किल होता है।

सच दिखाने पर अक्सर मुकदमों, ट्रोलिंग और शारीरिक हमले की धमकियों का सामना करना पड़ता है। बड़े चैनलों की तरह स्वतंत्र पत्रकारों के पास विशाल टीमें और आधुनिक तकनीक नहीं होती। प्रज्ञा मिश्रा ने इन सभी बाधाओं को पार करते हुए एक ऐसी पत्रकारिता की नींव रखी, जो सीधे तौर पर जनता से जुड़ी है। प्रज्ञा मिश्रा की पत्रकारिता केवल खबरें पढ़ना नहीं है, बल्कि खबरों के पीछे छिपे सच को उजागर करना है। प्रज्ञा स्टूडियो के बंद कमरों में बैठकर फैसले नहीं सुनातीं। वे धूप, धूल और बरसात की परवाह किए बिना देश के दूर-दराज के इलाकों और सड़कों पर जाकर आम लोगों, किसानों, मजदूरों और युवाओं से बात करती हैं। उनका ‘उल्टा चश्मा’ देखने का अंदाज सत्ताधारियों को असहज करता है। वे बेहद शालीनता लेकिन उतनी ही बेबाकी से राजनेताओं और अधिकारियों से जनता के हक के सवाल पूछती हैं। जब अन्य चैनल हिंदू-मुस्लिम डिबेट या राजनीतिक उठापटक में व्यस्त होते हैं, तब प्रज्ञा मिश्रा पेपर लीक, युवाओं के रोजगार, सरकारी योजनाओं की जमीनी विफलता और महिला सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर वीडियो बनाती हैं। प्रज्ञा मिश्रा के साथ खड़े रहने का मतलब सिर्फ एक व्यक्ति का समर्थन करना नहीं है, बल्कि ‘सच’ के विचार के साथ खड़े होना है।

यदि आज हम उनके जैसी स्वतंत्र आवाजों का साथ छोड़ देंगे, तो आने वाले समय में जनता की बात करने वाला कोई नहीं बचेगा। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी एक निष्पक्ष मीडिया का होना भी है। जब मुख्यधारा का मीडिया विपक्ष की भूमिका निभाने में विफल हो जाता है, तब प्रज्ञा मिश्रा जैसे पत्रकार सत्ता से सवाल पूछकर लोकतंत्र के संतुलन को बनाए रखते हैं। आज मास कम्युनिकेशन और पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले हजारों युवा असमंजस में हैं कि वे कैसा पत्रकार बनना चाहते हैं। प्रज्ञा मिश्रा ने यह साबित किया है कि बिना किसी बड़े टीवी नेटवर्क के भी, सिर्फ अपने मोबाइल और माइक के दम पर करोड़ों लोगों तक सही बात पहुंचाई जा सकती है। वे नए पत्रकारों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता पूरी तरह से दर्शकों के समर्थन (Crowdfunding और Views) पर निर्भर करती है। प्रज्ञा मिश्रा को जनता का जो प्यार और भरोसा मिला है, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनके साथ खड़े होकर हम यह संदेश देते हैं कि देश की जनता आज भी बिकाऊ और चाटुकार पत्रकारिता को नकारती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि जो भी पत्रकार सत्ता की कमियों को उजागर करता है, उसे ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘एजेंडा चलाने वाला’ कहकर बदनाम करने की कोशिश की जाती है। प्रज्ञा मिश्रा को भी सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग, भद्दे कमेंट्स और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। एक महिला पत्रकार होने के नाते उनके लिए यह लड़ाई और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनका हौसला कभी डगमगाया नहीं है। वे हर बार और अधिक मजबूती के साथ जनता के बीच लौटती हैं। यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में निष्पक्ष पत्रकारिता जीवित रहे, तो हमें केवल दर्शक बनकर नहीं बैठना होगा। हमें सक्रिय रूप से स्वतंत्र पत्रकारों का ढाल बनना होगा।

प्रज्ञा लिखती है –

झूठ प्रचारित किया जा रहा है कि दिव्या ने हत्यारे मानस से डेढ़ करोड़ की Alimony मांगी थी…Alimony और स्त्रीधन में अंतर होता है…स्त्रीधन वो होता है जो महिला को उसकी शादी से पहले, शादी के समय या शादी के बाद प्राप्त होता है..जिसपर महिला का अपना अधिकार होता है.. Alimony कानूनी तौर पर पति पत्नी के अलग हो जाने के बाद Divorce Decree के बाद Permanent Alimony धारा 25 के तहत मांगी जा सकती है.. दिव्या का केस कोर्ट में दाखिल हुए एक साल का भी समय नहीं हुआ है…तलाक के केस में मुकदमे को 8 चरणों से होकर गुजरना पड़ता है.. नोटिस और जवाब/मध्यस्थता/काउंसलिंग/सुलह का प्रयास/दोनों पक्षों की बातों को सुनना/समझौते का अवसर/समझौता न होने पर आगे प्रोसीडिंग/फाइनल डिवोस/परमानेंट एलिमनी/भरण पोषण/ गुजारा भत्ता/ दिव्या का केस लेवल 2 या 3 यानी मध्यस्तता और काउंसलिंग तक तक ही पहुंचा था..काउंसलिंग में भी 6 राउंड होते हैं..दिव्या के केस में केवल एक राउंड हुआ था..जब पति पत्नी आमने सामने बैठते हैं…और कोर्ट ये देखता है कि जोड़ा साथ रह सकता है या नहीं…तो Permanent Alimony या जिसे इलीमनी कहा जा रहा है वो केवल एक दुष्प्रचार है… अब आते हैं स्त्रीधन पर..स्त्रीधन शादी में दुल्हन को मिला उपहार या उसे मिले जेवरात होते हैं…स्त्रीधन ऐसे ही नहीं मिल जाता है..कोर्ट में उसके फोटो सबूत लगाने पड़ते हैं..साबित करना पड़ता है कि आमुक वस्तु स्त्री की है..शादी की फोटो में जो स्त्रीधन दिखाई देता है जज उसे ही कंसीडर करते हैं…या फिर अगर कोई बिल मौजूद हो तो उसे कंसीडर किया जाता है. दिव्या ने बिल लगाए थे..फोटो लगाए थे..मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि कितनी राशि के स्त्रीधन की मांग की गई है..अगर डेढ़ करोड़ के स्त्रीधन की डिमांड की गई है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दिव्या की शादी में कितना स्त्रीधन उसके मां बाप ने दिया होगा.. स्त्री से वैवाहिक संबंध विच्छेद की स्थिति में कोई पुरुष स्त्रीधन का भोग नहीं कर सकता…अगर पत्नी आर्थिक तौर पर सक्षम है तो इस स्थिति में पत्नी को Alimony यानी गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार नहीं है…कोई मांगता भी है तो मिलता नहीं है..दुनिया जानती है कि दिव्या..हत्यारे मानस से ज्यादा ऊंचे ओहदे पर थी..आर्थिक तौर पर उससे ज्यादा मजबूत थी..तो एलिमनी शब्द का इस्तेमाल केवल कीचड़ उछालने के लिए किया जा रहा है…

घर में माहौल ऐसा नहीं है कि वीडियो बना पाऊं..इसलिए समय मिलने पर अपनी बात लिखकर आपसे संवाद करती हूं..अब आती हूं असली बात पर 1- अब असली बात ये नहीं है कि हत्यारा मानस सनकी, साइको, डुअल पर्सनालिटी, घरेलू हिंसा प्रेमी था..असली बात ये है कि जिस व्यक्ति के घर पर एक बांस की मजबूत लाठी भी नहीं थी…उसके घर पर दो पिस्टल..और एक देसी तमंचा कहां से आया ? 2- कौन उसे इस हत्याकांड के लिए मोटीवेट कर रहा था ? 3- वो बाजार से पकाने के लिए एक बार में सारी जरूरी सब्जियां नहीं ला सकता था…उसे रेयर पिस्टल कैसे मिले? कौन से हथियार किसकी हत्या में इस्तेमाल हुए ? 4- किसने उसे इस जघन्य अपराध के लिए तैयार किया ? 5- कौन था हत्यारे मानस का कोच ? 6- व्यक्ति इतना ट्रिगर तभी होता है जब उसे कोई रोज भड़काए ? डिवोस केस तो लंबे समय से चल रहा था..अंतिम स्टेटस में हत्यारे ने चीट शब्द लिखा..अगर मानस को मालूम था कि दिव्या उसे चीट कर रही है.. तो तलाक के केस में उसे अपनी पत्नी को चरित्रहीन साबित करके अपरहैंड मिल जाता…क्या ‘चीट’ शब्द पुलिस को भटकाने के लिए लिखा गया ? 7- क्या हत्यारे मानस की मानसिक स्थिति का किसी ने इस्तेमाल किया है? 8- क्या किसी की नजर मानस के घर में मौजूद कथित ‘डेढ़ करोड़’ के स्त्रीधन पर थी ? 9- मानस साइको था..घरेलू हिंसा का आदी था..लेकिन समाज में सभ्यता दर्शाता था..वो चींटी नहीं मार सकता था.. 10- हत्यारा घर में पिस्टल और तमंचे नहीं उगाया होगा कहीं से तो लाया होगा..? 11- अगर बैंक के सामान्य बाबू की पहुंच पिस्टल गिरोह तक है तो फिर लखनऊ को सतर्क रहने की जरूरत है 12- मानस ने तीन में से किसी को दूर से शूट नहीं किया सबको सटाकर सिर में गोली मारी..क्या ये प्लान था…या फिर दिव्या को मानस ने मारा 13-मानस और शीबा को किसी और ने मार दिया ? 14- ये ओपन शट केस नहीं है…बहुत ज्यादा मिस्टीरियस केस है ? 15- बैंक और घर की दूरी 10-15 मिनट की थी..दिव्या की हत्या के बाद 35-45 मिनट मानस कहां था ? 16- क्या मानस के फोन में स्टेटस किसी और ने अपडेट किया..क्योंकि मानस हिंग्लिश में लिखता था..स्टेटस अपडेट इंग्लिश में था ? 17- क्या हत्याकांड और घर के रास्ते के बीच हत्यारा मानस कहीं और भी रुका था ? 18 – अगर रुका था तो किसके पास..क्या अपने कोच के पास ? 19- क्या मानस के घर के भीतर कोई तीसरा भी मौजूद था जिसने मानस और उसकी बहन को मारा ? 20- क्या मानस के घर के भीतर घुसने और निकलने का कोई और रास्ता भी था ? 21- पुलिस को इन पहलुओं पर जांच करनी चाहिए…अगर इन सब सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं.. 22- पिस्टल कहां से आईं नहीं मालूम चलता है तो केस किसी और एजेंसी को दिया जाना चाहिए..23- सच्चाई का बाहर आना बहुत जरूरी है..ये ओपन एंड शट केस नहीं है, मेरी बहन और उस मानसिक बीमार लड़की शीबा को न्याय मिलना चाहिए 24- लखनऊ में तीन हथियारों के साथ बैंक कर्मचारी मर्डर प्लान कर रहा है..असलहे ला रहे है 25- ऐसी पुलिसिंग से बेहतर माफिया काल था..कम से कम लोगों को मालूम तो होता था किससे सावधान रहना है..

मेरी बहन दिव्या मिश्रा आज पंचतत्व में विलीन हो गई…मैं तमाम अपने उन हमपेशा बांधवों से क्षमा चाहती हूं..जो पीएम हाउस पर मुझसे बयान की उम्मीद कर रहे थे…मैं कुछ कह पाने की हालत में नहीं थी..मैं कैमरे पर रो देती..खास तौर पर इस समय अपनी मां के सामने बेटे की तरह खड़ी दिखना चाहती थी…शुक्रिया अपने उन सब मीडिया के सीनियर जनों का कहना चाहती हूं जो पिछले दो दिन से चैनल लाइन को किनारे रखकर..मेरे साथ दिल्ली, नोएडा, लखनऊ और बैंगलौर से फोन पर पर्सनली जुड़े हुए थे..मेरी हिम्मत बनकर खड़े हुए थे… रोहिणी सिंह जी, अभिसार शर्मा जी, रवीश कुमार जी, साक्षी जोशी जी, मेरे भाई निखिल और NEWS TAK आपका भी बहुत-बहुत शुक्रिया…वैकल्पिक मीडिया के मेरे सभी साथी पत्रकारों को भी मेरा बहुत-बहुत नमन है…बुरे समय में ही अपनों का पता चलता है…शायद आज मेरा ये लिखना बचकाना लग रहा हो इसमें मिच्योरिटी ना दिख रही हो..फिर भी थोड़ी बहुत बचकानी बातें सअधिकार कर रही हूं…सत्ता और विपक्ष के सभी शुभचिंतकों का बुरे वक्त में खड़े रहने के लिए शुक्रिया..पहली बार समझ आया कि कठिन समय में..अपनों का सिर्फ साथ खड़े रहना..अपनों का सपोर्ट..अपनों का ढांढस बंधा देना ही बहुत बड़ी हिम्मत देता है…बहन तुमको श्रद्धांजलि… मेरी बहन दिव्या मिश्रा आज पंचतत्व में विलीन हो गई…मैं तमाम अपने उन हमपेशा बांधवों से क्षमा चाहती हूं..जो पीएम हाउस पर मुझसे बयान की उम्मीद कर रहे थे…मैं कुछ कह पाने की हालत में नहीं थी..मैं कैमरे पर रो देती..खास तौर पर इस समय अपनी मां के सामने बेटे की तरह खड़ी दिखना चाहती थी…शुक्रिया अपने उन सब मीडिया के सीनियर जनों का कहना चाहती हूं जो पिछले दो दिन से चैनल लाइन को किनारे रखकर..मेरे साथ दिल्ली, नोएडा, लखनऊ और बैंगलौर से फोन पर पर्सनली जुड़े हुए थे..मेरी हिम्मत बनकर खड़े हुए थे… रोहिणी सिंह जी, अभिसार शर्मा जी, रवीश कुमार जी, साक्षी जोशी जी, मेरे भाई निखिल और NEWS TAK आपका भी बहुत-बहुत शुक्रिया…वैकल्पिक मीडिया के मेरे सभी साथी पत्रकारों को भी मेरा बहुत-बहुत नमन है…बुरे समय में ही अपनों का पता चलता है…शायद आज मेरा ये लिखना बचकाना लग रहा हो इसमें मिच्योरिटी ना दिख रही हो..फिर भी थोड़ी बहुत बचकानी बातें सअधिकार कर रही हूं…सत्ता और विपक्ष के सभी शुभचिंतकों का बुरे वक्त में खड़े रहने के लिए शुक्रिया..पहली बार समझ आया कि कठिन समय में..अपनों का सिर्फ साथ खड़े रहना..अपनों का सपोर्ट..अपनों का ढांढस बंधा देना ही बहुत बड़ी हिम्मत देता है…बहन तुमको श्रद्धांजलि…

“समय प्रज्ञा मिश्रा के साथ खड़े रहने का” असल में वह समय है जब देश के हर जागरूक नागरिक को अपनी अंतरात्मा से पूछना होगा कि वह कैसा समाज चाहता है। एक ऐसा समाज जहां चाटुकारिता को पुरस्कार मिले, या ऐसा समाज जहां सच बोलने वाले को सम्मान मिले? प्रज्ञा मिश्रा आज सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि खोई हुई पत्रकारिता की साख को वापस लाने का एक आंदोलन हैं। उनके उठाए सवाल देश के हर उस नागरिक के सवाल हैं जो एक बेहतर, पारदर्शी और न्यायप्रिय भारत की कल्पना करता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सच को दबाने की कोशिश की गई है, तब-तब जनता की सामूहिक आवाज ने तानाशाहियों को झुकाया है। आज प्रज्ञा मिश्रा के साथ खड़े होना, देश के भविष्य और अपनी आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों के साथ खड़े होना है।

Change Language