दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के आने वाले चुनाव में NSUI की यह करवट और ABVP का बैकफुट पर जाना इस बात का संकेत है कि भारतीय युवा अब केवल लोकलुभावन वादों या भावनात्मक मुद्दों पर वोट देने के मूड में नहीं है। राहुल गांधी , छात्रों की गूंज के प्रभाव ने कांग्रेस की छात्र इकाई को एक नई वैचारिक दिशा और नैतिक बल दिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की छात्र राजनीति में इस समय एक बड़ा सांगठनिक और वैचारिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) एक मजबूत करवट ले रही है, राहुल गांधी का प्रभाव युवाओं के बीच गहरा रहा है, और लंबे समय से कैंपस पर मजबूत पकड़ रखने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) बैकफुट पर नजर आ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) का चुनाव केवल एक कैंपस का चुनाव नहीं होता, बल्कि इसे देश के राजनीतिक मूड का थर्मामीटर माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ वैचारिक ध्रुवीकरण और छात्र हितों के मुद्दों पर बड़े बदलाव आए हैं। जहाँ एक दशक से दक्षिणपंथी विचारधारा वाली ABVP का इस कैंपस पर वर्चस्व दिखाई दे रहा था, वहीं अब कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI एक नई ऊर्जा और रणनीति के साथ उठ खड़ी हुई है। कैंपस के गलियारों, कैंटीनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अब “बदलाव” की गूँज साफ सुनाई दे रही है।

NSUI का यह पुनरुत्थान अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह एक सोची-समझी सांगठनिक रणनीति और जमीनी जुड़ाव का परिणाम है। NSUI ने केवल पारंपरिक नारों पर निर्भर रहने के बजाय छात्रों के वास्तविक और रोजमर्रा के मुद्दों को उठाया है। इसमें फीस वृद्धि का विरोध, हॉस्टल की कमी, मेट्रो पास में रियायत और परीक्षाओं में पारदर्शिता जैसे विषय शामिल हैं। अमूमन चुनावों के समय सक्रिय होने वाली NSUI अब पूरे साल कैंपस में सक्रिय दिख रही है। ‘हेल्पडेस्क’ के माध्यम से नए छात्रों के दाखिले में मदद करना और उनकी समस्याओं को सीधे प्रशासन तक पहुंचाना इसकी नई कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है। NSUI ने अपने डिजिटल नैरेटिव को बेहद मजबूत किया है। रील्स, मीम्स और इन्फोग्राफिक्स के जरिए वे आम छात्रों तक अपनी बात बेहद सरल और प्रभावी भाषा में पहुंचा रहे हैं।
इस पूरे बदलाव के केंद्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बदलती छवि और उनका युवाओं से सीधा संवाद है। देशव्यापी राजनीतिक परिदृश्य में हुए बदलावों का सीधा असर विश्वविद्यालय के छात्रों पर पड़ा है। राहुल गांधी की यात्राओं ने युवाओं के बीच उनकी छवि को एक गंभीर, संवेदनशील और सुनने वाले नेता के रूप में स्थापित किया है। डीयू के छात्र अब उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो उनकी बेरोजगारी, पेपर लीक और भविष्य की चिंताओं पर खुलकर बात करता है। राहुल गांधी का दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टलों और छात्रों के बीच अचानक जाकर बैठना, उनके साथ लंच करना और उनकी समस्याओं को सुनना एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। इस सीधे संवाद ने छात्रों के मन से राजनेताओं की ‘पहुंच से दूर’ वाली छवि को तोड़ा। कैंपस में बढ़ रहे वैचारिक टकराव और हिंसा के माहौल के बीच राहुल गांधी का “नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान” का नारा छात्रों को आकर्षित कर रहा है। छात्र अब शांतिपूर्ण, समावेशी और लोकतांत्रिक कैंपस की मांग कर रहे हैं।
लंबे समय तक डीयू की सत्ता पर काबिज रहने वाली ABVP इस समय रक्षात्मक मुद्रा (बैकफुट) में नजर आ रही है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं। कई सालों तक डूसू में रहने के कारण छात्रों के बीच संगठन को लेकर एक स्वाभाविक असंतोष पैदा हुआ है। छात्र महसूस कर रहे हैं कि बुनियादी समस्याओं (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा) का कोई ठोस समाधान नहीं निकला। देश में हाल के समय में हुए पेपर लीक (जैसे NEET और UGC-NET विवाद) और बेरोजगारी के मुद्दों ने दक्षिणपंथी छात्र संगठन को कटघरे में खड़ा किया है। आम छात्र इन मुद्दों पर ABVP की चुप्पी या कमजोर स्टैंड से नाराज दिखे हैं। विपक्ष द्वारा लगातार ABVP पर कैंपस में असहमति की आवाजों को दबाने और बाहुबल का प्रयोग करने के आरोप लगते रहे हैं। आज का जागरूक और शांतिप्रिय छात्र कैंपस में गुंडागर्दी के बजाय बौद्धिक और सुरक्षित माहौल चाहता है। ABVP के पारंपरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मुद्दों के नैरेटिव का असर नए दौर के उन छात्रों पर कम हो रहा है जो मुख्य रूप से प्लेसमेंट, आधुनिक लाइब्रेरी और सस्ती शिक्षा की तलाश में हैं।
डीयू की राजनीति में हमेशा से जातिगत समीकरण (विशेषकर जाट और गुर्जर वोट बैंक) हावी रहे हैं। लेकिन इस बार NSUI ने इस पारंपरिक गणित को बदलने की कोशिश की है। दिल्ली से बाहर (बिहार, यूपी, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत) से आने वाले छात्रों का एक बड़ा हिस्सा NSUI की तरफ आकर्षित हो रहा है, क्योंकि वे खुद को कैंपस की पारंपरिक बाहुबल वाली राजनीति से दूर पाते हैं। NSUI ने कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा और उनकी राजनीतिक भागीदारी को प्रमुखता दी है, जिससे महिला मतदाताओं के बीच उनकी पैठ मजबूत हुई है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में NSUI की यह करवट और ABVP का बैकफुट पर जाना इस बात का संकेत है कि भारतीय युवा अब केवल लोकलुभावन वादों या भावनात्मक मुद्दों पर वोट देने के मूड में नहीं है। राहुल गांधी के प्रभाव ने कांग्रेस की छात्र इकाई को एक नई वैचारिक दिशा और नैतिक बल दिया है। हालांकि, NSUI के लिए असली चुनौती इस मिले हुए जनसमर्थन और उत्साह को स्थायी संगठनात्मक जीत में बदलने की होगी। राजनीति में स्थितियां बदलते देर नहीं लगती, और ABVP जैसी कैडर-आधारित मजबूत संस्था निश्चित रूप से पलटवार की रणनीति तैयार कर रही होगी। लेकिन फिलहाल, डीयू का मूड बदल चुका है—यह बदलाव अधिक लोकतंत्र, रोजगार की गारंटी और एक समावेशी कैंपस के पक्ष में करवट ले रहा है।




