पुणे से उठी ‘छात्रों की गूंज’ केवल महाराष्ट्र तक सीमित रहने वाली नहीं है। यह देश के कोने-कोने में गूंज रहे युवा असंतोष और उनकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐतिहासिक नायकों की प्रेरणा लेकर और अपने अधिकारों के प्रण के साथ देश का युवा निकल पड़ा है।
‘सुनु क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुंकार हूं मैं’! अबके बरस का प्रण है राह थामो हे देवियां । भारत माता को सजाने निकल परे हैं दिवाने , लक्ष्मी फुले आजाद भगत की टोलियां …

पुणे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि हमेशा से विचारों के मंथन का केंद्र रही है। महात्मा ज्योतिराव फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले और महान समाज सुधारकों की विरासत को अपने भीतर समेटे इस शहर ने एक बार फिर भारतीय राजनीति और युवा विमर्श को एक नई दिशा दी है। हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम ने देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व हलचल पैदा कर दी है। इस महासंगम में जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी युवाओं के बीच पहुंचे, तो पूरा माहौल एक नए संकल्प और ऊर्जा से भर गया। यह केवल एक राजनीतिक संवाद नहीं था, बल्कि वर्तमान समय की विसंगतियों के खिलाफ युवा चेतना की एक सामूहिक हुंकार थी। कार्यक्रम की शुरुआत और उसके पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कालजयी पंक्तियाँ जीवंत हो उठीं: “सुनु क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुंकार हूं मैं!”

यह पंक्तियाँ आज के भारतीय युवाओं की मानसिक स्थिति और उनके भीतर सुलगते असंतोष को पूरी तरह बयां करती हैं। आज का युवा शांत बैठने वाला नहीं है। वह समंदर की गर्जना से डरने के बजाय, खुद को बदलते समय की आवाज यानी ‘युगधर्म की हुंकार’ मान रहा है। पुणे के इस मंच से युवाओं ने यह साफ कर दिया कि वे देश की नीतियों में केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि वे खुद भाग्यविधाता बनने की राह पर निकल पड़े हैं। राहुल गांधी ने भी युवाओं के इसी तेवर को सराहा और कहा कि जब देश का युवा जागता है, तो इतिहास अपनी करवट बदलता है। अबके बरस का प्रण है राह थामो ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल युवाओं की आंखों में एक अलग चमक और उनके नारों में एक दृढ़ संकल्प था। उनका सामूहिक स्वर कह रहा था—“अबके बरस का प्रण है राह थामो।” यह प्रण है बेरोजगारी के खिलाफ, यह प्रण है शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण के खिलाफ, और यह प्रण है देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करने वाली ताकतों के खिलाफ।

पुणे के इस मंच से युवाओं ने देश के नीति-निर्माताओं को एक सीधा संदेश दिया कि अब उनकी राह को रोका नहीं जा सकता। युवाओं ने रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं (जैसे NEET और UPSC विवादों के संदर्भ में) और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अपने कड़े सवाल दागे। राहुल गांधी ने युवाओं के इस प्रण को राजनीतिक समर्थन देते हुए कहा कि युवाओं के सपनों को कुचलकर कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता। उन्होंने युवाओं को आश्वासन दिया कि उनकी यह लड़ाई संसद से लेकर सड़क तक लड़ी जाएगी। हे देवियां भारत माता को सजाने निकल परे हैं दिवाने इस आंदोलन और वैचारिक समागम की सबसे खूबसूरत विशेषता इसमें महिलाओं और छात्राओं की भारी भागीदारी थी। मंच से गूंजते गीत और नारे कह रहे थे“हे देवियां भारत माता को सजाने निकल परे हैं दिवाने।” यहाँ ‘देवियां’ शब्द देश की उस आधी आबादी छात्राओं, शोधकर्ताओं और कामकाजी महिलाओं—के लिए है जो अपने अधिकारों के साथ-साथ राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए उठ खड़ी हुई हैं। सावित्रीबाई फुले की इस कर्मभूमि पर बेटियों ने यह साबित कर दिया कि वे देश के भविष्य को संवारने में किसी से पीछे नहीं हैं। भारत माता को ‘सजाने’ का तात्पर्य यहाँ किसी बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि देश को न्याय, समता, बंधुत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सुसज्जित करने से है। युवाओं की यह दीवानगी किसी पद या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर और समावेशी भारत के निर्माण के लिए है।

पुणे की इस ‘छात्रों की गूंज’ में भारत के समृद्ध और क्रांतिकारी इतिहास की झलक साफ दिखाई दे रही थी। कार्यक्रम का माहौल ऐसा था मानो इतिहास के पन्नों से निकलकर “लक्ष्मी फुले आजाद भगत की टोलियां” फिर से सड़कों पर उतर आई हों। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का साहस आज की छात्राओं के जुझारूपन में दिख रहा था, जो अपने हक के लिए बिना डरे सवाल पूछ रही थीं। महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले की शिक्षा और सामाजिक न्याय की विरासत पुणे की हवाओं में रची-बसी थी। युवाओं ने जातिगत जनगणना और सामाजिक आर्थिक समानता के मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर फुले दंपति के विचारों को आगे बढ़ाया। चंद्रशेखर आजाद और शहीद-ए-आजम भगत सिंह का इंकलाबी जज्बा युवाओं के नारों में गूंज रहा था। भगत सिंह की तरह ही आज का छात्र भी व्यवस्थागत सुधार और वैचारिक क्रांति की मांग कर रहा है। जब राहुल गांधी इन युवाओं के बीच बैठे, तो उन्होंने इसी ऐतिहासिक विरासत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज की लड़ाई दो विचारधाराओं के बीच है—एक विचारधारा जो चंद लोगों के हाथों में सत्ता और संपत्ति का संकेंद्रण चाहती है, और दूसरी विचारधारा (जो लक्ष्मी, फुले, आजाद और भगत सिंह की है) जो देश के हर नागरिक, गरीब, दलित, आदिवासी और पिछड़े को उसका हक देना चाहती है।
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी खासियत इसका अनौपचारिक और सीधा स्वरूप था। राहुल गांधी ने पारंपरिक भाषण देने के बजाय युवाओं के सवालों के सीधे जवाब दिए। छात्रों ने उनसे शिक्षा ऋण (Education Loan) की उच्च ब्याज दरों, पेपर लीक की अंतहीन समस्याओं, और कैंपस में घटती लोकतांत्रिक जगहों पर तीखे सवाल पूछे। राहुल गांधी ने युवाओं से जुड़ते हुए कहा कि देश की मौजूदा आर्थिक नीतियां युवाओं को रोजगार देने में पूरी तरह विफल रही हैं। उन्होंने ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ (Academic Freedom) की वकालत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री बांटने वाले कारखाने नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच और शोध के केंद्र होने चाहिए। राहुल गांधी का युवाओं के साथ यह जुड़ाव दिखाता है कि आने वाले समय में युवा और छात्र राजनीति, मुख्यधारा की राजनीति का एजेंडा तय करने वाली है।
पुणे से उठी ‘छात्रों की गूंज’ केवल महाराष्ट्र तक सीमित रहने वाली नहीं है। यह देश के कोने-कोने में गूंज रहे युवा असंतोष और उनकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। दिनकर की पंक्तियों को आत्मसात कर, ऐतिहासिक नायकों की प्रेरणा लेकर और अपने अधिकारों के प्रण के साथ देश का युवा निकल पड़ा है। यह लेख इस बात का गवाह है कि जब देश की रगों में दौड़ने वाला युवा खून सावित्रीबाई फुले की शिक्षा, भगत सिंह के साहस और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को मिलाकर आगे बढ़ता है, तो एक नए युग का सूत्रपात होता है। पुणे की इस गूंज ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत माता को सजाने निकले इन दीवानों की राह रोकना अब किसी भी सत्ता के लिए मुमकिन नहीं होगा। यह युगधर्म की वह हुंकार है, जिसे इतिहास को सुनना ही पड़ेगा।




