डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

सुबह की पहली चुस्की अगर फीकी लगने लगे तो समझ लीजिए कि महँगाई अब सिर्फ़ आंकड़ों और सरकारी दावों का हिस्सा नहीं रही, बल्कि आम इंसान की दिनचर्या में ज़हर घोलने लगी है। भारतीय समाज में चाय केवल एक पेय पदार्थ नहीं है, यह श्रमजीवियों की ऊर्जा, मेहमान नवाज़ी का प्रतीक और हर वर्ग के जुड़ने का माध्यम है। लेकिन जिस तरह से शक्कर के दाम आसमान छू रहे हैं, उसने आम जनता के मुँह से मानो मिठास छीन ली है। रसोई के बजट में लगातार होती यह सेंधमारी अब सिर्फ़ अर्थव्यवस्था का विषय नहीं रही, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक सवाल बन चुकी है। बाज़ार में शक्कर की कीमतों में उछाल के पीछे अक्सर उत्पादन में कमी, मौसम की मार और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की स्थितियों का हवाला दिया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतिगत स्तर पर इस तरह के संकटों का पूर्व आकलन नहीं किया जा सकता। सत्ता के गलियारों में जब चुनाव आते हैं तो महँगाई पर लगाम लगाने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, परंतु ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि बुनियादी चीज़ों के दाम बेकाबू होते ही पूरी व्यवस्था मौन धारण कर लेती है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल बयानों तक सीमित रह जाता है और जनहित से जुड़ा यह गंभीर प्रश्न महज़ एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनकर रह जाता है।
महँगाई की यह मार सबसे ज़्यादा उस मध्यमवर्ग और गरीब तबके पर पड़ती है जिसकी आय सीमित है। चाय के छोटे ठेले चलाने वाले, हलवाई और रोज़ कमाने-खाने वाले मज़दूरों के लिए चीनी के दाम बढ़ना सीधा उनकी आजीविका पर प्रहार है। जब जेब हल्की होती है तो सबसे पहले थाली का स्वाद और जीवन की मिठास गायब होती है। सरकार को केवल बाज़ार के भरोसे जनता को छोड़ने के बजाय सख्त प्रशासनिक कदम उठाने होंगे। जमाखोरी पर कड़ाई से अंकुश लगाना, राशन प्रणाली के माध्यम से आम जनता को रियायती दरों पर शक्कर उपलब्ध कराना और घरेलू बाज़ार की ज़रूरतों को प्राथमिकता देना बेहद आवश्यक है। अगर वक्त रहते रसोई की इस कड़वाहट को दूर नहीं किया गया, तो जनता का यह शांत असंतोष किसी दिन व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।




