शैडो करेंसी के सवाल पर यूपीआई की चमक का चालीसा गान- रितेश सिन्हा

भारत की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास तेजी से उभर रहा है। एक तरफ यूपीआई के रिकॉर्ड लेनदेन को देश की भुगतान क्रांति की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, दूसरी तरफ प्रचलन में बैंक नोटों का मूल्य लगातार नए शिखर पर पहुंच रहा है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में प्रचलन में बैंक नोटों का मूल्य ₹42 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है। सवाल यह नहीं है कि यूपीआई सफल है या नहीं वह निश्चित रूप से सफल है। असली सवाल है कि यदि देश तेजी से डिजिटल भुगतान अपना रहा है तो फिर नकदी का पहाड़ लगातार क्यों बढ़ रहा है? यह आंकड़ा इसलिए चौंकाता है क्योंकि 2016 में नोटबंदी के समय नकदी को लेकर एक बिल्कुल अलग आर्थिक दर्शन सामने रखा गया था। काले धन, नकली मुद्रा और बेहिसाबी अर्थव्यवस्था पर प्रहार के साथ यह उम्मीद भी जताई गई थी कि अर्थव्यवस्था अधिक पारदर्शी और कम नकदी-निर्भर बनेगी। करीब एक दशक बाद तस्वीर यह है कि बैंक नोटों का कुल मूल्य ऐतिहासिक स्तर पर है। वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक बैंक नोटों का प्रचलन लगभग ₹41.23 लाख करोड़ पहुंच गया था और अगस्त 2026 तक यह और ऊपर जा चुका है।

सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ₹500 के नोटों की है। वित्त वर्ष 2025-26 में ₹500 के नोटों की संख्या लगभग 7.05 लाख करोड़ तक पहुंच गई और कुल बैंक नोटों के मूल्य में इनका हिस्सा लगभग 85.5 प्रतिशत था। यानी भारत की प्रचलित मुद्रा व्यवस्था का विशाल हिस्सा एक ही मूल्यवर्ग के नोट पर निर्भर है। सवाल है कि जब छोटे भुगतान तेजी से यूपीआई पर जा रहे हैं, तब इतनी बड़ी मात्रा में ₹500 के नोट आखिर किस आर्थिक गतिविधि में घूम रहे हैं और कितनी नकदी लोग बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रखना पसंद कर रहे हैं? यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। ₹42 लाख करोड़ की प्रचलित नकदी को सीधे काला धन या शैडो करेंसी कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। आरबीआई का आंकड़ा वैध बैंक नोटों की कुल मात्रा बताता है, यह नहीं बताता कि उनमें से कितना पैसा घोषित आय है और कितना अघोषित। लेकिन यही आंकड़ा सरकार और आरबीआई के सामने बड़ा सवाल जरूर रखता है—शैडो इकॉनमी और नकदी के बीच वास्तविक संबंध कितना है और उसका विश्वसनीय आकलन कहां है? यूपीआई के आंकड़े इस विरोधाभास को और मजबूत करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई पर 24,161.69 करोड़ लेनदेन हुए और उनका कुल मूल्य ₹314.23 लाख करोड़ रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में यह मूल्य ₹260.56 लाख करोड़ था। मार्च 2026 में अकेले एक महीने में करीब 2,264 करोड़ यूपीआई लेनदेन हुए, जिनका मूल्य लगभग ₹29.53 लाख करोड़ रहा। यह भारत में डिजिटल भुगतान के असाधारण विस्तार का प्रमाण है। यूपीआई के ₹314 लाख करोड़ के लेनदेन को ₹42 लाख करोड़ की नकदी के सामने रखकर यह कहना कि देश अब नकदी से मुक्त हो चुका है, आर्थिक रूप से गलत होगा। यूपीआई भुगतान का माध्यम है; वह बैंकिंग प्रणाली में जमा धन को इलेक्ट्रॉनिक रूप से एक खाते से दूसरे खाते में स्थानांतरित करता है। इसके विपरीत बैंक नोट भौतिक मुद्रा हैं। दोनों के आंकड़ों को जोड़कर या घटाकर अर्थव्यवस्था की पारदर्शिता तय नहीं की जा सकती। फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है। यूपीआई का इस्तेमाल करोड़ों छोटे-बड़े भुगतान के लिए हो रहा है तो नकदी की मांग इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
इसका एक हिस्सा भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक संरचना में छिपा है। कृषि, छोटे व्यापार, निर्माण, घरेलू सेवाएं, असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण बाजारों में नकदी आज भी महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग नकदी को सिर्फ भुगतान के साधन के रूप में नहीं, बल्कि आपातकालीन बचत के रूप में भी रखते हैं। महंगाई, अर्थव्यवस्था का आकार, आय में वृद्धि, बैंकिंग व्यवहार और आर्थिक अनिश्चितता भी नकदी की मांग को प्रभावित करते हैं।नकदी बढ़ने का अर्थ अपने आप काले धन की वृद्धि नहीं है। लेकिन सरकार यदि शैडो इकॉनमी पर लगातार कार्रवाई का दावा करती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि बढ़ती नकदी के पीछे वास्तविक आर्थिक कारण क्या हैं और उसमें बेहिसाबी अर्थव्यवस्था की भूमिका कितनी है। यहीं से पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोटों का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल के लिए दो अरब नोटों को मंजूरी दी है—एक अरब ₹10 और एक अरब ₹20 के। इनका घोषित उद्देश्य नोटों की टिकाऊ क्षमता बढ़ाना, सुरक्षा मजबूत करना और मुद्रा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाना है। इस फैसले को किसी छिपी हुई साजिश के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि पॉलिमर नोटों की वास्तविक लागत क्या होगी, उनकी उम्र कितनी होगी, पुराने नोटों की तुलना में रखरखाव और प्रतिस्थापन खर्च कितना घटेगा, उनके निपटान और पर्यावरणीय प्रभाव का क्या आकलन हुआ है और क्या भविष्य में बड़े मूल्यवर्ग के नोटों को भी पॉलिमर में बदलने की कोई दीर्घकालिक योजना है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नोट का पदार्थ बदलने से अर्थव्यवस्था का चरित्र कैसे बदलेगा? कागज का नोट यदि वैध और दर्ज लेनदेन में इस्तेमाल होता है तो वह समस्या नहीं है। और यदि कोई बेहिसाबी लेनदेन हो रहा है तो कागज की जगह प्लास्टिक का नोट आ जाने से वह पारदर्शी नहीं हो जाएगा। शैडो इकॉनमी नोट के पदार्थ से नहीं, लेनदेन के छिपे होने से पैदा होती है। नोटबंदी के बाद की तस्वीर भी इस बहस को गंभीर बनाती है। जिस ₹500 के नोट को 2016 में पुराने रूप में समाप्त किया गया था, उसी मूल्यवर्ग का नया नोट आज भारतीय मुद्रा व्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसका अर्थ यह नहीं कि नोटबंदी के सभी उद्देश्य विफल रहे। लेकिन इतना जरूर साबित होता है कि नोटबंदी के जरिए स्थायी रूप से नकदी को अर्थव्यवस्था से बाहर नहीं किया जा सका। नकदी की आर्थिक जरूरत वापस आई और अब वह रिकॉर्ड स्तर पर है। अब यूपीआई की उपलब्धि को नकदी के सवाल का जवाब बनाना बंद करना होगा। यूपीआई ने भुगतान को तेज, आसान और कम लागत वाला बनाया है। वित्त वर्ष 2016-17 में लगभग 2 करोड़ वार्षिक लेनदेन से शुरू होकर वित्त वर्ष 2025-26 में 24 हजार करोड़ से अधिक लेनदेन तक पहुंचना असाधारण उपलब्धि है। लेकिन यह सफलता अपने आप यह साबित नहीं करती कि भारत की नकदी-निर्भरता समाप्त हो गई है। नोट गायब नहीं हुए हैं। वे आरबीआई के आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहे हैं। गायब है तो उस पर गंभीर सार्वजनिक बहस।
आरबीआई को केवल यह बताने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि कितने नोट प्रचलन में हैं। नीति-निर्माण के लिए यह भी समझना जरूरी है कि नकदी की मांग किन क्षेत्रों से आ रही है, कितनी नकदी लंबे समय तक निष्क्रिय रहती है, कितनी बैंकिंग प्रणाली में लौटती है और नकदी रखने की प्रवृत्ति में आय तथा क्षेत्र के हिसाब से कितना अंतर है। ₹42 लाख करोड़ कोई मामूली रकम नहीं है। यह देश की मुद्रा व्यवस्था, आर्थिक व्यवहार और वित्तीय भरोसे का बड़ा संकेतक है। यदि यह नकदी सामान्य आर्थिक गतिविधि की जरूरत है तो सरकार को उसके कारण स्पष्ट करने चाहिए। यदि इसका कोई बड़ा हिस्सा शैडो इकॉनमी से जुड़ा है तो उसका प्रमाण आधारित आकलन सामने आना चाहिए।
₹42 लाख करोड़ की नकदी को देखकर हर नोट को काला धन कहना जितना गलत है, उतना ही गलत यूपीआई के ₹314 लाख करोड़ के लेनदेन को देखकर यह मान लेना है कि नकदी की समस्या खत्म हो गई। भारत को न तो नकदी के खिलाफ अंधी लड़ाई चाहिए और न ही यूपीआई की उपलब्धि का चालीसा गान।भारत को चाहिए आंकड़ों पर आधारित मौद्रिक पारदर्शिता और जवाबदेही। सवाल यह नहीं कि नोट कागज का है या प्लास्टिक का। सवाल यह है कि देश में घूम रहे 42 लाख करोड़ रुपये आखिर किन आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे रहे हैं, उनका कितना हिस्सा औपचारिक अर्थव्यवस्था में दर्ज है और शैडो इकॉनमी से उनका वास्तविक संबंध कितना है? जब तक इन सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते, तब तक यूपीआई के हर नए रिकॉर्ड के साथ एक दूसरा आंकड़ा भी जनता को याद रखना चाहिए—भारत में नकदी भी रिकॉर्ड स्तर पर है। इस विरोधाभास पर चालीसा नहीं, जवाब चाहिए।




