दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP का सर्वे भी NSUI की बढ़त का आगाह बता रहा है : राहुल गांधी का छात्रों की गूंज का असर

ABVP के सर्वे से आई शुरुआती चेतावनी इस बात का साफ संकेत है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का मूड अब केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दों के सहारे चलने वाला नहीं है. आज का युवा रोजगार की गारंटी, सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और एक सुरक्षित, लोकतांत्रिक परिसर की मांग कर रहा है.

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के आगामी चुनावों से पहले देश के इस सबसे प्रतिष्ठित परिसर की राजनीतिक हवा तेजी से बदलती नजर आ रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को हमेशा से देश की राजनीति का थर्मामीटर माना जाता रहा है, जहां से उठने वाली लहरें पूरे देश के राजनीतिक मूड को बयां करती हैं. हाल ही में संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के एक आंतरिक फीडबैक और रणनीतिक सर्वे से चौंकाने वाले संकेत मिले हैं. इस सर्वे के लीक हुए अंशों के अनुसार, कैंपस में कांग्रेस समर्थित भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) को एक मजबूत बढ़त मिलती दिखाई दे रही है. राजनीतिक विश्लेषकों और छात्र नेताओं का मानना है कि छात्र राजनीति में आया यह बड़ा रणनीतिक बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि इसके केंद्र में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा शुरू किया गया देशव्यापी युवा संवाद और हाल ही में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का गहरा असर है. लंबे समय से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ पर काबिज रहने वाली और मजबूत कैडर बेस का दावा करने वाली ABVP इस समय वैचारिक मोर्चे पर रक्षात्मक रुख अपनाने को मजबूर है.

आगामी घोषणापत्र और चुनावी तैयारियों के लिए किए गए फीडबैक अभियान ‘माई डीयू, माई मेनिफेस्टो’ के दौरान संगठन को सामान्य छात्रों से जो प्रतिक्रियाएं मिली हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं. आम छात्रों में बुनियादी ढांचे (Infrastructure), जर्जर हॉस्टलों की स्थिति, फीस वृद्धि और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर भारी असंतोष देखा गया है. देश में लगातार हुए पेपर लीक विवादों (जैसे NEET और UGC-NET) और बेरोजगारी की चिंताओं ने दक्षिणपंथी छात्र राजनीति के पारंपरिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को कमजोर किया है. सर्वे में यह बात सामने आई है कि आम छात्र कैंपस के वास्तविक मुद्दों पर छात्र संघ के पिछले नेतृत्व की चुप्पी से नाराज हैं, जिसके कारण एक बड़ा वर्ग अब विकल्प की तलाश में है. इस राजनीतिक बदलाव के पीछे सबसे बड़ी ताकत कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बदली हुई छवि और उनका छात्रों के साथ बिना किसी प्रोटोकॉल का सीधा संवाद माना जा रहा है. राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टलों और डूसू कार्यालयों के औचक दौरे किए हैं. उन्होंने सीधे तौर पर हाशिए पर मौजूद, ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले और सामान्य छात्रों से मुलाकात की.

राहुल गांधी की इस रणनीति का प्रभाव कुछ इस तरह देखा जा रहा है:

प्रभाव के प्रमुख बिंदुविस्तृत विवरण
समस्याओं को मंच देनाराहुल गांधी ने केवल भाषण देने के बजाय छात्रों की समस्याओं—जैसे महंगी शिक्षा, फेलोशिप की कमी और प्लेसमेंट के संकट को सुना.
वैचारिक जुड़ावउनके अनौपचारिक संवाद ने Gen-Z (आधुनिक युवा पीढ़ी) को यह महसूस कराया कि उनकी चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा रहा है.
NSUI को नई ऊर्जाशीर्ष नेतृत्व के इस सक्रिय हस्तक्षेप ने NSUI के कैडर में नई जान फूंक दी है, जिससे वे अधिक आक्रामक और छात्र-केंद्रित राजनीति की तरफ बढ़े हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों (विशेषकर जाट और गुर्जर वोट बैंक) के इर्द-गिर्द घूमती रही है. हालांकि, NSUI ने इस बार अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. संगठन ने बाहरी राज्यों (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत) से आने वाले उन छात्रों को अपने पाले में जोड़ने का प्रयास किया है जो अक्सर कैंपस की पारंपरिक बाहुबल और वर्चस्व की राजनीति से खुद को अलग-थलग पाते हैं. कैंपस में शांतिप्रिय और बौद्धिक माहौल की मांग तेज हो गई है. हाल ही में विभिन्न परिसरों में हुए वैचारिक टकरावों और मारपीट की घटनाओं के बाद सामान्य छात्र सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. NSUI ने अपनी मुहिम ‘माई कैंपस, माई मेनिफेस्टो’ के जरिए छात्राओं की सुरक्षा, मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) और शैक्षणिक पारदर्शिता जैसे प्रगतिशील मुद्दों को मुख्य एजेंडे में शामिल किया है, जिससे महिला मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ मजबूत हो रही है.

जैसे-जैसे NSUI की जमीनी सक्रियता बढ़ रही है, कैंपस का सियासी तापमान भी बढ़ता जा रहा है. हाल ही में राहुल गांधी के दौरों और विपक्षी छात्र सम्मेलनों के दौरान दोनों छात्र संगठनों के बीच तीखी नोकझोंक और प्रदर्शन देखने को मिले हैं. जहां ABVP ने विपक्षी दौरों को “राजनीतिक नौटंकी” और बाहरी हस्तक्षेप करार देते हुए विरोध प्रदर्शन किए हैं, वहीं NSUI ने आरोप लगाया है कि उनकी बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर दक्षिणपंथी संगठन डराने-धमकाने और प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग का सहारा ले रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस बल चुनावी तैयारियों के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर रहे हैं ताकि कैंपस का माहौल शांतिपूर्ण बना रहे. ABVP के सर्वे से आई शुरुआती चेतावनी इस बात का साफ संकेत है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का मूड अब केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दों के सहारे चलने वाला नहीं है. आज का युवा रोजगार की गारंटी, सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और एक सुरक्षित, लोकतांत्रिक परिसर की मांग कर रहा है. यद्यपि राजनीति में स्थितियां बदलते देर नहीं लगती और ABVP जैसी सुसंगठित एवं कैडर-आधारित संस्था निश्चित रूप से अपनी पूरी ताकत के साथ पलटवार की रणनीति पर काम कर रही है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि राहुल गांधी द्वारा उठाए गए छात्र हितों के मुद्दों ने कैंपस में बदलाव की एक गहरी गूंज पैदा कर दी है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी संगठन के लिए आसान नहीं होगा.

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