दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह संकट केवल एक विश्वविद्यालय का संकट नहीं है, बल्कि यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के पतन का संकेत है। किसी भी विश्वविद्यालय का अस्तित्व उसकी स्वतंत्र सोच, रिसर्च और योग्य शिक्षकों से होता है। यदि राजनीतिक दल और उनके वैचारिक संगठन अपने तुच्छ फायदों के लिए शिक्षा के इन मंदिरों को अपनी प्रयोगशाला बनाएंगे, तो नुकसान देश के भविष्य का होगा।

देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) आज एक बेहद गंभीर संकट से गुजर रही है। कभी अपनी अकादमिक उत्कृष्टता, वैचारिक स्वतंत्रता और समृद्ध सांस्कृतिक माहौल के लिए दुनिया भर में मशहूर यह विश्वविद्यालय आज अपनी साख खोता नजर आ रहा है। शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और स्वयं छात्रों का आरोप है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी तेजी से अपना ‘एजुकेशनल अस्तित्व’ (अकादमिक पहचान) खो रही है। इस गिरावट के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बढ़ते राजनीतिक दखल को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप, अब देश के मेधावी छात्र इस यूनिवर्सिटी से दूरी बनाने लगे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम (Syllabus) में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए हैं। आरोप है कि यह बदलाव किसी अकादमिक शोध या छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि एक खास विचारधारा को थोपने के लिए किए गए हैं।प्रसिद्ध लेखकों, विचारकों और दलित-बहुजन चेतना से जुड़ी रचनाओं को पाठ्यक्रम से हटाया गया है। इसके विपरीत, दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले अध्यायों को शामिल किया गया है। यूनिवर्सिटी कैंपस में अब स्वतंत्र बहसों, सेमिनारों और डॉक्युमेंट्री स्क्रीनिंग पर अघोषित प्रतिबंध रहता है। असहमति की आवाज उठाने वाले प्रोफेसरों और छात्रों को निशाना बनाया जाता है. अकादमिक जगत में फ्री-थिंकिंग (स्वतंत्र सोच) को दबाए जाने के कारण शोध की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ा है। डीयू के भीतर यह चर्चा आम है कि विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह से एक राजनीतिक रिमोट कंट्रोल से चल रहा है। यूनिवर्सिटी के अस्तित्व को संकट में डालने वाले कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं. स्थायी प्रोफेसरों और प्रिंसिपलों की नियुक्तियों में अकादमिक योग्यता (Academic Merit) से ज्यादा राजनीतिक निष्ठा को तरजीह दी जा रही है। आरएसएस और उसकी शाखाओं से जुड़े लोगों को बड़े पदों पर बैठाया जा रहा है, जिससे शिक्षण का स्तर गिरा है।
एबीवीपी पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वह कैंपस के भीतर डराने-धमकाने की राजनीति करती है। छात्र संघ चुनावों (DUSU) के दौरान धनबल और बाहुबल का नग्न प्रदर्शन अब आम हो चुका है। आम छात्र खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। सालों से विश्वविद्यालय को अपने खून-पसीने से सींचने वाले सैकड़ों अनुभवी एडहॉक प्रोफेसरों को एक झटके में बाहर कर दिया गया और उनकी जगह वैचारिक रूप से अनुकूल लोगों को रख लिया गया। इससे यूनिवर्सिटी का अकादमिक ढांचा चरमरा गया है। यूनिवर्सिटी के ग्राफ को नीचे गिराने में नीतियों का भी बड़ा हाथ रहा है। ‘कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट’ (CUET) लागू होने के बाद से एडमिशन प्रक्रिया में भारी विसंगतियां आई हैं। कई महीनों तक दाखिले लटके रहते हैं, जिससे पूरा सत्र (Academic Session) पिछड़ जाता है। इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा फंड में की जा रही कटौती के कारण कॉलेजों के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का बुरा हाल है। फीस में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए डीयू में पढ़ना अब आसान नहीं रहा।
यूनिवर्सिटी की इस गिरती साख की पुष्टि हालिया आंकड़े भी करते हैं। नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) की रैंकिंग में दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई शीर्ष कॉलेज और खुद यूनिवर्सिटी पिछले कुछ वर्षों में नीचे खिसके हैं।
| मापदंड / संकेतक | पांच वर्ष पहले की स्थिति | वर्तमान स्थिति (अनुमानित/हालिया रुझान) |
|---|---|---|
| दाखिले के लिए आवेदन | प्रति सीट औसतन 80-100 आवेदन | सीयूईटी के बाद कई कोर्सों में सीटें खाली |
| अकादमिक रैंकिंग (NIRF) | देश के टॉप 10 विश्वविद्यालयों में शामिल | लगातार रैंकिंग में गिरावट और स्कोर में कमी |
| कैंपस प्लेसमेंट दर | शीर्ष कंपनियों द्वारा 85% से अधिक | गुणवत्ता में कमी के कारण प्लेसमेंट पैकेज में गिरावट |
| विदेशी/अन्य राज्यों के छात्र | कुल छात्रों का लगभग 45-50% | स्थानीय छात्रों की संख्या बढ़ी, बाहरी राज्यों से मोहभंग |
एक समय था जब केरल, तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों के टॉपर्स डीयू को अपनी पहली पसंद मानते थे। लेकिन हालिया डेटा दिखाता है कि अब अन्य राज्यों के छात्र या तो अपने राज्यों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को चुन रहे हैं या फिर निजी विश्वविद्यालयों (Private Universities) की तरफ रुख कर रहे हैं, जहाँ राजनीति कम और पढ़ाई पर ध्यान ज्यादा होता है।कैंपस के बदलते माहौल ने छात्रों को डीयू से दूर जाने पर मजबूर कर दिया है। इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं. आए दिन होने वाले राजनीतिक हंगामे, प्रदर्शनों और क्लास सस्पेंड होने से गंभीर छात्र परेशान रहते हैं। जब नियुक्तियां पैरवी से होंगी और पाठ्यक्रम पुराना या राजनीतिक होगा, तो कॉर्पोरेट जगत और वैश्विक अकादमिक संस्थान डीयू के छात्रों को प्राथमिकता देना बंद कर देंगे। यही वजह है कि प्लेसमेंट ग्राफ नीचे आ रहा है। युवा पीढ़ी को खुला और प्रगतिशील माहौल पसंद आता है।
कैंपस में मोरल पुलिसिंग और वैचारिक कट्टरता के कारण छात्र खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह संकट केवल एक विश्वविद्यालय का संकट नहीं है, बल्कि यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के पतन का संकेत है। किसी भी विश्वविद्यालय का अस्तित्व उसकी स्वतंत्र सोच, रिसर्च और योग्य शिक्षकों से होता है। यदि राजनीतिक दल और उनके वैचारिक संगठन अपने तुच्छ फायदों के लिए शिक्षा के इन मंदिरों को अपनी प्रयोगशाला बनाएंगे, तो नुकसान देश के भविष्य का होगा। डीयू को उसके पुराने गौरव पर वापस लाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि विश्वविद्यालय को राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त किया जाए, नियुक्तियों में पारदर्शिता लाई जाए और कैंपस में एक बार फिर स्वतंत्र, सुरक्षित और लोकतांत्रिक माहौल बहाल किया जाए। अन्यथा, यह ऐतिहासिक संस्थान केवल एक डिग्री बांटने वाली फैक्ट्री बनकर रह जाएगा।




