डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

धड़कनों में गूंजती है ज़बान हमारी शान है, हिंदी अपनी मातृभाषा, देश की पहचान है।
सरहदों को चीरती जो भाव का विस्तार है, रीति-नीति और संस्कृति का अमर श्रृंगार है।
वेद की ऋचाओं से जो निकली अनघ नाद है, हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।
पूरब से पश्चिम तक जो सेतु का काम है, हर जुबां पर गूंजता जिसका प्यारा नाम है।
कबीर की साखियों में जो मिठास घोलती, मीरा के भजनों में जो प्रेम बनके बोलती।
आधुनिकता की दौड़ में मत इसे विस्मृत करो, अपनी इस विरासत पर गर्व तुम निरंतर करो।




