आज के दौर में अगर कोई आपसे पूछे कि देश में सबसे सुरक्षित, मुनाफे वाला और रसूखदार करियर कौन सा है? तो डॉक्टर, इंजीनियर या सिविल सर्वेंट बनने की पुरानी सलाहें भूल जाइए। आज का सबसे ‘चोखा काम’ है,सिर पर जटाएं बढ़ाइए या चमकीले वस्त्र धारण कीजिए, बाबा बन जाइए, सत्ता की चमचागीरी में महारत हासिल कीजिए, किसी मंदिर या धार्मिक प्रोजेक्ट के झंडेबरदार बनिए और अंत में अपनी एक राजनीतिक पार्टी या वोटबैंक का साम्राज्य खड़ा कर लीजिए। यह आधुनिक भारत में सफलता का वह अचूक फॉर्मूला बन चुका है, जहां आस्था का बाजार भी सजता है और सियासत की मलाई भी मिलती है।

पुरानी सदी के संत मोह-माया त्यागकर जंगलों या कंदराओं में लीन रहते थे, लेकिन आज के ‘स्मार्ट बाबा’ सीधे वातानुकूलित आश्रमों और करोड़ों के कॉर्पोरेट साम्राज्यों से अपनी सल्तनत चलाते हैं। इस धंधे की पहली सीढ़ी है,जनता की दुविधाओं, अंधविश्वास और आध्यात्मिक भूख को एक प्रॉडक्ट की तरह बेचना। उदाहरण के लिए, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) जैसे युवा कथावाचकों को देखें, जिन्होंने दिव्य दरबारों, पर्चा निकालने के दावों और चमत्कारों के दम पर करोड़ों की भीड़ को सम्मोहित कर रखा है। जब आस्था इतनी गहरी हो जाए कि तर्क घुटने टेक दे, तो समझ लीजिए कि ‘धंधा’ सही दिशा में चल पड़ा है।

बाबा बनने के बाद अगला सबसे जरूरी कदम है,सत्ता में बैठे हुक्मरानों की शान में कसीदे पढ़ना। आज का नियम साफ है: आप सरकार की नीतियों की जय-जयकार कीजिए, बदले में सरकार आपके जमीनी कब्जों, टैक्स की गड़बड़ियों और विवादों पर अपनी आंखें मूंद लेगी। योग गुरु बाबा रामदेव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। पतंजलि का साम्राज्य सिर्फ योग के भरोसे नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और राष्ट्रवाद के कॉकटेल पर खड़ा हुआ। हालांकि हाल के वर्षों में (जैसे 2024 में भ्रामक विज्ञापनों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार) उन्हें कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी पैठ ने उन्हें हमेशा एक मजबूत कवच दिया। अतीत में गुरमीत राम रहीम (डेरा सच्चा सौदा) और आसाराम बापू जैसे नाम भी इसी चमचागीरी और राजनीतिक वरदहस्त के दम पर सालों तक कानून से ऊपर बने रहे, भले ही बाद में उनके गंभीर पापों का घड़ा फूट गया।
इस पूरे बिजनेस मॉडल का सबसे अहम हिस्सा है,कोई बड़ा मंदिर प्रोजेक्ट या धार्मिक आंदोलन। मंदिर सिर्फ श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि अरबों रुपये के चंदे, जमीनों पर नियंत्रण और भावनाओं को भड़काने का सबसे आसान जरिया हैं। जो बाबा किसी बड़े मंदिर निर्माण या धार्मिक विमर्श से खुद को जोड़ लेता है, उसकी तिजोरी और राजनीतिक ताकत दोनों रातों-रात दोगुनी हो जाती है। जनता महंगाई और बेरोजगारी भूलकर इस बात पर तालियां बजाने लगती है कि उनका ‘धर्म सुरक्षित’ हो रहा है।
जब लाखों-करोड़ों भक्त अंधभक्तों में तब्दील हो जाते हैं, तो वे सिर्फ श्रद्धालु नहीं रहते, वे ‘वोटबैंक’ बन जाते हैं। इसके बाद बाबा सीधे तौर पर या परदे के पीछे से राजनीतिक पार्टियां चलाने लगते हैं। चुनाव आते ही बड़े-बड़े नेता इन बाबाओं के चरणों में दंडवत होते नजर आते हैं क्योंकि बाबा के एक इशारे पर लाखों वोट इधर से उधर हो सकते हैं। चाहे पंजाब-हरियाणा के डेरे हों, उत्तर प्रदेश के मठाधीश हों या दक्षिण के भव्य आश्रम, ये सभी आज की तारीख में समानांतर सरकारें चला रहे हैं।
आज के भारत में यह गठजोड़ इतना मजबूत हो चुका है कि तर्क, विज्ञान और असली अध्यात्म कहीं पीछे छूट गए हैं। बाबाओं की चमचागीरी ने उन्हें सत्ता का पार्टनर बना दिया है, मंदिरों के नाम पर राजनीति चमकाई जा रही है, और राजनीतिक रसूख के दम पर इन बाबाओं की सल्तनत फल-फूल रही है। आम नागरिक टैक्स भर रहा है, नौकरियों के लिए लाठियां खा रहा है, और अंत में इन्हीं बाबाओं के चरणों में बैठकर ‘कृपा’ आने का इंतजार कर रहा है। सचमुच, इससे चोखा काम आज के दौर में कोई दूसरा नहीं है!



