मुरादाबाद में नमाज़ पर एफआईआर: कानून या राजनीति?

रितेश सिन्हा

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित सरकारी सर्किट हाउस में समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष हाजी मोहम्मद उस्मान द्वारा नमाज़ पढ़ने को लेकर दर्ज प्राथमिकी ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और राजनीतिक निष्पक्षता के सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी सामान्य सड़क या निजी परिसर का नहीं, बल्कि सरकारी सर्किट हाउस परिसर का है और प्राथमिकी में धार्मिक आचरण को सीधे अपराध नहीं बताया गया है, बल्कि सार्वजनिक मार्ग में कथित अवरोध और सार्वजनिक उपद्रव से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धाराएं लगाई गई हैं। उपलब्ध प्राथमिकी और पुलिस के बयान के अनुसार घटना 3 सितंबर 2026 की है। समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष हाजी मोहम्मद उस्मान सर्किट हाउस में आयोजित एक बैठक में शामिल होने पहुंचे थे। प्राथमिकी के अनुसार वहां विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष लाल बिहारी यादव के ठहरने और बैठक के कारण लोगों की आवाजाही थी। आरोप है कि उस्मान ने सर्किट हाउस के आने-जाने वाले मार्ग पर अपना वाहन खड़ा किया और उसके पीछे नमाज़ अदा की, जिससे लोगों और वाहनों के आवागमन में बाधा उत्पन्न हुई। सर्किट हाउस के प्रभारी अधिकारी की शिकायत के आधार पर मझोला थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 285 और 292 के तहत मामला दर्ज किया गया। धारा 285 सार्वजनिक मार्ग में खतरा या अवरोध पैदा करने से संबंधित है, जबकि धारा 292 सार्वजनिक उपद्रव के लिए दंड का प्रावधान करती है। इसलिए उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि प्राथमिकी केवल नमाज़ पढ़ने के कारण दर्ज हुई है। पुलिस का आधिकारिक पक्ष यह है कि शिकायत में आवागमन बाधित होने की बात कही गई थी। यही इस पूरे मामले की कानूनी कसौटी भी है—क्या वास्तव में रास्ता बाधित हुआ था और क्या शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में प्रमाणित होते हैं?

दूसरी ओर हाजी मोहम्मद उस्मान ने किसी गलत काम से इनकार किया है। उनका कहना है कि उन्होंने जहां नमाज़ पढ़ी, वहां किसी सड़क या आवागमन को बाधित नहीं किया और किसी को असुविधा नहीं हुई। यानी मामले में शुरुआत से ही दो अलग-अलग दावे सामने हैं। प्रशासनिक पक्ष कह रहा है कि वाहन और नमाज़ के कारण आवागमन प्रभावित हुआ, जबकि आरोपी पक्ष का कहना है कि उन्होंने पार्किंग क्षेत्र में नमाज़ पढ़ी और किसी का रास्ता नहीं रोका। इसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा, न कि वायरल वीडियो या राजनीतिक बयानों से। यहीं संविधान के अनुच्छेद 25 का प्रश्न आता है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण और निरंकुश नहीं है। संविधान स्वयं इस अधिकार को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन रखता है। सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हर स्थान पर धार्मिक गतिविधि करने का असीमित अधिकार नहीं है। वर्ष 2018 के एक फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अनुच्छेद 25 किसी व्यक्ति को हर स्थान पर पूजा करने का अधिकार नहीं देता; किसी स्थान पर पूजा करना तभी संवैधानिक संरक्षण के विशेष प्रश्न से जुड़ता है जब वह धार्मिक आचरण का आवश्यक और अभिन्न हिस्सा हो।

यह कहना कि “संविधान नमाज़ पढ़ने की अनुमति देता है, इसलिए किसी भी स्थान पर नमाज़ पढ़ने पर कार्रवाई नहीं हो सकती”, कानूनी रूप से बहुत व्यापक निष्कर्ष होगा। उसी तरह यह कहना कि “सरकारी परिसर में नमाज़ पढ़ना अपने आप अपराध है”, यह भी सही कानूनी निष्कर्ष नहीं होगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या किसी वैध नियम का उल्लंघन हुआ, क्या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई और क्या प्राथमिकी में लगाई गई धाराओं के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद हैं। मुरादाबाद की घटना को उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के मामलों की पृष्ठभूमि में देखने पर तस्वीर और स्पष्ट होती है। सितंबर 2022 में शाहजहांपुर में अजमेर जा रहे पश्चिम बंगाल के 18 मुस्लिम यात्रियों को सड़क किनारे नमाज़ पढ़ने की शिकायत के बाद पुलिस थाने ले जाया गया था। पुलिस के अनुसार उन्हें लिखित माफी लेने और चालान करने के बाद छोड़ दिया गया। इस घटना का वीडियो सामने आया था जिसमें कुछ लोगों को कान पकड़कर माफी मांगते और उठक-बैठक करते देखा गया था।

अप्रैल 2023 में अलीगढ़ में ईद के अवसर पर सड़क पर नमाज़ पढ़ने के आरोप में दो प्राथमिकी दर्ज की गई थीं। पुलिस के अनुसार उस समय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी और लोगों को सड़कों पर नमाज़ न पढ़ने के लिए पहले से बताया गया था। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जांच की बात कही थी। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी ईद के दौरान सड़कों पर नमाज़ को लेकर पुलिस कार्रवाई की खबरें आईं। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि सड़क पर धार्मिक गतिविधि को लेकर प्रशासन की नीति केवल मुरादाबाद की घटना से शुरू नहीं हुई। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रशासन ने धार्मिक आयोजनों को पारंपरिक और निर्धारित स्थलों तक सीमित रखने तथा यातायात बाधित न करने पर जोर दिया है।

जनवरी 2025 में बरेली के जाम समांत गांव में भी नमाज़ को लेकर मामला सामने आया। पुलिस ने एक निजी संपत्ति पर सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़े जाने के मामले में सात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की और चार लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस का आरोप था कि बिना अनुमति वहां सामूहिक नमाज़ की जा रही थी और स्थान को अस्थायी मस्जिद के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत दर्ज की गई थी। इस मामले में भी विवाद का केंद्र केवल नमाज़ नहीं, बल्कि निषेधाज्ञा, प्रशासनिक अनुमति और कानून-व्यवस्था से जुड़े आरोप थे। इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि उत्तर प्रदेश में प्रशासन सड़क, सार्वजनिक मार्ग या ऐसे स्थानों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है जहां उससे यातायात या कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो। इसलिए मुरादाबाद की एफआईआर को पूरी तरह असामान्य घटना कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या यही मानदंड सभी धार्मिक समुदायों और सभी धार्मिक आयोजनों पर समान रूप से लागू होते हैं? संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी धार्मिक स्वतंत्रता को अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन माना है। इसका अर्थ यही है कि प्रशासन को किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के आधार पर अलग मानक नहीं बनाना चाहिए। यदि सड़क पर नमाज़ के कारण आवागमन बाधित होता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यही सिद्धांत सड़क पर होने वाले अन्य धार्मिक आयोजनों पर भी लागू होना चाहिए। धार्मिक जुलूस, पूजा, भंडारा, जागरण या कोई अन्य आयोजन यदि सार्वजनिक मार्ग को बाधित करता है तो उसके लिए भी समान प्रशासनिक कसौटी होनी चाहिए। कानून की निष्पक्षता तभी दिखाई देती है जब नियम धार्मिक पहचान से ऊपर दिखाई दें।

मुरादाबाद के मामले में राजनीतिक पहलू भी इसलिए सामने आया है क्योंकि आरोपी समाजवादी पार्टी के जिला पदाधिकारी हैं और वह बिलारी के सपा विधायक मोहम्मद फहीम इरफान के रिश्तेदार बताए जाते हैं। घटना के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध किया और उसके बाद मामला पुलिस कार्रवाई तक पहुंचा। लेकिन केवल इस क्रम के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि प्राथमिकी राजनीतिक दबाव में दर्ज हुई, अभी तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। इसके लिए पुलिस कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया, शिकायत, वीडियो और जांच के निष्कर्ष देखना जरूरी होगा। यह कहना उचित नहीं होगा कि हाजी उस्मान ने निश्चित रूप से रास्ता बाधित किया था। प्राथमिकी में यह आरोप है, जबकि उस्मान इससे इनकार कर रहे हैं। यही कारण है कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निष्पक्ष जांच की होगी। वीडियो में वाहन की स्थिति, मार्ग की चौड़ाई, उस समय लोगों और वाहनों की आवाजाही तथा वास्तविक अवरोध—इन सभी तथ्यों की जांच होनी चाहिए।

सरकार के लिए भी यह मामला एक संवेदनशील परीक्षा है। उत्तर प्रदेश में धार्मिक पहचान से जुड़े विवादों का राजनीतिक प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ता है। ऐसे वातावरण में प्रशासनिक कार्रवाई को पारदर्शी और नियम आधारित रखना जरूरी है। यदि सरकारी परिसर में धार्मिक गतिविधियों को लेकर कोई स्पष्ट प्रशासनिक नियम है, तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। इससे भविष्य में ऐसे विवादों की गुंजाइश कम होगी। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों संविधान का हिस्सा हैं। किसी धार्मिक आचरण को केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर सही या गलत ठहराना दोनों ही पक्षों के लिए खतरनाक है। नमाज़ पढ़ना धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में आता है, लेकिन सार्वजनिक मार्ग को बाधित करना या सार्वजनिक उपद्रव पैदा करना कानून के दायरे में आ सकता है। दोनों प्रश्नों को एक-दूसरे से अलग रखना ही संवैधानिक दृष्टिकोण है।

मुरादाबाद की घटना का अंतिम फैसला अदालत और जांच से होना चाहिए, राजनीतिक मंचों से नहीं। यदि जांच में सार्वजनिक मार्ग बाधित होने और सार्वजनिक उपद्रव के आरोप प्रमाणित होते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते और यह साबित होता है कि किसी सार्वजनिक मार्ग या व्यक्ति की आवाजाही में वास्तविक बाधा नहीं थी, तो प्राथमिकी की धाराओं की वैधानिकता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे। इस पूरे विवाद को “नमाज़ बनाम कानून” की सरल बहस में बदलना संविधान की जटिलता को कम करना होगा। असली सवाल यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था कैसे कायम रखी जाए और कानून को समान रूप से कैसे लागू किया जाए। सरकार की विश्वसनीयता इसी से तय होगी कि वह कार्रवाई कितनी कठोर है, इससे नहीं; बल्कि इस बात से कि कार्रवाई कितनी निष्पक्ष, प्रमाण आधारित है।

मुरादाबाद का मामला इसलिए एक व्यक्ति की नमाज़ से बड़ा प्रश्न बन गया है। यह सवाल पूछ रहा है कि भारत जैसे बहुधार्मिक लोकतंत्र में प्रशासन धार्मिक आस्था और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है। संविधान नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन किसी भी अधिकार की तरह यह स्वतंत्रता भी कानून और सार्वजनिक व्यवस्था की सीमाओं के अधीन है।आखिरकार सवाल नमाज़ का नहीं, कानून के समान और निष्पक्ष इस्तेमाल का है।

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