इतिहास के पन्नों में ज्ञान, अध्यात्म और क्रांति की भूमि रहा बिहार आज एक बार फिर अपने अस्तित्व, पहचान और विकास की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। एक तरफ जहां प्रकृति की मार ने सूबे के बड़े हिस्से को जलमग्न कर लाखों जिंदगियों को संकट में डाल दिया है, वहीं दूसरी तरफ पलायन, बेरोजगारी और बुनियादी ढांचे की चुनौतियाँ इसके युवाओं के भविष्य को धुंधला कर रही हैं।

समय की मांग है कि हर बिहारी, चाहे वह देश में हो या विदेश में, राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी मातृभूमि के लिए आगे आए। अब नहीं तो कब? यह पुकार किसी एक व्यक्ति या सरकार की नहीं, बल्कि उस माटी की है जिसने कभी दुनिया को लोकतंत्र का पहला पाठ पढ़ाया था। वर्तमान में बिहार के 48 लाख से अधिक लोग भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। कोसी, गंडक और गंगा जैसी नदियां उफान पर हैं, जिसके कारण गांवों के गांव और हजारों एकड़ फसलें जलमग्न हो चुकी हैं। बेघर हुए परिवारों के पास न रहने को छत है, न बच्चों के लिए दूध और न ही सूखी रोटी। इस भयावह आपदा पर राजनीति भी चरम पर है। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने केंद्र सरकार पर बिहार के साथ “सौतेले भाई” जैसा व्यवहार करने का आरोप लगाया है और इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की है। हालांकि, एनडीआरएफ (NDRF), एसडीआरएफ (SDRF) और प्रशासन की टीमें राहत कार्यों में जुटी हैं, और केंद्र द्वारा 400 करोड़ रुपये की प्राथमिक सहायता जारी की गई है, लेकिन यह नाकाफी है।

सरकारी तंत्र की अपनी सीमाएं हैं, और यही कारण है कि आज बिहार को अपने आम नागरिकों, स्वयंसेवी संस्थाओं और सक्षम समाज के सक्रिय सहयोग की सख्त जरूरत है। बाढ़ तो मौसमी आपदा है, लेकिन बिहार एक स्थायी सामाजिक-आर्थिक आपदा से भी जूझ रहा है—वह है पलायन। स्वतंत्रता के बाद से ही दोषपूर्ण नीतियों और औद्योगिक शून्यता के कारण बिहार का श्रम और मेधा दोनों ही राज्य से बाहर जाने को मजबूर रहे हैं। दिल्ली, मुंबई या खाड़ी देशों में पसीना बहाने वाला मजदूर हो या बेंगलुरु-पुणे में सॉफ्टवेयर बनाने वाला इंजीनियर, बिहार की सबसे बेहतरीन ऊर्जा दूसरों के विकास का आधार बन रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में घोषणा की है कि सरकार का लक्ष्य एक करोड़ रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करना है ताकि बच्चों को बाहर न जाना पड़े। साथ ही, शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए हर ब्लॉक में ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ जैसे मॉडल स्कूल खोलने की योजना है ताकि गरीब बच्चों को नीट (NEET) और जेईई (JEE) की मुफ्त तैयारी मिल सके। नीतियां बन रही हैं, लेकिन इन्हें जमीन पर उतारने के लिए राज्य को निजी निवेशकों, उद्यमियों और कॉर्पोरेट जगत के सहयोग की आवश्यकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बिहार को अब ‘मुफ्त की राजनीति’ (Revdi Economics) की नहीं, बल्कि एक ठोस और दूरदर्शी विकास रणनीति की जरूरत है। बिहार मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान राज्य है।

यहाँ मखाना, शाही लीची, और गन्ना जैसी उच्च-मूल्य वाली फसलें बहुतायत में होती हैं। राज्य की ‘एथेनॉल उत्पादन प्रोत्साहन नीति’ के तहत कई प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है। हाल ही में खगड़िया जैसे जिलों में किसानों को आधुनिक खेती जैसे प्लास्टिक मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई पर 50% तक की सब्सिडी दी जा रही है ताकि पानी और पैसे दोनों की बचत हो सके। लेकिन जरूरत इस बात की है कि बड़े खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) उद्योग राज्य में आएं। जब तक स्थानीय स्तर पर कृषि उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग नहीं होगी, तब तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हो सकती। बिहार का युवा अब चुप बैठने वाला नहीं है। पिछले दिनों पटना में बीपीएससी (BPSC) और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर छात्रों का भारी आंदोलन देखने को मिला। छात्र परीक्षा प्रणाली में सुधार और भ्रष्टाचार-मुक्त चयन प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। किसी भी राज्य को बचाने की शुरुआत उसकी शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने से होती है। यदि बिहार का युवा सड़कों पर लाठियां खाने को मजबूर होगा, तो राज्य का भविष्य कभी सुरक्षित नहीं हो सकता। इसके लिए प्रशासन को अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी और छात्रों के विश्वास को बहाल करना होगा। यह समय केवल कमियां ढूंढने या एक-दूसरे पर दोषारोपण करने का नहीं है। बिहार को बचाने का मतलब है इसके अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सशक्त बनाना। इस मुहिम में हर नागरिक सहयोग कर सकता है। बाढ़ राहत में सीधी मदद: प्रभावित इलाकों में भोजन, स्वच्छ पानी, दवाइयां और कपड़े पहुंचाने के लिए सामाजिक संगठनों के माध्यम से सहयोग करें। बिहार में निवेश (Invest in Bihar): प्रवासी बिहारी उद्यमी और उद्योगपति छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) के जरिए बिहार में निवेश करें ताकि स्थानीय युवाओं को यहीं रोजगार मिल सके। जातिवाद की राजनीति से ऊपर उठना
बिहार के सामाजिक ताने-बाने को दशकों से जातिगत राजनीति ने कमजोर किया है। जब तक राज्य का नागरिक जाति से ऊपर उठकर योग्यता और विकास के आधार पर नेतृत्व नहीं चुनेगा, तब तक बदलाव नामुमकिन है। डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स का सहयोग: सोशल मीडिया के इस दौर में बड़े रचनाकारों और प्रभावितों (Influencers) को बिहार की जमीनी समस्याओं और यहाँ की सकारात्मक कहानियों को वैश्विक पटल पर लाना होगा। बिहार कोई पिछड़ा हुआ भूभाग नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है। जब तक बिहार विकास की मुख्यधारा में नहीं लौटेगा, तब तक भारत के पूर्ण विकसित होने का सपना अधूरा रहेगा।
संकट बड़ा है, चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो या आर्थिक पिछड़ापन। लेकिन बिहारियों के संकल्प से बड़ा कुछ भी नहीं है। आवाज़ दो कि हम एक हैं। उठिए, आगे बढ़िए और अपनी मातृभूमि के ऋण को चुकाने के लिए अपना हाथ बढ़ाइए। आपकी बिहार को जरूरत है!




