निगाहे शोक़ में, तुमको छुपा रक्खा है।

डॉ.मुश्ताक़अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

जर्रे ज़र्रे में  सरकार नज़र आ रहे हो तुम। क्या बात है जो मुझको सता रहे हो तुम।

ये क्या ऐसे तो मुहब्बत हो जाएगी रुसवा। राज़ सखियों को हमदम बता रहे हो तुम।

मुसलसल  सरे महफ़िल न देखो हमको। इश्क़  क्यों सब पर अयां कर रहे हो तुम।

निगाहे शोक में हां तुमको छुपा रक्खा है। नाहक़ नक़ाब में खुद को छुपा रहे हो तुम।

हुस्न का जलवा है, ये जो में हुआ पागल। इल्ज़ाम सारा हम पर क्यूं लगा रहे हो तुम।

बड़ी मुश्किलों से मुश्ताक़ तुमको भूलें हैं। याद आआकर क्यों हमें रुला रहे हो तुम।

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