वक्त का पहिया और माता-पिता का त्याग, एक कड़वा सच अंधों को कहां दिखाई देता है

डॉ.मुश्ताक़अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो वृक्ष अपनी पूरी उम्र धूप में जलकर अपनी औलादों को छांव देता है, अक्सर अंत में उसी की लकड़ियों से लोग अपना चूल्हा जलाने की सोचते हैं। माता-पिता का त्याग एक ऐसा समंदर है जिसकी गहराई को कोई आज तक माप नहीं सका। निस्वार्थ समर्पण की पराकाष्ठा,यह सच है कि माता-पिता की किस्मत में अपनी खुशी से ज्यादा बच्चों की खुशियां होती हैं। एक पिता अपनी पूरी उम्र की जमा-पूंजी और अपना सुख बच्चों के भविष्य की नींव में लगा देता है। वहीं एक मां अपने वजूद का कतरा-कतरा अपनी संतान के पालन-पोषण में समर्पित कर देती है। उनके लिए “अपना कुछ” नहीं होता; जो कुछ भी है, वह उनकी औलाद का होता है। प्यासी रह जाती कुछ औलादें फिर भी, अफसोस की बात यह है कि इतनी ममता और बलिदान के बावजूद, कुछ औलादें मानसिक और भावनात्मक रूप से ‘प्यासी’ ही रह जाती हैं। यहाँ प्यास का अर्थ सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि कृतज्ञता (gratitude) और संस्कार की कमी है। वे उस स्नेह को समझ ही नहीं पाते जो उन्हें सींच रहा होता है, और अंततः वे खुद को अपने माता-पिता से श्रेष्ठ समझने की भूल कर बैठते हैं।

समय का गोल पहिया: ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ इतिहास और प्रकृति का एक अटल नियम है,प्रतिध्वनि (Echo)। आप जो ब्रह्मांड में भेजते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। आज जो औलाद अपने माता-पिता के आंसुओं या उनकी जरूरतों को अनदेखा कर रही है, वह यह भूल जाती है कि ‘वक्त का पहिया’ हमेशा घूमता रहता है। सरमाया (पूंजी), आज आप अपने माता-पिता को जो व्यवहार, आदर या अनादर दे रहे हैं, वही आपकी भविष्य की पूंजी बन रही है। लौटता हुआ वक्त, कल जब आप स्वयं उस मोड़ पर खड़े होंगे जहाँ आपके माता-पिता आज हैं, तब आपकी अपनी संतान आपके साथ वही दोहराएगी जो आपने आज किया है।समय किसी का कर्ज नहीं रखता। वह सब कुछ वापस लौटाता है, और अक्सर ‘सूद’ (ब्याज) के साथ लौटाता है। यदि आज हम अपने माता-पिता की तपस्या का सम्मान नहीं कर सकते, तो हमें भविष्य में सम्मान की उम्मीद करने का भी कोई हक नहीं है। माता-पिता की सेवा केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र निवेश है। याद रखें, जो हाथ  हमारे आज कांप रहे हैं,  कमज़ोर हो गए हैं,कल उन हाथों ने ही आपको चलना सिखाया था। लेकिन अफसोस ज़माने की गंदी हवाओं में घुल गए हो तुम,,,,,

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