समझोगे  किस अंगारे पर हाथ लगाया तुमने।

डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

मेरी आह की अगन हां तुम्हें मालूम नहीं है, हो जाओगे बर्बाद सच्चाई से मुंह छुपाया तुमने।

​वफ़ा की राह में जो खो दिया वो पाक ईमां था, अफ़सोस! उस ईमां को बेईमान बताया तुमने।

​छुपाकर आस्तीं में अपनी मक्कारियों के ख़ंजर, मसीहा बनके मेरे ही यक़ीं का ख़ूं बहाया तुमने।

​जो सुर्ख़रू बने बैठे हो आज हमारी महफ़िल में, भूल बैठे हो कहीं खोखला महल बनाया तुमने।

​उठेगी जब मेरे सब्र के दामन से धुएं की लकीर, समझोगे  किस अंगारे पर हाथ लगाया तुमने।

​वफ़ा की लाज ‘मुश्ताक’ ने तो आख़िरी दम तक रक्खी, मगर अपनों का ही असल रूप ए वक्त दिखाया तुमने।

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