लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार: पत्रकार को कवरेज से रोकना और डराना-धमकाना अब एक गंभीर अपराध

लोकतंत्र की बुनियाद स्वतंत्र पत्रकारिता पर टिकी है। मीडिया को समाज का आईना और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।

लेकिन हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकारों के साथ बदसलूकी, उनके कैमरे तोड़े जाने, जबरन वीडियो डिलीट कराने और फील्ड में समाचार कवरेज से रोकने की घटनाएं तेजी से सामने आई हैं। कानूनी विशेषज्ञों और पत्रकार संगठनों का स्पष्ट रूप से मानना है कि जनहित में काम कर रहे किसी भी पत्रकार को कवरेज से रोकना एक गंभीर कानूनी अपराध है। देश में नए कानूनों के लागू होने के बाद, अब ऐसा करने वालों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। देशभर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 लागू होने के बाद पत्रकारों की सुरक्षा और उनके काम में बाधा डालने वालों के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई का दायरा बढ़ गया है। यदि कोई व्यक्ति या अधिकारी किसी पत्रकार को उसकी ड्यूटी करने से रोकता है, तो उसके खिलाफ निम्नलिखित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है:

  1. रास्ता रोकना या बंधक बनाना (सदोष अवरोध): यदि किसी पत्रकार को फील्ड में जबरन रोका जाता है या उसकी आवाजाही को बाधित किया जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 126 (सदोष अवरोध – Wrongful Restraint) और धारा 127 (सदोष परिरोध – Wrongful Confinement) के तहत कार्रवाई हो सकती है।
  2. कैमरा तोड़ना और उपकरण को नुकसान पहुँचाना: कवरेज के दौरान पत्रकारों के कैमरे, मोबाइल या माइक को छीनना या उन्हें क्षतिग्रस्त करना संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की श्रेणी में आता है, जिसके लिए कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
  3. मारपीट, गाली-गलौज और धमकी देना: रिपोर्टिंग के दौरान अक्सर पत्रकारों को धमकियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में BNS की धारा 351 (आपराधिक धमकी), धारा 324 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और धारा 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के तहत तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा सकती है।
  4. जबरन वीडियो या फोटो डिलीट करवाना: यह सीधे तौर पर सबूतों को नष्ट करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास माना जाता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) देश के सभी नागरिकों को ‘वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech and Expression) प्रदान करता है। हालांकि संविधान में ‘प्रेस’ शब्द का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी अनुच्छेद के अंतर्गत अंतर्निहित है। संसदीय कार्यवाहियों और कोर्ट की सार्वजनिक बहसों को निष्पक्ष रूप से रिपोर्ट करना मीडिया का संवैधानिक अधिकार है, बशर्ते वह राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता को प्रभावित न करे। किसी भी पत्रकार को सच दिखाने से रोकना जनता के ‘जानने के अधिकार’ (Right to Know) का हनन है।

यूनेस्को (UNESCO) की रिपोर्टों के मुताबिक, दुनिया भर में पत्रकारों की सुरक्षा एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।

  • दशकों का कड़वा सच: साल 2006 से लेकर अब तक दुनिया भर में पत्रकारों की हत्या के करीब 85% मामले आज भी अनसुलझे हैं।
  • सच्चाई उजागर करने की कीमत: खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism), भ्रष्टाचार उजागर करने, संगठित अपराध और मानवाधिकार उल्लंघनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है।
  • अदृश्य खतरे: शारीरिक हमलों के अलावा, पत्रकारों को कानूनी उत्पीड़न (Strategic Lawsuits Against Public Participation – SLAPP), फर्जी मुकदमों और डिजिटल जासूसी के जरिए भी डराने का प्रयास किया जाता है।

देश के प्रतिष्ठित पत्रकार संगठनों जैसे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI), इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (IJU) और दिल्ली यूनियन ऑफ Journalists ने समय-समय पर पत्रकारों पर होने वाले हमलों और सरकारी कार्यक्रमों में मीडिया के प्रवेश को सीमित किए जाने पर चिंता जताई है। इन संगठनों का कहना है कि

  • पत्रकारों के लिए देश में ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ (Journalist Protection Act) को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
  • ग्राउंड जीरो पर तैनात पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस प्रशासन की होनी चाहिए।
  • झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज कर पत्रकारों को परेशान करने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए, जैसा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में निर्देश जारी कर पत्रकारों को दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण दिया है।

पत्रकारिता कोई सामान्य पेशा नहीं है, यह समाज को जागरूक करने और सत्ता से सवाल पूछने का एक माध्यम है। जब एक पत्रकार को कवरेज से रोका जाता है, तो असल में सच्चाई को दबाया जाता है। अगर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को भयमुक्त माहौल नहीं मिला, तो समाज में भ्रष्टाचार और अराजकता को बढ़ावा मिलेगा। कानून के दायरे में रहकर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना पत्रकारों का अधिकार है और इस अधिकार का सम्मान करना हर नागरिक और प्रशासनिक अधिकारी का कर्तव्य है।

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