भूख का कोई धर्म नहीं होता,नफ़रत के ‘डिजिटल धुएं’ के बीच इंसानियत की पुकार”

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

“मैंने पूछा हिंदू हो या मुसलमान? उसने कहा, भूखा हूं साहब…”

यह एक वाक्य किसी काल्पनिक संवाद का हिस्सा नहीं, बल्कि आज के दौर की उस सबसे कड़वी और नग्न सच्चाई का आईना है, जिससे हमारा पूरा समाज अपनी आंखें चुराए बैठा है। एक तरफ़ जहां पूरा देश ‘हिंदू और मुसलमान’ के दो ध्रुवों में बांटकर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ ज़मीन पर खड़ा एक आम इंसान अपनी बुनियादी ज़रूरतों और पेट की आग से जूझ रहा है। आज जब हम सुबह उठकर अपने स्मार्टफोन को टटोलते हैं, तो व्हाट्सएप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर केवल नफ़रत, अविश्वास और सांप्रदायिक वैमनस्य का ज़हरीला धुआं तैरता हुआ दिखता है। ऐसा प्रतीत कराया जाता है मानो दो समुदायों के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि अब उसका कोई समाधान नहीं है। लेकिन ज़रा ठंडे दिमाग से विचार कीजिए,क्या वास्तव में किसी आम हिंदू को अपने साथ रहने वाले मुस्लिम पड़ोसी से कोई व्यक्तिगत तकलीफ़ है? क्या किसी आम मुस्लिम को अपने हिंदू साथी से कोई शिकायत है? इतिहास और रोजमर्रा का अनुभव इसके ठीक उलट गवाही देता है। जब कोई दुख-तकलीफ़ आती है, तो पड़ोस का हिंदू ही मुस्लिम के काम आता है और मुस्लिम ही हिंदू के। फ़िर यह ज़हर घुल कहां से रहा है?

सच्चाई यह है कि आज समाज में जो कटुता और अविश्वास दिखाई दे रहा है, वह असल में व्हाट्सएप और फ़ेसबुक के “अनपढ़ विश्वविद्यालयों” का उत्पाद है। वहां बिना किसी तथ्य-जांच के परोसे जाने वाले मनगढ़ंत संदेश, तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए गए वीडियो और भड़काऊ बयानों के ज़रिए आम आदमी के मानस को प्रदूषित किया जा रहा है। यह वैमनस्य जनता का अपना नहीं, बल्कि उन ताक़तों का प्रायोजित एजेंडा है जो वास्तविक जन-मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती हैं। नफ़रत फैलाने वाले लोग ख़ुद सुरक्षित और वातानुकूलित कमरों में बैठकर तमाशा देखते हैं, जबकि उसकी क़ीमत सड़कों पर चलने वाले आम और मासूम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। जब पेट में भूख की आग जलती है, तो वह यह नहीं पूछती कि अन्न का दाना किस धर्म के किसान के खेत से आया है। जब कोई मरीज़ अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ रहा होता है, तो उसकी सांसें यह देखकर नहीं चलतीं कि उसे चढ़ाया जाने वाला ख़ून किस समुदाय के व्यक्ति का है। एक निर्धन, मजदूर और बेघर व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धर्म ‘रोटी’ है और सबसे बड़ी जाति उसकी ‘गरीबी’। हमारी असली जंग एक-दूसरे से लड़ने की है ही नहीं,हमारी असली जंग बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी और स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारी से है। अगर हमने अब भी अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और सोशल मीडिया पर परोसी जा रही नफ़रत को सच मानते रहे, तो हम अपने ही हाथों अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और देश के सामाजिक ताने-बाने को भस्म कर देंगे।


डिजिट्ल संयम अपनाएं,सोशल मीडिया पर आने वाली हर भड़काऊ और सांप्रदायिक पोस्ट को आगे बढ़ाने के बजाय वहीं रोकें।
मानवता को प्राथमिकता दें,किसी भी व्यक्ति को धर्म या पहचान के चश्मे से देखने के बजाय उसकी नीयत, कर्म और इंसानियत से पहचानें। सच्चे सवालों पर लौटें,नफ़रत के शोर को नकारते हुए शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और तरक्की जैसे बुनियादी मुद्दों पर सवाल पूछना शुरू करें। समय आ गया है कि हम अपनी आंखों पर चढ़े इस सांप्रदायिक भ्रम के पर्दे को हटाकर देखें। नफ़रत से न कभी किसी का पेट भरा है, न किसी का घर बसा है। जिस दिन हम एक-दूसरे के धर्म  और इंसानियत को सम्मान देने लगेंगे, उसी दिन हमारा देश वास्तव में सशक्त और समृद्ध बनेगा।

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