रीतेश झा, सीतामढ़ी, बिहार

जब शिक्षित समाज ही मतदान से विमुख होने लगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आत्ममंथन आवश्यक है। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि उसमें नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से सुनिश्चित होती है। विशेष रूप से बिहार विधान परिषद के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव शिक्षित वर्ग की राजनीतिक चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में इस चुनाव में कम मतदान प्रतिशत का सामने आना निश्चित रूप से एक सोचनीय और गंभीर मुद्दा है। बिहार के चार प्रमुख स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदान संबंधी आँकड़े इस विषय पर गंभीर चिंतन करने के लिए विवश करते हैं। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: कुल मतदाता 1,43,988, प्रत्याशी 17, मतदान प्रतिशत 50.16%। कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: कुल मतदाता 1,34,072, प्रत्याशी 15, मतदान प्रतिशत 52.51%। दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: कुल मतदाता 1,26,951, प्रत्याशी 40, मतदान प्रतिशत लगभग 42%। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: कुल मतदाता 87,583, प्रत्याशी 18, मतदान प्रतिशत लगभग 36.19%। इन आँकड़ों में सबसे अधिक विचारणीय स्थिति पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की है। पटना बिहार की राजधानी है। यहाँ विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत स्नातक एवं उच्च शिक्षित लोगों की बड़ी संख्या है। इसके बावजूद पुरे राज्य मे सबसे कम स्नातक मतदाता होना तथा मतदान प्रतिशत का लगभग 36% तक सीमित रह जाना कई सवाल खड़े करता है।
क्या शिक्षित होना और लोकतांत्रिक रूप से जागरूक होना दो अलग-अलग बातें बनती जा रही हैं? क्या मतदाताओं का राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास कम हो रहा है? क्या चुनावी प्रक्रिया के प्रति उदासीनता बढ़ रही है? या फिर मतदाता सूची, मतदान केंद्रों की दूरी, चुनाव के प्रति जानकारी का अभाव और प्रत्याशियों के प्रति असंतोष इसके प्रमुख कारण हैं?

इन सवालों का उत्तर तलाशना आवश्यक है। कम मतदान को केवल मतदाताओं की उदासीनता कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। इसके पीछे चुनाव व्यवस्था, राजनीतिक दलों, प्रत्याशियों और मतदाताओं—सभी की भूमिका का निष्पक्ष आकलन होना चाहिए। स्नातक निर्वाचन सामान्य चुनावों से अलग महत्व रखता है। यहाँ मतदाता केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया में भाग नहीं लेते, बल्कि वे शिक्षा, रोजगार, सामाजिक विकास और जनहित के मुद्दों पर अपनी आवाज को विधान परिषद तक पहुँचाने का अवसर भी प्राप्त करते हैं। ऐसे में मतदान से दूरी बनाना अप्रत्यक्ष रूप से अपनी लोकतांत्रिक शक्ति के उपयोग से पीछे हटना है। अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल और प्रत्याशी चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में स्नातक मतदाताओं से संवाद बनाए रखें। साथ ही, शिक्षित नागरिकों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने लोगों ने मतदान किया, बल्कि यह है कि शेष मतदाता मतदान से दूर क्यों रहे।

जिस लोकतंत्र में शिक्षित वर्ग की भागीदारी कमजोर पड़ने लगे, वहाँ केवल चुनावी परिणामों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का भी मूल्यांकन होना चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतपेटी में पड़े मतों से ही नहीं, बल्कि उन नागरिकों की जागरूकता से भी निर्धारित होती है, जो अपने मताधिकार का महत्व समझते हैं। कम मतदान केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सामने खड़ा एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर हमें मिलकर खोजना होगा।



